विभिन्न रोगों के योग -
अष्टमेश चन्द्र राहू व केतु युक्त से चौथिया ज्वर,
द्वितीय भावस्थ चन्द्र से शीत सम्बंधी रोग,
शनि से दृष्ट मंगल दशम में हो तो रोग,
पापग्रहों के मध्य चन्द्र हो और सप्तम में शनि हो तो क्षय,
श्वास, गुल्म आदि रोग होता है
षष्ठ में राहू केन्द्र में शनि और अष्टम में लग्नेश हो तो 26 वर्ष में क्षय रोग होता है।
पापग्रह युत दृष्टि चन्द्र वृष व कर्क राशि में होने से हृदय रोग,
पंचम भाव और पाप्युक्त दृष्ट रोग,
छठे शनि से गुल्मरोग,
छठे आठवें भाव में शनि चन्द्र के योग से पीलिया रोग,
शनि मंगल के मध्य चन्द्र और मकर में शनि हो तो कैंसर,
प्लीहा, गुल्म आदि रोग,
चन्द्र मंगल का योग छठे भाव में हो तो वायु विकार से पाण्डु रोग,
षष्ठेश तृतीय भाव में हो तो नाभि में दृढ़ रोग,
पंचमस्थ मंगल से अग्नि व शस्त्र से पीड़ा तथा सन्तान का विनाश,
सूर्य मंगल की युति रिपु भाव में होने से शल्य चिकित्सा, शस्त्राघात, प्रमेह, अग्नि और विष जन्य मे से कोई रोग होता है।
मिथुन कन्या राशि में लग्नेश बुध से दृष्ट हो तो गुप्त स्थान में फोड़ा होता है।
तृतीय में शनि पापदृष्ट हो तो बाहु में चोट लगे तथा छोटे भाई को गण्डमाला रोग हो।
रोगेश शनि के साथ होने से पत्थर या चौपायों से, कार, मोटर आदि से चोट लगे।
रोगेश 4,8,12 राशि में बुध से दृष्ट होने पर मूत्र रोग।
७वें शुक्र होने पर उपदंश रोग। 7,8 भावमें शुक्र होने पर गुप्तांग में रोग।
राहू गुरु का योग ७ वें भाव में होने पर नपुंसकता का रोग।
कर्क या वृश्चिक नवमांश में चन्द्र होने पर गुप्तांग में रोग।
गुरु व्यय में होने पर रोग पकड़ में नहीं आता।
चन्द्र व्यय में और अष्टम में पापग्रह से गुप्तांग में पीड़ा।
अष्टमेश 7 वें और रोगेश 8 वें हो तो गुदा से रक्त बहने का रोग होता है।
कर्क राशि में सूर्य शनि से दृष्टि होने पर बवासीर रोग, चन्द्र की दशा में छठे भाव में शुक्र या धन भाव में राहू सूर्य का योग हो तो संग्रहणी रोग होता है।
चन्द्र व्यय भाव में शनि के साथ होने पर पागलपन का योग बनता है।
रोगेश रोग भाव में या दशवें भाव में और लग्न पर मंगल की दृष्टि होने से जादू टोना से रोग होता है।
सिंह लग्न में चन्द्र पाप दृष्ट होने पर दन्तरोग या मस्तक में रोग होता है।
सिंह लग्न में सूर्य लग्न होने पर रतौंध रोग होता है।
चन्द्र और शुक्र छठे भाव में होने पर रात्रि में अंधापन का रोग।
सूर्य का चन्द्र, शनि का योग 6 या 8 वें भाव में होने पर हाथ में पीड़ा का योग।
स्त्री की कुण्डली में सप्तम भाव बुध या शनि से दृष्टि हो अथवा शुक्र 6,8,12 वें भाव में हो अथवा सप्तमेश मंगल के नवमांश में या रोगेश बुध से युक्त हो और लग्नेश रोग भाव में हो।
रोगेश के साथ शुक्र नीच का हो तो गुप्तांग में रोग अवश्य होता है।
मिथुन या कन्या राशि में बुध केन्द्र में तो शरीर में दुर्गन्ध अथवा शुक्र शनि की राशि में होने पर यह रोग होता है।
लग्न में शनि, राहू या धन में शनि राहू या क्षीण चन्द्र मंगल राहू या शनि से दृष्ट 6,8,12 भाव में हों तो पिशाच पीड़ा से रोग होता है।
लग्नेश बुध से दृष्ट हो तो गुप्त स्थान में व्रणा (फोड़ा) होता है।
तृतीय में शनि पाप दृष्ट हो तो बाहुमें चोर लगे तथा छोटे भाई को गंडमाला रोग हो।
रोगेश शनि के साथ होने से पत्थर या चौपायों से कार मोटर आदि से चोट लगे।
रोगेश 4,8,12 राशि में बुध से दृष्ट होने पर मूत्ररोग। सातवे शुक्र होने पर उपदंश रोग।
7, 8 भाव में शुक्र होने पर गुप्ताग में रोग।
राहु गुरु का योग सातवे होने पर नपुंसकता का रोग।
कर्क या वृश्चिक्र नवमांश में चन्द्र होने पर गुप्तांग में रोग।
गुरु व्यय में होने पर रोग पकड़ में नहीं आता।
चन्द्र व्यय में और अष्टम में पाप ग्रह से गुप्तांग में पीड़ा अष्टमेश 7 वे और रोगेश 8 वे होतो गुदा से रक्त बहने का रोग हो।
कर्क राशि में सूर्य शनि से हष्ट होने पर बवासीर रोग चन्द्र की दशा में भाव में या छठे भाव में शुक्र या धन भाव में राहुसूर्य का योग हो तो संग्रहणी रोग होना है।
चन्द्र व्यय भाव में शनि के साथ होने पर पागल पन का योग बनता है।
रोगेश रोग भाव में या 10 वे भाव में और लग्न पर मंगल की दृष्टि से जादूलग्नेश बुध से दृष्ट हो तो गुप्त स्थान में व्रणा (फोड़ा) होता है।
तृतीय में शनि पाप दृष्ट हो तो बाहुमें चोर लगे तथा छोटे भाई को गंडमाला रोग हो।
रोगेश शनि के साथ होने से पत्थर या चौपायों से कार मोटर आदि से चोट लगे।
रोगेश 4,8,12 राशि में बुध से दृष्ट होने पर मूत्ररोग। सातवे शुक्र होने पर उपदंश रोग।
7, 8 भाव में शुक्र होने पर गुप्ताग में रोग। राहु गुरु का योग सातवे होने पर नपुंसकता का रोग। कर्क या वृश्चिक्र नवमांश में चन्द्र होने पर गुप्तांग में रोग।
गुरु व्यय में होने पर रोग पकड़ में नहीं आता। चन्द्र व्यय में और अष्टम में पाप ग्रह से गुप्तांग में पीड़ा अष्टमेश 7 वे और रोगेश 8 वे होतो गुदा से रक्त बहने का रोग हो।
कर्क राशि में सूर्य शनि से हष्ट होने पर बवासीर रोग चन्द्र की दशा में भाव में या छठे भाव में शुक्र या धन भाव में राहुसूर्य का योग हो तो संग्रहणी रोग होना है।
चन्द्र व्यय भाव में शनि के साथ होने पर पागल पन का योग बनता है।
रोगेश रोग भाव में या 10 वे भाव में और लग्न पर मंगल की दृष्टि से जादू
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