काल सर्प योग का इतिहास
काल सर्प योग के विषय में ज्ञानवर्धन के पूर्व इन दोषों के मूल कारक ग्रह राहु एवं केतु के विषय में जान लेना आवश्यक प्रतीत होता है जिससे आम जन के मानस पर काल सर्प योग की भ्रान्तियों एवं उसके कारण उत्पन्न भय का विधिवत निवारण हो सके ।
स्वायंभुव मनु के अंतिम प्रजापति दक्ष के 60 कन्यायें थीं। उनमें से तेरह कश्यप को, दस यम को, सत्ताइस चन्द्र को, चार अरिष्ठनेमि को, दो भृगु पुत्र को, दो कृशाश्व को और दो अंगिरा को दी गयी थीं। प्रजापति दक्ष की सबसे बड़ी पुत्री दिति थी। दिति का विवाह कश्यप से हुआ था। दिति एवं कश्यप के संयोग से चार पुत्र क्रमशः 1. हिरण्यकशिपु, 2 हिण्याक्ष, 3. व्रज्रांग और 4. अन्ध्रक एवं दो पुत्री क्रमशः सिंहिका व होलिका हुई। दिति से उत्पन्न होने के कारण ये दैत्य कहलाये और उन चारों पुत्रों से दैत्य वंश चला। हिरण्यकशिपु के चार पुत्र हुए उनमें सबसे बड़े प्रह्लाद थे ।
प्रजापति दक्ष की एक पुत्री दनु थी, दनु का विवाह भी कश्यप से हुआ था एवं दनु तथा कयश्प के संयोग से अनेक पुत्र हुए अतः दनु के नाम से दानव वंश चला इन्हीं दानव पुत्रों में विप्रचित्ति नाम के दानव का विवाह हिरण्यकशिपु नामक दैत्य की बहिन सिंहिका से हुआ, इस प्रकार सिंहिका एवं विप्रचित्ति के संयोग से तेरह बीर पुत्र हुए और वे सब सिंहिका के नाम से सैंहिकेय कहलाये उनमें से एक पुत्र राहु था जो उन सभी में भंयकर प्रसिद्ध हुआ। वह एक वीर योद्धा होने के साथ-साथ भगवान् शिव का अनन्य भक्त भी था। और भगवान् शिव के अनुग्रह से ही उसे इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति प्राप्त थी।
एक समय जब समुद्र मन्थन किया जा रहा था तो एक ओर दानव व दैत्य थे एवं दूसरी ओर देवगण। यहाँ देवताओं की उत्पत्ति के विषय - ये देवता भी प्रजापति दक्ष की दूसरी पुत्री अदिति जो कि कश्यप को ही दी गई थी से ही उत्पन्न हुए जो संख्या में बारह थे। और अदिति से उत्पन्न होने के कारण इन्हें आदित्य कहा गया। वर्तमान में जितने भी देव हैं वे सब इन्हीं के वंशज हैं। समुद्र मंथन में जिस वासुकी नामक नाग को रस्सी के रूप में बांधकर प्रयोग किया गया था वह भी प्रजापति दक्ष की पुत्री कद्रू एवं कश्यप की संतान थी। क्योंकि कद्रू एवं कश्यप के संयोग से ही छब्बीस नग वंश चले। जिनमें प्रमुख थे शेषनाग, वासुकी, कर्कोट, धृतराष्ट्र, धनंजय, महानील, अश्वतर, पुष्पदंत, शंखरोमा आदि। इस प्रकार समुद्र मंथन में प्रजापति दक्ष की कन्याओं एवं कश्यप से उत्पन्न परिवार ही सम्मलित था।
समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत निकला तो उसका पान करने के लिये सभी देव, दैत्य, दानव एवं नाग आदि में होड़ लग गयी देवताओं ने चालाकी वश सबको लाइन में बैठा दिया जिसमें क्रमशः पहले देव बैठे फिर दानव तथा दैत्य आदि। जब मोहिनी रूपी विष्णु जी द्वारा अमृत पान कराया जाने लगा तो उसकी शुरूआत दोवताओं की ओर से की गयी। दानवों में बैठे राहु ने देवताओं की मंशा भॉप ली तथा अपना रूप बदलकर देवताओं जैसा कर लिया। एवं सूर्य तथा चन्द्रमा के मध्य जाकर बैठ गये। इन्द्रादि देवता भी राहु के परिवर्तित रूप को नहीं पहचान पाये। किन्तु अपने अधिक निकट बैठे होने के कारण सूर्य एवं चन्द्रमा ने राहु को पहचान लिया एवं मोहिनी रूपी विष्णु जी को चन्द्रमा ने इशारा कर दिया किन्तु तब तक राहु अमृत पी चुके थे। राहु के पहचाने जाने पर विष्णु जी ने तुरन्त सुदर्शन चक्र से राहु का सिर काट दिया जिसके परिणाम स्वरूप राहु का सिर व धड़ अलग-अलग हो गया। किन्तु अमृत पान करने से राहु मरा नहीं। इस प्रकार राहु का सिर राहु व धड़ (कवन्ध) केतु ग्रह के नाम से प्रसिद्ध हुआ। राहु का सिर कटते ही वह अपने असली रूप में आ गया जिसे देखते ही दैत्य एवं दानव जोर-जोर से गर्जना करने लगे एवं देवताओं को युद्ध के लिये ललकारने लगे।
