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Tuesday, July 14, 2026
Monday, June 29, 2026
मेषलग्नान्तर केतुफलम्
मेष का केतु लग्न के पहिले स्थान में हो तो वह मनुष्य देह के स्थान में कुछ अशांति व कमी का योग पाने वाला और देह के सबध म कभी २ महान्सांघातिक चोट या वेदना का योग पाने तथा हृदय के अन्दर बड़ी भारी मज-बूती और गुप्त धैर्य की महान् शक्ति रग्बनं वाला ओर दूसरों के सामने दव कर रहने की बात बिलकुल न चाहने वाला किन्तु इसके विपरीत अधाधुंधी के साथ हेकड़ी व हठधर्मी से काम लेने वाला और गुप्त युक्तियों के बल से तथा महान् कठिन। इयों की सहन शक्ति के बल से किसी प्रकार की ख्याति प्राप्त करने की शक्ति पा लेने वाला और अपने अन्दर की किसी खास कमी का दुःख अनु-भव करने वाला होता है।
वृष का केतु लग्न से दूसरे स्थान में हो तो वह मनुष्य धन के स्थान में कभी वड़ी हानि पाने वाला और धन की कमी के कारण से भी कष्ट का अनु-भव करने वाला तथा धान की वृद्धि करने के लिये बड़ी चतुराई के साधनों का पालन गुप्त हिम्मत के बल से करने वाला और धन के हर एक संबंध में बड़े धैर्य से काम लेने बालां और धन के पक्ष में कभी २ घोर संकट का सामना पाने वाला तथा अंत में किसी धन के संबंध की गुप्त शक्ति का साधन पा लेने से संतोष पाने वाला और कुटुम्ब स्थान में बहुत हानियों व क्लेश का साधन पाने वाला तथा धन के लिये अधाधुंध शक्ति एवं युक्ति का प्रयोग करने बाला होता है।
मिथुन का केतु लग्न से तीसरे स्थान में हो तो वह मनुष्य भाई बहन के स्थान "में हानि व क्लेश का योग पाने वाला और अपने पुरुषार्थ बल में कुछ कम-जोरी पाने वाला किन्तु अपने शक्ति के अंदर बहुत गुप्त हिम्मत का बहुत भरोसा रखने वाला तथा छिपी हुई शक्ति से बहुत काम लेने वाला और कुछ अनुचित रीति से अपभी बहादुरी का परिचय देने वाला और अपने बल पुरु-षार्थ व हिम्मत के ऊपर कभी २ बड़े भीषण प्रहार सहने वाला और बड़ी से बड़ी मुशीबत के अंदर भी आन्तरिक धैर्य को न छोड़ने वाला और छिपे तौर से हमेशा अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगा रहने वाला होता है।
कर्क का केतु लग्न से चौथे स्थान में हो तो वह मनुष्य माता के पक्ष में हानि पाने वाला और मातृ स्थान से कुछ अलहदगी पाने वाला और मकान भूमि आदि के संबध में कुछ हानि व कुमी का योग पाने वाला और सुख व आराम के स्थान में बहुत प्रकार से कमी व अशांति का योग पाने वाला और सुख प्राप्ति के स्थान में मजबूती पाने के लिये महान् परिश्रम व कठिनाइयां सहने वाला और अपने निज स्थान में कभी २ असहनीय दारुण विपत्ति का सामना पाने वाला और अंत में किसी सुख संबंध की मज-बूती को पा लेने वाला तथा सुख प्राप्ति के लिये अधाधुंद शक्ति का प्रयोग करने वाला होता है।
