Friday, July 17, 2026

चूड़ाकरण मुहूर्त -

चौलंमाघादिपंचस्वमधुषुगदितं द्वित्रिपञ्चोन्मितेऽब्दे 

स्वाचाराद्वा सगर्भायदि भवति जनन्यत्र नो कार्यमेतत् ।

 साकं यत्रोपनीत्या क्रियत इहतदायं निरोधो न हिस्या

 ज्जह्यादंबार्तवोऽदो व्रतमुपयमनं चाविशुद्धः शुभार्थी ॥१०॥

चैत्र को छोड़कर माघ से पाँच महीनों में अर्थात् माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ मासों में जन्म से २ रे ३ रे या ५वें वर्ष में अथवा अपने कुल के आचारानुसार शिशु का चूड़ाकरण करना चाहिए ।
शिशु की माता के गभिणी रहने पर चूड़ाकरण नहीं करना चाहिए। इसका विचार पाँच वर्ष तक ही करना चाहिए। इसके बाद यह दोष नहीं लगता है।
यदि चूड़ाकरण और उपनयन संस्कार एक ही साथ हों तो चैत्रमास और माता के गर्भवती होने का दोष नहीं लगता । अर्थात् उपनयन संस्कार के साथ चूड़ाकरण चैत्रमास और माता के गभिणी होने पर भी करना चाहिए क्योंकि उसमें उपनयन ही मुख्य संस्कार होता है, इसमें चैत्रमास या मातृगर्भ दोषरहित माना गया है। परन्तु यदि माता का रजस्वला काल हो तो उसके शुद्धिकाल तक चड़ाकरण उपनयन
 नहीं करना चाहिए ।।१०।।

ब्राह्मणों का रविवार को क्षत्रियों का भौमवार को 
वैश्यों और शूद्रों का शनिवार
को चूड़ाकरण करना चाहिए। ये तीनों वार वर्ण विशेष के लिए ही ग्राह्य हैं अन्यथा सभी वर्ण वालों के लिए बुध, गुरु, शुक्रवार और शुक्लपक्ष का सोमवार प्रशस्त माना गया है। कृष्णपक्ष का सोमवार प्रशस्त नहीं होता हैं।
रेवती-अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, ज्येष्ठा, मृगशिरा, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा इन १२ नक्षत्रों में चौल (चूड़ाकरण) शुभकारक होता है। लग्न से सप्तम में सूर्य, भौम, शनि और शुक्र तथा अष्टम में शुक्र के विना सभी ग्रह मृत्युकारक होते हैं ।
अर्थात् शुक्र ७ में अशुभ परन्तु ८ में शुभ होता है। चन्द्रमा को छोड़कर कोई भी ग्रह १२ में शुभ होता है। अर्थात् चन्द्रमा १२ में शुभ नहीं होता है। चुड़ाकरण में लग्न बल पूर्ववत् विचारना चाहिए जैसे षष्ठी, पूर्णिमा और रिक्ता तिथि रात्रि और सन्ध्यासमय इत्यादि का विचार करना चाहिए ।।११।।

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