महाबली, महाकाय राहु चुगली करने वाले चन्द्रमा के पीछे उन्हें अपना ग्रास बनाने दोड़ा एवं अपने मायावी रूप से सभी देवताओं को पीड़ा देने लगा उधर दैत्य व दानवों को युद्ध हेतु उद्यत देख देवता लोग चन्द्रमा को अकेला छोड़ स्वर्ग लोक को भाग खड़े हुए। चन्द्रमा ने जब इस तरह देवताओं को मैदान छोड़ते देखा तो वह भी झट-पट राहु से नजर बचाकर स्वर्ग लोक पहुँच गया किन्तु पराक्रमी राहु भी कहाँ मानने वाले थे, वह भी चन्द्रमा के पीछे-पीछे उसे ग्रसने स्वर्ग लोक पहुँच गये। चन्द्रमा ने जब यह देखा कि ये देवता मेरी रक्षा नहीं करेंगे तो मन ही मन दृढ निश्चय कर भगवान् शिव की शरण में जा पहुँचा और आर्तनाद से प्रार्थना करते हुए 'ॐ नमः शिवाय मन्त्र का जाप करने लगा। भगवान् शिव ठहरे आशुतोष सो तुरन्त ही प्रगट हो गये और बोले तुम्हारी राहु से रक्षा हम करेंगे तुम वक्र रूप धारण कर हमारे मस्तक पर आ जाओ। चन्द्रमा ने तुरन्त बिना विलम्ब के शिव आज्ञा का पालन किया और शिव मस्तक पर वक्र रूप में शोभायमान हो गये। इतने में ही राहु चन्द्रमा का पीछा करते हुए भगवान् शूलपाणी के पास जा पहुँचा और चन्द्रमा को वक्र रूप में शिव के मस्तक पर शोभायमान देख सब-कुछ समझ गया तथापि राहु भगवान् शिव से यों बोला, आशुतोष आप ही परब्रह्म परमपिता परमात्मा हैं, मैं आपको बारम्बार प्रणाम करता हूँ आप सब भूत, प्रेत, दैत्य, दावन, किन्नर आदि के पालक हैं, आपको प्रणाम है। मैं आपका परम भक्त हूँ और मेरी यह दुर्गती इस चन्द्रमा की चुगली के कारण हुई है, अतः यह मेरा ग्रास है कृपा कर आप चन्द्रमा को मेरे हवाले कर दें। राहु के इस प्रकार अनुनय विनय करने पर भगवान् शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और राहु से इस प्रकार बोले, प्रिय भक्त राहु में तुझ पर प्रसन्न हूँ, मैं सम्पूर्ण भूतों का आश्रयदाता हूँ। देवता और असुर, नाग और गंर्धव सभी मुझे प्रिय है। अतः तुम चन्द्रमा को क्षमा करो और मेरे गले का हार बन जाओ।
राहु भगवान् गङ्गाधर शिव के अनन्य भक्त थे सो उनका आदेश कैसे टालते, वे तुरन्त सर्प का रूप धारण कर भगवान् शिव के गले में जा लिपटे । राहु रूपी सर्प के शिव के गले में लिपटते ही चन्द्रमा ने भय के कारण अमृत का स्त्राव कर दिया जिसे राहु ने अनेक सिरों से ग्रहण कर लिया। अतः यदि आप राहु के इष्ट भगवान् शिव की अराधना करते हैं और 'ॐ नमः शिवाय' मन्त्र का जाप करते हैं साथ ही सात मुखी रुद्राक्ष को गले में धारण करते हैं तो राहु व केतु के योग से बनने वाले काल सर्प योग के कारण आपकी पीड़ा का निवारण स्वतः ही हो जाता है एवं राहु आपको कष्ट देने के बजाय आपके अनुकूल हो जाते हैं। काल सर्प योग कुण्डली में तब बनता है जब राहु और केतु बाकी बचे सातों ग्रहों को कुण्डली में एक ओर कर स्वयं आगे हो जाते हैं तथा राहु एवं केतु के आगे कोई भी ग्रह नहीं रहता। उदाहरण के लिये एक कुण्डली दी जा रही है जिससे आप आसानी से अपनी कुण्डली में कालसर्प योग है अथवा नहीं पहचान सकते हैं।
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