सिंह का केतु लग्न से पांचवें स्थान में हो तो वह मनुष्य संतान पक्ष में कष्ट सहन करने वाला तथा संतान की हानि " पाने वाला और विद्या की कमी पाने वाला तथा विद्या ग्रहण करने में बड़ी २ गहरी परेशानियां सहने वाला और विद्या स्थान व बुद्धि स्थान में और सतान स्थान में कभी कभी असहनीय दारुण संकट का योग पाने वाला और दिमाग के अन्दर अधिक गर्मी होने के कारण से अपने शब्दों के भाव दूसरों को न समझा सकने वाला और अपने बुद्धि की कमी को दूर करने के संबंध में महान् से महान् परिश्वप अंध विश्वास के साथ बराबर करते रहने वाला तथा कुछ छिपाव की बातों वाला होता है।
कन्या का केतु लग्न से छठे स्थान में हो तो वह मनुष्य शत्रु स्थान में महान् पुरुषार्थ शक्ति का परिचय देने बाला तया शत्रु को परास्त करने वाला और महान् से महान् कठिनाइयों व दिक्कतों की जरा भी परवाह न करने वाला और अपनी प्रभाव की बहुत उत्तति करने के लिये अधाधुंद शक्ति का प्रयोग करने वाला तथा ननसाल पक्ष में कुछ कमजोरी पाने वाला और शत्रु स्थान में कभी २ अचानक भीषण मुशीबत की आशंका यें, पाने वाला किन्तु वास्तव में हमेशा जीत में रहने वाला और बड़ी बहा-दुरी का दावा रखने वाला और पाप दोष की परवाह न करके स्वार्थ सिद्धि का पूरा ध्यान रखने वाला होता है।
तुला का केतु लग्न से सातवें स्थान में हो तो वह मनुष्य स्त्री स्थान में कुछ हानि और कुछ अशांति पाने वाला और इन्द्रिय भोगादिक की शक्ति केसंबध में विशेष अधिकार रखने वाला और रोजगार की लाइन में बहुत परि-श्रन करके गुप्त युक्ति व शक्ति से काम निकालने वाला और रोजगार के दायरे में कभी २ महान् कठिनाई का भीषण सामना पाने वाला किन्तु महान् धैर्य से हिम्मत के साथ समय के कार्य को करते रहने वाला और रोजगार के संबंध में अंत तक किसी स्थिर मजबूती को प्राप्त कर लेने वाला और प्रत्येक लौकिक कार्यों में कुछ कमी के बावजूद भी बड़े साहस के साथ उन्नति को प्राप्त करने वाला होता है।
वृश्चिक का केतु लग्न से अष्टम स्थान में हो तो वह मनुष्य पेट के अंदर निचलेव पिछले हिस्से में कुछ शिकायत पाने वाला और जीवन की दिनचर्या में बहुत अशांति अनुभव करने वाला और पुरा-तत्त्व की कुछ, हानि पाने वाला तथा जीवन की आयु के संबंध में कभी २सांघातिक हानिमां पाने वाला और अपने जीवन से संबंधित मार्ग में महान् हेकड़ी रखने वाला तथा तीक्ष्ण गुप्त युक्तियों के बल से निर्वाहक शक्ति में सहयोग पैदा करने वाला और महान् कठिन परिश्रम से जीवन का विकाश करने वाला और अंत तक जीवन में कुछ प्रसिद्धता पाने में सफल होने वाला व प्रभाव वाला होता है।
