Wednesday, July 22, 2026

काल सर्प योग की वास्तविकता 

पिछले एक दशक से ज्योतिषविदों में जो सर्वाधिक चर्चित विषय रहा वह था "कालसर्प योग" इस योग के विषय में प्राचीन एवं नवीन विचारधारा वाले ज्योतिषशास्त्रियों ने अनेक शास्त्रों एवं ज्योतिष संबंधी साहित्यों की व्याख्यायें की, भिन्न-भिन्न तर्क प्रस्तुत किये, विचार तथा फलादेश समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित किये। कुछ लोगों ने तो बड़ी-बड़ी पुस्तकों की रचना कर अपनी जेब गर्म कर ली। 
प्राचीन ज्योतिष ग्रन्थों जैसे भ्रगु संहिता, रावण संहिता एवं वैदिक साहित्य के ज्योतिष संबंधी अध्यायों में 'कालसर्प योग' नाम से किसी भी ग्रह योग की गणना नहीं की गई है।
आधुनिक ज्योतिष शास्त्र में जो 'कालसर्प योग' की ग्रह स्थिति दर्शायी गयी है। ठीक वही स्थिति प्राचीन ज्योतिष ग्रन्थों में भी है, किन्तु उन्हें राहु और केतु द्वारा निर्मित ग्रहयोग के अन्तर्गत क्रमशः राहु की दशा एवं केतु की दशा बताकर फलादेश की गणना की गयी है। इस प्रकार यदि 'कालसर्प दोष' से पीड़ित जातक की कुण्डली के फलादेश का अध्ययन करें तो वह वही फलादेश निकलता है जो प्राचीन ज्योतिष ग्रन्थों के राहु एवं केतु की दशा होने पर था।
जन्म पत्रिका में जब सभी सातों ग्रह राहु और केतु के एक ही ओर स्थित हो जाते हैं तब 'कालसर्प योग' बनता है। चूंकि प्राचीन वैदिक साहित्य के अनुसार राहु और केतु छाया ग्रह होकर एक ही है राहु सिर है तो केतु उसका धड़। राहु का अधिदेवता काल है और प्रति अधिदेवता 'सर्प है इसलिये शायद आधुनिक ज्योतिष शास्त्रियों ने राहु और केतु के योग से बनने वाले इस विशेष ग्रह योग को 'कालसर्प योग' की संज्ञा दी होगी।
'कालसर्प योग' जिस भी जातक की कुण्डली में बनता है, निःसंदेह वह व्यक्ति सामान्य जन से कुछ विशिष्टतायें लिये हुये होता है। वह व्यक्ति समाज पर अपनी अलग छाप छोड़ता है। चाहे वह अच्छी हो अथवा बुरी। यदि हम कुछ महान व्यक्तियों की जन्म-पत्रिकाओं का अवलोकन करें तो जहाँ एक ओर पण्डित जवाहर लाला नेहरू, मोरारजी देसाई, अब्दुल रहमान, आचार्य रजनीश, लता मंगेशकर, पूर्व प्रधान मंत्री चन्द्रशेखर और मुरारी बापू की जन्म पत्रिकाओं में 'कालसर्प योग' देखने को मिलता है। तो वहीं दूसरी ओर जयचन्द, मीर जाफर, हर्षद मेहता आदि अनेक ऐसे लोगों की भी जन्म पत्रिकाओं में 'कालसर्प योग था जिसके रहते ये गद्दारी एवं भ्रष्टाचार की ओर उन्मुख हुए।
'कालसर्प योग' से पीड़ित जातक के लिये यह आवश्यक है कि वह स‌द्मार्ग पर चलते हुए माता-पिता की यथा शक्ति सेवा करे एवं पितृगणों का यथा विधि तर्पण- श्राद्ध आदि करे इससे 'कालसर्प दोष' के अनकूल परिणाम देखने को मिलते हैं। साथ ही उक्त दोष से पीड़ित जातक को भगवान् शिव की अराधना के साथ-साथ 'सातमुखी रुद्राक्ष' को धारण करना चाहिये एवं "ॐ नमः शिवाय" महामन्त्र का रुद्राक्ष माला पर जप एवं लाल स्याही से कॉपी पर "ॐनमः शिवाय" मन्त्र का लिखित जप करना चाहिये। ऐसा करने वाले जातक की जन्म कुण्डली में कितना भी भयानक 'कालसर्प योग' हो जातक एक सामान्य व्यक्ति की तरह जीवन यापन करते हुए मानसिक रूप से शान्त एवं आनन्दित रहता है।

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