स्वभावदेव कालोऽयं शुभशुभ समन्वितः ।
अनादि निधतः सर्वो न निर्दोषो न निर्गुणः ।।
तस्मान्निर्दोषकालार्थे मुहूर्तमधिगच्छताम् ।
कालः शुभो गुणैर्युक्तो बलवद्विः शुभप्रदः ।।
संग्रहशिरोमणि अपने स्वभाव से ही यह काल शुभ और अशुभ लक्षणों से युक्त है। सब कुछ अनादि से प्रवर्तमान है और कुछ भी निर्दोष व निर्गुण नहीं है। इसीलिये निर्दोष काल के लिये मुहूर्त को आश्रित करना है जो शुभ गुणों से युक्त है और शुभ प्रद है।
संग्रहशिरोमणि में-
ग्रहणग्रहसंक्रान्तियज्ञाध्ययनकर्मणाम् ।
प्रयोजनं व्रतोद्वाहकियाणां कालनिर्णयः ।।
ग्रहणसाधन, ग्रहसाधन, संक्रान्ति निर्णय और यज्ञादि कर्मों का निर्वहण ये सभी कार्य व्रत विवाह आदि कार्यों के लिये उपयुक्त कालनिर्णय करने के लिये है। अर्थात् शुभ कर्मों के समय निर्णय करने के पक्ष के अभाव में उपर्युक्त सभी कार्य निष्फल है।
संग्रहशिरोमणि में -
शुभक्षणक्रियारम्भजनिताः पर्वसम्भवा ।
सम्पदस्सर्वलोकानां ज्योतिस्तत्र प्रयोजनम्।
शुभक्षण अर्थात् शुभ मुहूर्त में आरम्भ किये गये सभी कार्य सभी के लिये सर्व विध सम्पत्ति के कारक होते है और इस प्रकार सर्वविध सम्पत्ति प्राप्त करना ही ज्योतिष शास्त्र का प्रयोजन है।
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दिनमान / रात्रि मान के समय में
१५ का भाग देने पर जो समय प्राप्त होता है उसे १ मुहूर्त कहा जाता है।
गिरीशभुजगामित्राः पिन्यवस्वम्बुविश्वेभिजिदर्थ च विधातापीन्द्र इन्द्रानली च।
निऋतिरुदकनाथोप्यर्यमाथो भगः स्युः कमश इह मुहूर्ता वासरे बाणचन्द्रा ।।
अर्थात् एक दिन में 15 मुहूर्त होते है और कमशः गिरीश, सर्प, मित्र, पितृगण, वसु, जल, विश्वेदेव, ब्रह्म, विधाता, इन्द्र, इन्द्राग्नि, निऋति, वरुण, अर्यमा, भग ये 15 मुहूर्तों के स्वामी है।
इसी तरह रात्रिमान में भी 15 मुहूर्त होते है।
उनके भी स्वामी निर्धारित है। जैसे-
शिवोजपादादष्टी स्युर्मेशा अदितिजीवकौ।
विष्ण्वर्कत्वष्ट्रमरुतो मुहूर्ता निशि कीर्तिताः ।।
क्रमशः रात्रि के मुहूर्तों के शिव, अजपाद, अहिर्बुध्न्य, पूषा, अश्विनी कुमार, यम, अग्नि, ब्रह्म, चन्द्र, अदिति, जीव, विष्णु, अर्क, त्वाष्ट्र और मरुत् स्वामी है।
दुर्मुहूर्त -
दिन में और रात्रि में कहे गये पन्द्रह - पन्द्रह मुहूर्तों में वार के अनुसार कुछ दुष्टमुहूर्त व दुर्मुहूर्त कहे गये हैं।
जैसे -
रवावर्यमा ब्रह्मरक्षश्च सोमे कुजे
वहिनपित्र्ये बुधे चाभिजित् स्यात् ।
गुरौ तोयकक्षो भृगौ ब्राह्मपित्र्ये
शनावीशसार्यों मुहूर्ता निषिद्धाः ।।
दिनमान में और रात्रिमान में मुहूर्तों का विभाजन करके नाम जो दिये गये है। उनका प्रयोजन मुहूर्त चिन्तामणि में कहा गया है कि रविवार को अर्यमा नामक मुहूर्त सोमवार को ब्रह्मरक्ष, मंगलवार को वह्नि और पित्र्य, बुधवार को अभिजित्, गुरुवार को तोय और रक्ष, शुकवार को ब्रह्मरक्ष तथा पित्र्य, शनिवार को ईश और सर्प नामक मुहूर्त दुर्मुहूर्त कहे गये हैं। अतः ये सभी शुभ कर्मों में त्याज्य है। प्रायः सभी मुहूर्त ग्रन्थ जैसे मुहूर्त चिन्तामणि, पूर्वकालमृत, रत्नमाला और संहितास्कन्ध के नारदसंहिता आदि सभी ग्रन्थों में ये दिनसम्बन्धी और रात्रि सम्बन्धी मुहूर्त कहे गये हैं।
इन्हें चार्ट द्वारा इस प्रकार सरलता से जान सकते है-
वार - अशुभ मुहूर्त
रविवार -अर्थमा
सोमवार -ब्रह्मरक्ष
मंगलवार -वहिन और पित्र्य,
बुधवार - अभिजित
गुरुवार -तोय और रक्ष
शुक्रवार -ब्रह्मरक्ष तथा पित्र्य
शनिवार - ईश और सर्प
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