घन का केतु लग्न से नवम स्थान में हो तो वह मनुष्य भाग्य की उन्नति केलिये अधिक से अधिक परिश्रम करने वाला तथ। भाग्य के स्थान में बड़े २ महान् झंझटों का योग पाने वाला तथा कुछ गुप्त शक्ति के महान् प्रयोगों के द्वार। उन्नति का साधन पाने वाला और धर्म पालने क स्थान में वास्तविक धर्म का पालन करने वाला और महान् तामसी धर्म का बड़े रूप से बहुत पालन करने वाला और वास्तविक सुयश न पाकर तमोगुण की लाईन से यश प्राप्त करने वाला और फिर भी भाग्य स्थान में कुछ कमी नअशांति अनुभव करने वाला तथा बहुत बड़े आड-म्बर से भाग्य का चमत्कार पाने वाला शील रहित होता है।
मकर का केतु लग्न से दसवें स्थान में हो तो वह मनुष्य पिता स्थान में कुछ हानि व कुछ कमी व क्लेश का योग पाने वाला और कारोबार के अन्दर कुछ अधिक परिश्रम व परेशानी से काम करने वाला और उन्नति प्राप्त करने के लिये गुप्त शक्ति का प्रयोग बड़े धैर्य और साहस के साथ करने वाला और राज समाज के संबंध में बहुत दिक्कतों को सहने के बाद उन्नति व मान वृद्धि का साधन पाने वाला और मान प्रतिष्ठा के स्थान में कभी २ सांघातिक हानियों का योग पाने वाला और अपनी इज्जत की मजबूती में कुछ कमी का योग पाने पर भी बड़ी बहादुरी से काम लेने वाला होता है।
कुम्भ का केतु लग्न से ग्यारहवें स्थान मे हो तो वह मनुष्य बहुत लाभ पाने वाला तथा अधिक लाभ पाने के लिये अधिक प्रयत्न करने वाला और कुछ मुफ्त का सा लाभ सदैव प्राप्त करते रहने की सी योजनायें बनाने वाला और धने लाभ के स्थान में महान् धैर्य और कुछ गुप्त शदितयो से काम लेने वाला तथा लाभ के स्थान में किसी भी प्रकार की कमी का योग महसूस करने वाला और शेष में आमदनी के संबंध में कोई स्थाई योजना प्राप्त करने वाला और कुछ अनुचित लाभ उठाने की शक्ति रखने वाला तथा महान् स्वार्थ युक्त होकर अधाधुंदी से काम लेने वाला होता है।
मीन का केतु लग्न से बारहवें स्थान में हो तो वह मनुष्य खर्च अधिक करने वाला और खर्च के कारणों से कुछ कष्ट प्राप्ति के योग प्राप्त करने वाला तथा खर्च के मार्ग में कुछ बड़प्पन व हेकड़ी और बड़ी दृढ़ता से काम लेने बाला तथा महान् धैर्य की शक्ति के गुप्त बल से खर्च संचालन करते रहने वाला और कभी २ खर्च के मार्ग में भीषण संकटों का भी साममा पाने वाला और बाहरी अन्य स्थानों के संपर्क में बड़ी कठिनाइयों तथा परेशानियों का योग पाने वाला और बाहरी संबंध में अपनी कमजोरी या कमी की परवाह न करके आन्तरिक शक्ति के द्वारा बड़े भारी परिश्रम से काम निकालने वाला तथा अन्त में खर्च संचालन की स्थिर शक्ति प्राप्त करने वाला होता है।
Thursday, June 25, 2026
चन्द्रमा - राहु
चन्द्रमा - शनि
चन्द्रमा - शुक्र
चन्द्रमा - गुरु
चन्द्रमा - बुध
Wednesday, June 24, 2026
चन्द्रमा - मंगल
चन्द्रमा - सूर्य
Sunday, June 21, 2026
अथ चन्द्रराशिफलम् ।
लोलनेत्रःसदा रोगी धर्मार्थकृतनिश्चयः ।
पृथुजंघः कृतघ्नश्च निष्पापो राजपूजितः ॥ १ ॥
कामिनीहृदयानंदो दाता भीतो जलादपि ।
चंडकर्मा सृदृश्वांते मेषराशौ भवेन्नरः ॥ २ ॥
