Saturday, June 20, 2026

धनी योग -

धन भाव का विचार: लग्नेश, धनेश, लामेश और लाभ भात के कारक गुरु इन

चारों की स्थिति सुदृढ़ होने पर धन को प्रचुर मात्रा में प्राप्ति होती है। इन चारों की परस्पर युति, दृष्टि, अन्योन्य राशिगत, स्वराशि, उच्च व मित्र राशि एवं केन्द्र त्रिकोण में, स्थित प्रबल यनी योग बनती है। कुम्भ लग्न में सूर्य सप्तमेश होकर लाभस्थ हो और गुरु धनेश की सूर्य पर दृष्टि होने पर उच्चकोटि के धनाढ्य लड़की से विवाह होता है। कुछ विद्वान पूर्णचन्द्र जो कुम्भ लग्न में षष्ठेश है, वह कर्क राशि का है लाभेश से युति दृष्टि या अन्योन्य सम्बन्ध बनाता हो गुरू की तरह महाधनी योग बनाता है। कुम्भ लग्न में चतुर्थ भाव व चतुर्थेश से गुरु की युति या दृष्टि होने पर महाधनी योग बन जाता है।

12 गायों में से 1,2,4,5,7,0,10 भाव शुभ गाने गये हैं 3, 6,8,12 गाव अशुभ संज्ञक हैं। शुभ ग्रहों का बली होना, अर्थात् शुभ भावों के स्वामी स्वराशि के उदित केन्द्र और उच्च राशि के मित्र राशि के होकर शुभग्रह से युक्त या दृष्ट होने पर धन, सुख, भाग्य आदि की वृद्धि करते हैं एवं 3,6,8,12 भावों के स्वामी नीच अस्त पापयुत दृष्ट होने पर निर्बली हो जाते हैं। जो केन्द्र या त्रिकोण में स्थित होने पर धनप्रद योग में बाधक नहीं होते। इसके विपरीत अशुभ भाव के स्वामी बली होकर केन्द्र कोणगत हो जाते हैं, तो दरिद्रता, रोग, धनाभाव आदि योग कारक होते हैं। शुभ भावों के स्वामी निर्बली होकर केन्द्र त्रिकोणास्थ हों तो तन्दुरूस्ती धनी, प्रख्यात, सुखी आदि योगों का विनाश करते हैं।

लामेश पराशर की दृष्टि से अशुभत्व प्रदाता होता है, किन्तु धनप्रद योगों का सहायक होता है। मारकेश या अशुभत्व का दोष धन भाव में प्रदान नहीं करते। स्वास्थ्य सुखादि पर ही अशुभ फल करक होता है।

01. धनश शान 4,8,12 भाव म हा तथा बुध सप्तम में स्वगृहा हो, तो अकस्मात् द्रव्य प्राप्ति।

