१. अनन्त कालसर्प योग
लग्न स्थान में राहु सप्तम स्थान में केतु अथवा लग्न में केतु सातवें राहु हो एवं सभी ग्रह उनके मध्य में होतो अनन्त नामक कालसर्प योग बनता है।
यह व्यक्ति स्वार्थी व कूटनीतिज्ञ होवे। राहु के साथ सूर्य, चन्द्र, मङ्गल हो तो क्रोधी होवे स्वास्थ्य मध्यम रहे, चोट दुर्घटना योग भी बने तथा अनकानेक कारणों से चिन्तित रहे। उसे मान हीं मिले गुप्त शत्रु बढ़े।
राहु के साथ बुध हो तो बड़बोला हो, शुक्र राहु शनि योग कुछ ऐसी घटनायें घटित करते हैं, जिससे व्यक्ति उदासीन होकर एकान्त पसन्द करते हैं।
यदि कुण्डली में अन्य शुभयोग हो तो व्यक्ति आध्यात्म की ओर बढ़ता है क्योंकि उसका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं होता।
सम्बन्ध विच्छेद या दोनों में वैमन्यस्ता पैदा करता है। यदि शुभ ग्रह स्त्री पक्ष को सुधारते हैं पत्नि रोगी रहे।
यदि लग्नेश सप्तमेश का आपस में केन्द्र, त्रिकोण, राशि परिवर्तन अथवा दृष्टि योग बनता है तो जीवन अधिक समय कष्टमय नहीं रहेगा।
इस कुण्डली में प्रत्येक घर में ग्रह होने से "माला योग" बनता है जो राजयोग देता है, अतः कालसर्प दोष अति न्यून रहेगा।
सन्तान घर पर राहु की दृष्टि होने से सन्तान की चिन्ता भी प्राप्त होती है।
यदि लग्र में केतु सातवें राहु हो तो गोचर भ्रमण से राहु वक्री होकर ग्रहों को अपना ग्रास बनायेगा, दूसरे ग्रह मार्गी होकर आगे बढ़ेंगे तो राहु के मुख में जायेंगे यह योग अधिक कमजोर होता है। अर्थात् दुष्परिणाम अधिक होंगे, जीवन संघर्षमय रहेगा।
No comments:
Post a Comment