जिसकी मेष राशि होती है वह मनुष्य चंचल नेत्रों वाला, सदा रोगी, धर्म अर्थ में निश्चय रखने वाला, पुष्ट जंघावाला, कृतघ्नी, पापों से रहित, राजा से पूजा पाने बोला ।। १ ।॥
कामिनी स्त्रियों के हृदय में आनन्द देने बोला, दाता, जलसे डरने वाला, प्रचंड कर्म करता हुआ अन्त में वृद्धावस्था में शान्त होतो है ॥ २ ॥
भोगीदाता शुचिर्दक्षो महासत्वो महाबलः ।
धनी बिलासी तेजस्वी सुमित्रश्च वृषे भवेत् ॥ ३ ॥
और जिसकी जन्भ समय में वृष राशि होती है वह मनुष्य भोगों का भोगने वाला, दानका देने वाला, बडा पवित्र, बडा चतुर, धैर्य यान्; बलवान्, धनधाण, क्रीडा करने वाला, बडा तेजस्वी और अच्छे २ मित्र वालो होता है ॥ ३ ॥
मिष्टवाक्यो लोलदृष्टिर्दयालुमैथुनप्रियः ।
गांधर्ववित्कंठरोगी कीर्तिभागी धनी गुणी ॥ ४ ॥
गौरो दर्षिःपटुर्वक्ता मेधावी च दृढबतः ।
समर्थो न्यायवादी च जायते मिथुने नरः ॥ ५ ॥
और जिसकी अन्म समय में मिथुन राशि होती है वह मनुष्य मीठे वाक्य फड़ने वाला, चंचल दृष्टि वाला, बडा दयालु, मैथुन (विषय) प्रिय गान विवा आनने पाला, कण्ठ में जिसके रोग, कीर्ति का भागी, धनवान, गुणवान् ॥ ४ ॥
गौर अंग वालो शरीर का लम्बा, पढा चतुर, बक्ताः बुद्धिनानः दढ संकल्पप्रने याला सब काम करने में समर्थ और न्याय वाक्य का कहने वाला होता है।५ ॥
कार्यकारी धनी शरो धर्मिष्ठो गुरुवत्सलः ।
शिरोरोगी महाबुद्धिः कृशांगः कृत्यवित्तमः ॥ ६ ॥
प्रवासशीलः कोपांथोऽवलो दुःखी सुमित्रकः ।
अनासक्तो गृहे वक्रःकर्कराशौ भवेन्नरः ॥ ७॥
और जिसकी जन्म समय में कर्क राशि होती है यह मनुष्य कामों का करने चालो; धनपान, शूरवीर, धर्मात्मा, गुरुजनों का वत्सल, शिरका रोगी बडा बुद्धिमान् दुर्वलांग, कृत्य जानने बालों में शिरोमणि ।। ६ ।।
परदेश में रहने बाला सब समय कोर्चाथ, बलसे हीन, दुःख भोगने वाला, उत्तम जिसके मित्र घरमें आसक्ति रहित और बडा टेढा होता है ॥ ७ ॥
क्षमायुक्तः क्रियासक्तो मद्यर्मासरतः सदा ।
देशभ्रमणशीलच शीतभीतः सुमित्रकः ॥ ८ ॥
विनयी शीघ्रकोपी च जननीपितृवलमः ।
व्यसनी प्रक्टो लोके सिंहराशौ भवेन्नरः ।। ९ ।।
जिसके जन्म समय में सिह रोशि होती है यह मनुष्य क्षमांत्रान्; क्रिया करने में ओसक्त; सदा मय मांस खाने में निरत, देशों में अमण करने वाला, शीत से डरने वाला; सत्पात्र मित्रों बांला ॥ ८ ॥
विनय के स्वभाव वाला, शीघ्रही काप करने वाला, माता पिता का स्नेही, अनेक व्यसनों से युक्त और जगत् में विख्योत होता है॥६॥
बिलासी सुजनाह्लादी सुभगो धर्मपूरितः ।
दाता दक्षःकविवृद्धो बेदमार्गपरायणः ॥ १० ॥
सर्वलोकप्रियो नाट्यगांधर्वव्यसने रतः ।
प्रवासशीलः स्त्रीदुःखी कन्याजातो भवेन्नरः ।। ११ ।।
और कन्या राशि वाला मनुष्य सब समय विलास करने वाला, सज्जनों को आनन्द देने वाला, बडा सुन्दर धर्मात्मा; दाता, चतुर, कविः वृद्धि अवस्था में वेद मार्ग में परायण ।। १० ।।
