मातृ स्नेह योग-
01. लग्नेश और चतुर्थेश में मित्रता हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो।
02. केन्द्रस्थ चतुर्थेश, लग्नेश से दृष्ट हो और शुभग्रहों से भी दृश्य एवं युत हो।
मातृ सुख हानि योग -
01. चन्द्र 6,8,12 वें भाव में तृतीयेश के साथ।02. मंगल 6ठे भाव में, श. में चतुर्थ में, चं.मं. द्वादश में, सूर्य चतुर्थ में। चन्द्र से चौथे गुरु। चन्द्र से द्वितीय में शनि। चन्द्र से 4 और 7 वें राहु। तृतीयेश चतुर्थ में। चतुर्थेश षष्ठ में मातापिता का धन नाशक। चतुर्थेश अष्टम में मातृ-पितृ सुख रहित। चतुर्थेश पापयुक्त। चन्द्र और चतुर्थेश 6,8,12, स्थान में पाप दृष्ट से माता की मृत्यु। दशम में पापी षष्ठेश। अष्टमेश दशन में 1,2,3,8,12 भाप में परामेश। 1,6 भाव में दशमेश माता पर पुरुषगामिनी। 4,10वें व्ययेश। चन्द्र मंगल नवम भाव में। नवमेश और चतुर्थेश 6,8,12 से माता-पिता को अनिष्ट ।। एवं 4थे सूर्य चन्द्र। लग्न या चन्द्र से 9 वें 4 थे, सूर्य चन्द्र।लग्न या चन्द्र से 9 वे भाव में शनि पापयुत दृष्ट माता पिता को अरिष्ठ सप्तम में सूर्य मं. श। लग्न से 4 थे मंगत। क्षीण चन्द्र 7 वे राहु केतु युत क्षीणचन्द्र नवमांश में। चन्द्र पापयुत या चन्द्र से अष्टम में पापग्रह 4 थे पापग्रह ।। शनि पापग्रह की राशि में पापयुत दृष्ट माता की मृत्यु चन्द्र पाप ग्रह दृष्ट शुभ दृष्टि रहित माता की मृत्यु। चन्द्र पापग्रह दृष्ट शुभ दृष्टि रहित। माता की मृत्यु। सिंह में मंगल कन्या मुं शुक्र तुला में शनि माता की मृत्यु। चन्द्र पापग्रह दृष्ट शुभ दृष्टि रहित माता की मृत्यु। लग्न में गुरु 2 रे मंगल 3 रे शुक्र माता की मृत्यु। सिंह में मंगल कन्या में शुक्र तुला में शनि माता की मृत्यु। चन्द्र पापयुत शनि से दृष्ट से बाल्यावस्था में माता की मृत्यु, कर्कराशि में सूर्य, मंगल गहू से बाल्यावस्था में माता की मृत्यु, सिंह राशि में शनि 8 वे गुरु 10 वें मंगल माता की मृत्यु। 7 वें उच्च या नीच का सूर्य माता को अरिष्ट। चतुर्थेश षष्ठ में या चतुर्थेश लग्नेश से षष्ठ में माता से विरोध। 4 सूर्य 5 वे चन्द्र मातृकष्ट । चन्द्र पापाक्रान्त से मातृकष्ट। क्षीणचन्द्र 5 वे में मातृकष्ट। चन्द्र पापाक्रान्त से मातृकष्ट। क्षीणचन्द्र 5 वे अष्टम में पापग्रह मातृकष्ट। लग्न में मंगल लग्न से 3 रे या 7वें सूर्यमातृ कष्ट। चन्द्र से 7 वे शनि 8 वें गुरु मातृ कष्ट।
मातृकष्ट योग -
धनेश चतुर्थ में। चन्द्र से चतुर्थ बुध। चन्द्र से 10 वे शुक्र। धनेश दशम में। तृतीयेश दशम में। चतुर्थेश पंचम में। पंचमेश दशम में। दशमेश दशम में। लाभेश 4थे । लाभेश 10 वे। चतुर्थ में चन्द्र या शुक्र बली 7 वें या 10 वें बुध। चन्द्र बलवान हो। चन्द्र शुभग्रह युत। चतुर्थ से केन्द्र में शुभग्रह। पंचमेश दशम में । नवमेश दशम में। चतुर्थ में दशमेश।
