नामकरण संस्कार
किसी बालक का जन्म यदि जनना शौच या मरणा-शौच में हुआ हो तो उसका जातकर्म संस्कार अशौच निवृत्ति के पूर्व या पश्चात् भी किया जा सकता है। अश्विनी, पुष्य, अभिजित (क्षित्र संज्ञक), रोहिणी, तीनों उत्तरा ध्रुव संज्ञक, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा (चरसंज्ञक), मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा (मृदु संज्ञक), इन १७ नक्षत्रों में जातकर्म संस्कार करना चाहिए ।
जन्म से १२ वें दिन ब्राह्मणों के १६ वें दिन क्षत्रियों के २० वें दिन वैश्यों के तथा २२ वें दिन शूद्रों के बालकों का नामकरण संस्कार करना चाहिए या इससे अन्य दिनों में भी जातकर्मोक्त नक्षत्रों में नामकरण करना चाहिए। इसमें चरलग्न (मे० क० तु० म०), ४।६।१४।८ तिथि, भौम-शनिवार, द्वादश में कोई ग्रह हो वह लग्न, दिन का तीसरा भाग तथा रात्रिकाल अशुभ माना गया है ।॥५॥
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