सब त्वोक को प्रिय, नृत्य गानका व्यसनी, प्रदेश का रहने वाला और खी निमित्त से दुःखी होता है ॥ ११ ॥
अस्थानरोषणो दुःखी मृदुभाषी कृपान्वितः ।
चलाक्षश्चललक्ष्मीको गृहमध्येऽतिविक्रमः ॥ १२ ॥
वाणिज्यदक्षो देवानां पूजको मित्रवत्सलः ।
प्रवासी सुहृदामिष्टस्तुला जातो भवेन्नरः ।। १३ ।।
और जिसकी तुला राशि होती है वह मनुष्य असमय में क्रोध करने वाला, दुःख युक्त, कोमल वचन बोलने वाला, दयालु, चंचल नेत्र वाला, चंचल लक्ष्मी बोला, गृह में पराक्रमी ॥ १२ ॥
व्यापार में कुशल, देवताओं का पूजक, मित्रों से स्नेह रखने वाला, परदेश में रहने वाला और स्वजनों को इष्ट (प्रिय) होता है ॥ १३ ॥
बालप्रवासी क्रूरात्मा शरःपिंगललोचनः ।
परदाररतो मानी निष्ठुरः स्वजने भवेत् ॥ १४ ॥
साहसप्राप्तलक्ष्मीको जनन्यामपि दुष्टधीः ।
धूर्तश्चोरकलारंभी वृश्चिके जायते नरः ॥ १५ ॥
और जिसकी वृश्चिक राशि होती है वह मनुष्य बालकपने से ही परदेश में रहने वाला; क्रूर अन्तःकरणा वौला, शूरवीर, पीले नेत्रों वाला, परस्त्रियों से संग करने वाला; बडा मानी स्वजनों में निठुरता युक्त ॥ १४ ॥
साहस से लक्ष्मी पाने वाला, अपनी माता में दुष्ट बुद्धि रखने वाला, बडा पूर्त और चोरी की कलाओं को सीखने वाला होता है ॥ १५ ॥
शुस्ःसत्यधिया युक्तःसात्विको जननंदनः ।
शिल्पविज्ञानसंपन्नो धनाढ्यो दिव्यभायेकः ॥ १६ ॥
मानो चरित्रसंपन्नो ललिताक्षरभाषकः ।
तेजस्वी स्थूलदेहश्च धनुर्जातः कुलांतकः ॥ १७ ॥
और जिसकी जन्म समय में धनु राशि होती है यह मनुष्य शूरवीर, सत्य बुद्धि-से युथत; सात्विक प्रकृति वाला; मनुष्यों का आनन्द देने वाला, शिल्प विद्या का जामने याला, धन संपन्न, दिव्य जिसकी भार्या ॥ ९६ ॥
बडा मानी, चरित्रों से सम्पन, ललित अक्षरों का कहने चाला और बडा तेजस्वी, पुष्ट जिसका देह तथा अपने कुलका नाश करने वाला होता है ॥ १७ ॥
कुले नष्टो वशःस्त्रीणां पंडितः परिवादकः ।
गीतज्ञो ललिताग्राह्यः पुत्राढयो मातृवत्सलः ॥ १८॥
धनी त्यागी सुभृत्यश्च दयालुर्वहुबांधवः ।
परचिंतितसौख्यश्च मकरे जायते नरः ।। १९ ।।
और जो मनुष्य मकर राशि वाला होता है वह अपने जुलमें सबसे हीन, स्त्रियों के बश में रहने पाला, पण्डित, बुराई करने वाला, गान विद्या जानने याला, सुन्दर स्त्रियों से स्वीकृत, पुत्रवान्, माता की सेवा करने वाला ॥ १८ ॥
धनयान, त्यागी, उत्तम जिसके भृत्यः बडा दयालु, अनेक भाई बन्धु वालो और अन्यों के सुखका चितवन करने वाला होता है ॥ १६ ॥
दातालसःकृतज्ञत्र गजवाजिधनेश्वरः ।
शुभदृष्टिः सदा सौग्यो धनविद्याकृतोद्यमः ।। २० ।।
पुण्याढद्यः स्नेहकीर्तिश्च धनभोगी स्वशक्तितः ।
शालूरकुक्षिर्निर्भीतः कुंभे जातो भवेन्नरः ।। २१ ।।