मातृ निधन योग -
01. चन्द्र से चतुर्थ में पापग्रह हो और शुभ ग्रह रहित हो या द्रष्ट न हो तो माता का निधन 9 मास की अवधि में।
02. सूर्य चन्द्र ४थें शनि ७वें और दोनों के साथ पाप ग्रह हो या पाप ग्रहों से द्रष्ट हो तथा चतुर्थेश पापयुतद्रष्ट हो
03. यदि सूर्य पाप ग्रहों के साथ चन्द्रमा से दशम स्थान में हो।
04. यदि सूर्य या मंगल अष्टम भाव में और चन्द्रमा क्षीण अवस्था में उस पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो शुभ ग्रहों से दृश्य नहीं हो।
05. चन्द्र ६वें स्थान में सूर्य, गंगल, शनि के साथ रिश्थत हो।
06. यदि सूर्य मंगल या शनि सप्तम में हो।
07. क्षीण चन्द्र राहु केतु के साथ हो।'
08. चन्द्र, सूर्य, शनि चतुर्थ में मंगल सप्तम में हो।
09. सप्तम भाव में चन्द्र के साथ शनि, मंगल हों।
10. गुरु लग्न में चन्द्र 6वें शनि से दृश्य हो अर्थात गुरु या चन्द्र, शनि से दृश्य।
11. चन्द्र या शुक्र पापग्रहों से घिरा हुआ हो।
12. रात्रि में जन्म हो चन्द्र से त्रिकोण में शनि हो।
13. दिन में जन्म हो शुक्र और मंगल पापयुक्त हो।
पितृ पक्ष विचार -
पिता का विचार नवम भाव नवमेश और सूर्य होता है। कुछ विद्वान् दशम भाव से भी पिता का विचार करते हैं, इसका प्रचलन अधिक है
01. दशम में मंगल भाग्येश नीच राशिगत से पितानिधन होता है।
02. पिता की दशम भावगत राशि में पुत्र का जन्म हो तो पुत्र पिता के तुल्य होता है।
03. यदि पिता पुत्र का एक ही लग्न में जन्म हो अथवा दोनों की एक ही राशि हो अथवा पिता के तृतीया भावगत राशि में पुत्र का जन्म हो तो पुत्र को पैतृक धन प्राप्त होता है।
04. पितृ कारक ग्रह सूर्य दशम में होने पर भी पैतृक धन प्राप्त होता है।
05. पिता के ६ठे या आठवें भाव की राशि में पुत्र का जन्म पिता से द्वेष कारक होता है।
06. यदि पुत्र का जन्म पिता के जन्म नक्षत्र में अथवा जन्म नक्षत्र से एक नक्षत्र आगे या पीछे के नक्षत्र में जन्म हो तो पुत्र विदेश में रहने से पुत्र वियोग से पिता दुःखी रहता है।
07. यदि पुत्र का जन्म पिता के जन्म नक्षत्र से 8वें, 9वें, 10वें नक्षत्र में हो तो पिता दीर्घ जीवी और पुत्र पिता की सेवा करता है।
08. यदि पुत्र का जन्म पिता की नवम एकादश, द्वितीय या तृतीय भावगत राशि में जन्म हो तो पुत्र आज्ञाकारी होता है।
09. यदि चतुर्थेश और षष्ठेश नवम भाव में हो तो पिता भोगविलासी होता है।
10. चतुर्थेश और नवमेश चतुर्थ भाव में होने पर भी पिता भोगी और विलासी होता है।
पितृ विरोध योग -
01. तृतीयेश चतुर्थ में पितृधन नाशक।
02. धनभाव में चतुर्थेश पिता से विरोध।
