Friday, July 17, 2026

कर्णवेध संस्कार

मंत्रः
क्षिप्रैः स्थिरभचरभैर्व्यानिलांभः
 पकक्ष-श्चैकाफापौष्विन
 शनिकुजर्झा शवारानपास्य ।।
रिक्तापर्वेश्वरवसुतिथीन् रात्रिसंध्ये 
समाब्दं, पुस्त्रोकणौ सविधि
 पटुना दक्षवामादि वेध्यौ ॥७॥

कर्णवेध जन्म से विषम वर्षों में करना चाहिए।

 यदि कन्या का कर्णवेध हो तो पहले बाँया कान छेदकर 

उसके बाद दाँया कान छेदना चाहिए ।

कर्णवेध संस्कार में

त्याज्य- स्वाती, शतभिषा,रोहिणी

सूर्य-शनि-भौमवार

सूर्य-शनि-भौम का लग्न नवांश

४।९।१४।११।८।१५।३० तिथि

रात्रिकाल

तथा प्रातःकाल

सन्ध्याकाल


ग्राह्य - स्थिर संज्ञक मैत्र संज्ञक

चर संज्ञक क्षिप्र संज्ञक नक्षत्र

चैत्र, कार्तिक, पौष, फाल्गुन मास

चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्रवार और 

इन के लग्ननवांश

१।२।३।६।७।१०।१२।१३

तिथियों में

पूर्वाह्न से अपराह्ण काल तक ।।

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