और जिसके जन्म समय में कुम्भ राशि होती है यह मनुष्य दान देने वाला, महा मालसी वि.ये हुए उपकार का जानने याला हांथी थे।डे तथा धनका स्वामी शुम जिसकी दृष्टिः सदा सोभ्य, धन और पिया के अर्थ उद्यम करने बोला ॥२०॥
पुरायवान्, स्नेह कीर्तियुक्त धन भोगने वालो सामथ्य वान, मंडूक समान कृख. वाला और निर्भय रहने बाला होता है ॥ २१ ॥
गंभीरचेष्टितःशुरःदुवाक्यो नरोत्तमः ।
कोपनःकृपणो ज्ञानी गुणश्रेष्ठः कुलप्रियः ॥ २२॥
नित्यसेवी शीघ्रगामी गंधर्वकुशलः शुभः ।
मीनराशौ समुत्पन्नो जायते बंधुवत्सलः ॥ २३ ॥
और जिसके जन्म समय में मीन राशि होतीहै वह मनुष्य गम्भीर चेष्टा करने काला शूरवीर, चतुराई के वाक्यों का कहने वाला मनुष्यों में उत्तमः क्रोधी, कृपया, झानवान, गुणों में श्रेष्ठ, कुलमें प्रिय ॥ २२ ॥
नित्य सेवा करने वाला शीघ्रता से चलने वाला, गान विद्या में कुशल, शुभआचरण वाला और भाई बन्धुओं से स्नेह रखने वाला होता है ॥ २३ ॥
अथ नवांश फल ।
पिशुनश्चपलो दृष्टः पापकर्मा निराकृतिः ।
परेषां व्यसने सक्तःप्रथमांशे प्रजायते ॥ १ ॥
अपने जन्म राशि के प्रथम नवांश में जन्म लेने वाला मनुष्य चुगलखोर, बडा चपल, पापकर्म करने वाला, बुरी खरत वाला, हर एक जीवको दुःखदायी होता है ॥ १ ॥
उत्पन्नविभवो भोक्ता संग्रामे विगतस्पृहः ।
गांधर्वप्रमदासक्तो द्वितीयांशे प्रजायते ॥ २ ॥
और लग्न के दूसरे नवांश में जन्म लेने वाला मनुष्य उत्पन्न हुए विभवका भोक्ता, लडने में इच्छा रहित, गान विद्या और त्रियों में आसक्त होता है ॥ २ ॥
धर्मिष्ठः संततव्याधिःसर्वसारज्ञ एव च ।
सर्वज्ञो देवताभक्तस्तृतीयांशे प्रजायते ॥ ३ ॥
और जिसका जन्म लग्नके तीसरे नांशमें होता है वह मनुष्य धर्मात्मा, निरन्तर रोगी, सबों के अभिप्राय का जानने वाला, सर्वज्ञ, और वैवतों का भक्त होताहै ॥
चतुर्थांशेऽभिजातस्तु दीक्षितो गुरुभक्तिमान् ।
यत्किंचिद्धरणौ वस्तु तत्सर्वं लभते हि सः ॥ ४ ॥
और जो लग्न के चतुर्थ नवांश में जन्म लेता है वह मनुष्य दीक्षित गुरु जनों में भक्ति रखने वाला और जो कुछ भूमि में बस्तु है उस सक्केा प्राप्त करने याला होता है ॥ ४ ॥
सर्वलक्षणसंपन्नो राजा भवति विश्श्रुतः ।
दीर्घायुर्वहुपुत्रश्च जायते पंचमांशके ॥ ५ ॥
और जो मनुष्य लग्न के पंचम नवांश में जन्म लेता है वह सब लक्षणों से संपन्न जगत् में विख्यात राजा, दीर्घायु और बहुत पुत्र वाला होता है ।॥ ५ ॥
स्त्रीनिर्जितःशुमैर्हानो बहुमानी नपुंसकः ।
अर्थध्वंसी प्रमाथी च षष्ठांशे जायते नरः ॥ ६ ॥
और जिसका लग्न के 6टे नवमांश में जन्म होता है वह मनुष्य स्त्री से मैथुन में हारने वाला, शुभ से पर्जित, बहुत अभिमानी, नपुंसक, धनका नाश करने वाला और प्रमाथी होता है ॥ ६ ॥
विक्रांतो मतिमाञ्छूरः संग्रामेष्वपराजितः ।
महोत्साही च संतोषी जायते सप्तमांशके ॥ ७॥
और लग्न के सप्तम अंशका जन्म लेने वाला पुरुष श्डां पर।कभी, बुद्धिमान्, शरबीर स'ग्राम में न हारने वाला, बडा उत्साही और संतोषी होता है ॥ ७ ॥