03. चतुर्थेश षष्ठ भाव में पितृधन नाशक।
04. चतुर्थेश 7 वें पिता के धन का त्याग।
05. चतुर्थ में षष्ठेश या सप्तमेश पिता से विरोध, या अष्टमेश चतुर्थ में।
06. लाभेश दशम में पिता से विरोध।
07. व्ययेश पंचम में पिता से विरोध।
08. चतुर्थेश 6,8,12वें भाव में पितृसुख से हानि।
09. दशमेश सूर्य के साथ होने से पिता की शीघ्र मृत्यु।
10. लग्न में शनि, षष्ठ चन्द्र में, सप्तम में मंगल से पिता से विरोध ।
11. शनि अष्टमेश नवमेश हो, शुभग्रह से युत दृष्ट नहीं हो और अष्टमभाव में सूर्य हो प्रथम वर्ष में ही पिता की मृत्यु।
12. अष्टमेश नवम में व्ययेश लग्न में सूर्य 6,8,12 वे भाव में हो तो जन्म से पूर्व ही पिता की मृत्यु।
13. पंचमेश 6,8,12 वे भाव में हो तो पिता से शत्रुता।
14. नवम भाव में सूर्य मंगल शनि केतु में से कोई भी हो तो पितृ सुख में हानि।
पितृ निधन योग -
01. 9 वें या पंचम में क्रूर राशि में सूर्य स्थित हो तो पिता की, यदि चन्द्र हो तो माता की, मंगल से भाई की, बुध से मामा की, गुरु से नानी की, शुक्र से नाना की, शनि से स्वयं की, मृत्यु वाल्यावस्था में होती है।
02. मंगल सूर्य एक साथ हों तथा शनि द्रष्ट हो तो पितृ निधन
03. नवमस्थ राहु पर सूर्य, मंगल अथवा शनि की दृष्टि हो।
केतु की दृष्टि हो। हो और जन्म समय में राह या केतु की 04. लग्न से नवमस्थान में राहु राहु या केतु हो
05. शनि और मंगल सूर्य से अष्टमस्थ शुभ दृष्टि रहित हो।
06. नवम भावस्थ सूर्य पापयुत हो और सूर्य की दशा का जन्म हो।
07. नवमेश और राहु परस्पर षडाष्टक में हो तो जन्म समय में नवमेश या राहु की दशा हो।
08. राहु नवम भावस्थ हो उसके साथ कोई उच्च राशि का ग्रह बैठा हो।
09. सूर्य से दशमस्थ पाप ग्रह और दशमेश पापयुत हो।
10. सूर्य से 4, 6, 8 भाव में पाप ग्रहों और साथ में शुभ ग्रह नहीं हो।
11. केतु 4,5,9वें भाव में पाप द्रष्ट हो।
12. सूर्य मंगल के नवमांश में हो तथा शनि से दृश्य हो तो बालक के जन्म के पूर्व ही पिता की मृत्यु ।
13. सूर्य शनि, मंगल एकत्र स्थित हो।
14. दिन का जन्म हो सूर्य, मंगल से दृश्य हो। यदि रात्रि का जन्म हो तो शुक्र मंगल से दृश्य हो तो पिता की मृत्यु ।
15. चर राशिगत सूर्य और शुक्र मंगल से दृश्य हो या मंगल के साथ हो तो पिता की मृत्यु विदेश में जन्म से पूर्व ही हो जाती है।
16. जन्म समय रात्रि में हो और चर राशिगत शनि और मंगल होने से पिता की मृत्यु विदेश में होती है।
भ्रातृ-भगिनी योग -
तृतीय स्थान से छोटे भाई-बहिन का और एकादश स्थान से बड़ी बहिन व बड़े भाई का विचार होता है। मंगल भ्रातृ कारक है, तृतीयेश और तृतीय स्थान गत ग्रह तथा तृतीय स्थान शुभाशुभ ग्रह से दृष्ट होने से भाई बहिन का विचार करना चाहिये।