02. बुध की महादशा में शनि की अर्न्तदशा में विपुल द्रव्य प्राप्ति।

03. धनेश मंगल लाभ भावस्थ हो, तो बुद्धिबल से खूब द्रव्य का संचय करता है।

04. कर्क लग्न में गुरु तथा धन भाव में सूर्य हो तो लक्षाधिपति।
05. लग्नेश बलवान हो, नवमेश स्वगृहो हो, तो अटूट सम्पत्ति।
06. लग्न से पंचम में मिथुन या कन्या राशि हो तथा 11 वें चन्द्र मंगल का योग हो, तो महाधनी, किन्तु यह योग धनभाव में विपरीत पड़ता है।
07. बुध मंगल 11 वें लग्न से 5 वी राशे कुम्भ हो तो, सर्वदा धनी योग बनाता है। परन्तु 4 थे भाव में यह योग विपरीत होता है।
08. 11 वें चन्द्र, मंगल लग्न से 5 वीं राशि धनु या मीन हो तो लाभ, तुला या मकर (चं. मं.) योग लक्षाधिपति योग बनाता है, परन्तु 4 थे भाव में यह योग विपरीत होता है।
09. कुम्भ लग्न में एकादश भाव में चन्द्र, मंगल, का योग हो, महाधनी (धनु राशि में वं. मं.)
10. वृष लग्न में एकादश भाव में चन्द्र मंगल का योग महाधनी योग बनाता है।
11. कन्या लग्न में तथा तुला लग्न में एकादश भाव में बुध मंगल से महाधनी योग बनता है। (मंगल वक्री हो. तो अधिक प्रबल होगा)
12. मेष लग्न में पंचम भाव में सूर्य तथा 11 वें भाव में चन्द्र गुरु से धनी
13. सिंह लग्न में तथा वृश्चिक लग्न में 11वें भाव में चन्द्र मंगल से धनी (लाभ में मिथुन-चं.मं.)
14.
पंचम में धनेश और भाग्येश स्थित हो, तो दत्तकयोग से धनी।
15.
धनेश लग्न में एकादशेश भाग्य भवन में दत्तकयोग से महाधनी।
10.
उच्यराशिगत धनेश भाग्य भवन में पैतृक धन की प्राप्ति का योग।
17. लग्न पर धनेश की दृष्टि होने से घुड़दौड़ या लाटरी से अकस्मात द्रव्य की प्राप्ति होती है।
18. धनेश लाभेश अन्योन्य राशिगत हों या दोनों केन्द्र में हों, तो धनी।
19. लग्नेश, लाभेश, भाग्येश, धनेश उच्चराशिगत चारों हों, तो अरबपति ।
20. लाभ भाव में शनि वकालत से तस्करी धोखाधड़ी असत्य से तथा दुराचारिणी स्त्री के द्वारा प्रव्यप्राप्ति का योग बनाता है।
21. एकादश भाव में पापग्रह धनी योग बनाता है।
22.
लग्न में उच्चस्थ गुरु दीर्घायु सुखी व धनी बनाता है।
23.
मिथुन में राहु, सिंह में मंगल पिता का सम्पूर्ण द्रव्य प्राप्त होता है।
24.
शुभ ग्रह बलवान लग्नेश केन्द्र में हो, तो धनी।
25. द्वितीयस्थ गुरु पर शनि की दृष्टि, धनी योग बनाती है।
26. द्वितीय भावस्थ शनि पर बुध की दृष्टि से धनवान् होता है।
27. धनेश गुरु मंगल के साथ होने से धनी योग बनता है।
28. स्वराशिस्थ भाग्येश पर शुभग्रह को दृष्टि से धनी।
29. चन्द्र, शनि अथवा मंगल नवम भव में उच्च राशि गत से धनी।
30. नवमस्थ सभी शुभग्रह होने से महाधनी।
31. भाग्येश केन्द्रस्थ होकर शुभग्रह से दृष्ट होने से धनी।
32. उच्च राशिगत मंगल भाग्य भाव में होने से धनी।
33. धन भाव में चन्द्र, नवम में शुक्र, एकादश में गुरु होने से धनी।
34. मिथुन या कन्या लग्न में स्थित गुरु पर चन्द्र की दृष्टि हो तो महाधनी।
35. धनु या मीन लग्न में गुरु स्थित हो, यह बुध और शुक्र से युत दृष्ट होने से महाधनी।
36. वृष या तुला लग्न में स्थित शुक्र, बुध व शनि से युक्त हो तो महाधनी।
37. मकर या कुम्भ लग्न में शनि बुध और शुक्र की युति से महाधनी।
38. पंचम भावस्थ मिथुन या कन्याराशि बुध से युक्त मंगल का योग हो, तो महाधनी। हो और लाभ भाव में चन्द्र
39. तृतीय में सूर्य, नवम में, चन्द्र पंचत्र में गुरु से महाधनी।
40. चन्द्र से या लग्न से 6,7,8 भावों में शुभ ग्रह से धनी।
41. चन्द्र, धनु में शुक्र षष्ठ में सप्तम में बुध, अष्टम गुरु इस योग से महाधनी।
42. चतुर्थ में धनु राशि में स्थित चन्द्र से 6,7,8 भावों में शुभग्रह होने से महाधनी।
43. धनु लग्न से 6,7,8 में शुभग्रह स्थित होने पर अधम योग बन जाता है।


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