कृतघ्नो मत्सरी क्रूरः क्लेशभागी बहुप्रजः ।
फलकाले परित्यागी जायते चाष्टमांशके ॥ ८ ॥
और लग्न के अष्टम नवमांश का जन्म लेने वाला मनुष्य बडी कृतघ्न, मत्सरता करने वाला, बडा क्रूर लेशका भोगने वाला, बहुत सन्तान वाला और फल के समय व्याग करने वाला होतो हैं ॥ ८ ॥
क्रियासु कुशलो दक्षःसुप्रतापी जितेंद्रियः ।
भृत्यैश्व वेष्टितो नित्यंजायतेऽय नवांशके ॥ ९ ॥
और लग्न के नवे नवमांश में जन्म लेने वाला मनुष्य अनेक क्रियाओं में कुशल, बडा चतुर, बडां प्रतापी, इन्द्रियों का जीतने बोला और अनेक भृत्य रखने बोला होता है। ६।
उभये तत्पञ्चमादेरिति चिन्त्यं विचक्षणैः ।
देवा नृराक्षसाचैव चरादिषु ग्रहेषु च"।
अर्थात् जब नवमांश निकालना है तो चर राशि में उसी राशि से गणना करे, और स्थिर राशि में उससे नवम राशि से गणना करे, और द्विस्वभाव में उससे पांचवी राशि से गणना करे। अव नवमांश के स्वामी कहते हैं, चर राशियों के नवमांशों के स्वामी देवता हैं, और स्थिर राशियों के नवमांशों के मनुष्य हैं, द्विस्वभाव राशियों के नवमांशों के स्वामी राक्षस हैं ।॥
स्पष्टज्ञानार्थचक्रमिदम् ।
अब चक से नवमांश निकालने की सुगम रीति लिखते हैं ।॥
जिस राशिको नवमांश निकालना है उसके जितने अंश गत हुए हों उन्हीं अंशों के सामने और उसी राशि के नीचे वाले कोष्ठक में जो राशि है बस उसी का नवमांश
जानना चाहिये ।।
उदाहरण ।
जैग्ने मेषका नवमांश निकालना है तो देखिये कि उसके कितने अंश गत हुए हैं अथवा मेपके १५ अंश गन हुए हैं तो १६-४० के सामने देखिये श्रीर मेपके नीचे देखिये तो ५ आया तो सिंह राशि हुई बस यही नवमांश है इसका स्वामी नवमांशेश (स्थ) होगा ॥
अथ लग्न फलम् --
मेषलग्ने समुत्पन्नश्चंडो मानी धनी शुभः ।
कोधी स्वजनहंता च विक्रमी परवत्सलः ॥ १ ॥
मेष लग्न में जन्म लेने वाला पुरुप बडा प्रचंड (तेज मिजौज वाला) अभि-मानी, धनवान, शुभ आचरण वाला, बडा क्रोधी, अपने लोगों को मारने वाला, बडा पराक्रमी तथा अन्य पुरुषों से स्नेह करने वाला होता हैं ।॥ १ ॥
वृषलग्नभवो लोकगुरुभक्तःप्रियंवदः ।
गुंणी कृती धनी लोभी शूरःसर्वजनप्रियः ॥ २ ॥
और वृष लग्न में जो पुरुष जन्म लेता हैं यह आदमी लोक तर्थों अपने गुरु जनों का भक्त; प्रिय वाक्य का कहने वाला, गुणवान; पण्डित, धनवान्, लोभी, शूरवीर तथा सब जनों का प्रिय होता है ॥ २ ॥
मिथुनोव्यसंजातो मानी स्वजनवल्लमः ।
त्यागी भोगी धनी कामी दीर्घसूत्रोऽरिमर्दकः ॥ ३ ॥
मिथुन लग्न में जन्म लेने वाला आदमी बडा अनिमामी; अपने बन्धु जनों को प्रिय; व्यागी तथा मे।गी; धनवान्, बडा कामी, आलसी (बड़ी देरी से काम करने बाला) और शत्रु जनो का मारने बाला होता है ॥ ३ ॥
कर्कलग्ने समुत्पन्नो भोगी धर्मजनप्रियः ।
मिष्टान्नपानसंयुक्तः सौभाग्यः सुजनप्रियः ।॥ ४ ॥