01. तृतीय स्थान में शुभ ग्रह हो अथवा शुभ ग्रह की दृष्टि से अथवा तृतीयेश के उच्चस्थ होने तथा शुभ ग्रह की उस पर दृष्टि होने से छोटे भाई बहिन का सुख प्राप्त होता है।
02. तृतीयेश और मंगल सम राशि में होने से जातक के बहिन अधिक होती है।
03. तृतीय भाव व भावेश पापयुत दृष्ट हो और मंगल 12वें हो तथा तृतीयेश व तृतीय भाव के दूसरे और 12वें भाव में पाप ग्रह हो अथवा पाप ग्रह की दृष्टि हो तो भाई बहिन की मृत्यु होती है।
04. तृतीयेश नीच राशिगत हो अथवा तृतीया भाव में शनि हो तृतीया स्थान व तृतीयेश पापाक्रान्त पापयुत दृश्य हो और शुभग्रह से युक्त व दृष्टि संबंध नहीं हो तो भाई बहिन की मृत्यु व सुख में बाधा होती है।
05. तृतीयेश व मंगल 3रे 6वें 12वें शुभग्रह से दृश्य नहीं हो तो भ्रातृ सुख की हानि।
06. राहु व केतु के साथ तृतीयेश 6,8,12 भाव में हो भ्रातृ सुख का अभाव।
07. यदि एकादश भाव में शुभ ग्रह हो एकादशेश 6,8,12 भाव में नहीं हो बड़े भाई का सुख मिलता है स्त्रीसंज्ञक राशि व ग्रह से बहिन का विचार करें।
08. सूर्य तृतीय भाव में पापग्रह से दृश्य हो तो बड़े भाई का, शनि तृतीय में पाप दृश्य हो तो अनुज का, मंगल तृतीय में पापदृश्य हो तो अग्रज व अनुज का नाश करता है।
09. तृतीयेश और मंगल पर शनि की दृष्टि से माता का नाश, इसी प्रकार चन्द्र पर शुभग्रह की दृष्टि नहीं पड़े पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो माता का विनाश।
10. तृतीयस्थान में केतु के साथ चन्द्र का योग लक्ष्मी प्रद और अकेला राहु तृतीय में भाई के लिये अशुभ होता है।11. मंगल तृतीयेश तृतीय राशिगत के नवमांश सम राशि के होने पर अधिक बहिन होने का योग बनता है।
13. तृतीयेश और चतुर्थेश मंगल के साथ होने से छोटे भाई का योग होता है।
14. नवम भावस्थ सिंह राशि का सूर्य भ्रातृ नाश करता है यदि दैवात् भाई बच जाय तो वह विख्यात पुरुष होता है।
15. मंगल षष्ठेश के और पाप ग्रह के साथ हो और द्वितीयेश बली होकर अष्टम भाव गत हो तो सौतेले भाई का होने का योग बनता है।
16. 2,3,7,9 भावों के स्वामी की दशा व अन्तर्दशा में भ्राता उत्पन्न होते हैं।
17. तृतीयेश, तृतीयस्थ ग्रह जिस राशि में हो उसके स्वामी की दशा में भी भ्राता की उत्पत्ति होती है।
18. लग्नेश व तृतीयेश मित्रता पंचम मैत्री में हो तो भ्रातृ प्रेम और शत्रुता से भ्रातृ द्वेष अर्थात् भाइयों से अनबन रहती है।
19. लग्नेश, तृतीयेश और मंगल इन तीनों में कोई स्वराशिस्थ उच्चस्थ मूल त्रिकोण व मित्र गृही होने से भाई सुखी रहते हैं।
20. तृतीयेश का राहु केतु साथ 6,8,12 स्थान में होना भ्रातृ विनाशक होता है।
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