और जो कर्क लग्ब में जन्म लेता है यह मनुष्य भोग भोगने वालो, धर्मात्मा, व्सनुष्यों को प्रिय, मिष्ठान्न पानसे संयुक्त, भाग्यशोली और सज्जनों को प्रिय होता है।
सिंहलग्नोदये जातो भोगी शत्रुविमर्दकः ।
स्वल्पोदरोऽल्पपुत्रश्च सोत्साही रणविक्रमी ॥ ५॥
और सिंह लग्न में जन्म लेने पाला मनुष्य भोगों का भोगने वालो; शत्रु जनों 'को मारने याला, छोटे पेट पाला, कम पुत्र वाला, उत्साह रखने वाला, रणसें पराकब करने वाला होता है ।। ५॥
कन्यालग्ने भवेद्वालो नानाशास्त्रविशारदः ।
सौभाग्यगुणसंपन्नः सुंदर-सुरतप्रियः ॥ ६ ।।
और कन्या लग्न में जम्म लेने वाला पालक अनेक शाखोंमें विशारद, कल्याण दायक गुणों से सम्पन्न, सुन्दर और स्त्री संगमें रुचि रखने याला होता है ॥ ६ ॥
तुलालग्नोदये जातः सुधीः सत्कर्मजीविकः ।
विद्वान्सर्वकलाभिज्ञो धनाढ्यो जनपूजितः ॥ ७ ॥
और जिसका तुला लनमें जन्म होता है वह मनुष्य वडा पण्डित, सत्कर्मा से लीपिको करने पाला, बडा विद्वान, सब कला जानने वालाः धनवान् और मनुष्यों से पूजित होता है ॥ ७ ॥
वृश्चिकोदयसंजातः शौर्यवान्धनवान्सुधीः ।
कुलमध्ये प्रधानश्च प्राज्ञःसर्वस्य पोषकः ॥ ८ ॥
और वृश्चिक लग्न में जो मनुष्य जन्म लेता है वह मनुष्य शूरवीर, धनवान पण्डित, कुल में मुख्य, बडा बुद्धिमान् और सबको पोषण करने वाला होता है ।॥८॥
धनलग्नोदये जातो नीतिमान्धर्मवान्सुधीः ।
कुलमध्ये प्रधानश्च प्राज्ञःसर्वस्य पोषकः ॥ ९ ।।
और जिस मनुष्य का धन लग्न में जन्म होता है वह मनुष्य बडा नीतिमान्, धर्मज्ञ, बुद्धिमान, कुलमें प्रधान, वडा विद्वान् और सब मनुष्य मात्रों का पोषणा करने वाला होता है ।।६ ॥
मकरोदयसंजातो नीचकर्मा बहुप्रजः ।
लुब्धो विनष्टो ऽलसश्च स्वकार्येषु कृतोद्यमः ।। १० ॥
और जिस मनुष्यका मकर लग्नमें जन्म होता है यह नीच कर्मों का करने वाला, वहुत संतति वाला, बड़ा लोभी, सर्वनाशी, आलसी और अपने कामों में उद्यम करने वाला होता है ॥ १० ॥
कुंभलग्ने नरो जातोऽचलचित्तो ऽतिसौहृदः ।
परदाररतो नित्यं मृडुकार्यों महासुखी ।। ११ ॥
और जिसका कुम्भ लम्नमें जन्म होता है वह मनुष्य अटल चित्त वाला; बडे सुहृद भावसे युक्त, नित्य पर स्त्री गामी, धीरे से काम करने वाला भौर अत्यन्त सुख चाहने वाला होता है ॥ ११ ॥
मीनलग्ने भवेद्धालो रत्नकांचनपूरितः ।
अल्पकामोऽतिकृशश्च दीर्घकालविचिंतकः ॥ १२ ॥
और जिसका मीन लग्न में जन्म होता है यह बालक रत्नों से और सुवर्ण से परिपूर्ण, थोडी काम चेष्टा करनेवाला, अत्यन्त दुबला पतला, और बहुत काल तक विचार के कार्य करने वाला होता है ॥ १२ ॥
अथ गणफलम् ।
सुंदरो दानशीलश्च मतिमान्सरलःसदा ।
अल्पभोजी महाप्राज्ञो नरो देवगणे भवेत् ॥ १ ॥
जिस पुरुप का देवगण होता है वह पुरुप स्वरूप से सुन्दर, दान करने में स्वभाव रखने वाला, बुद्धिमान, बडो सरल, अल्प भोजन करने वाला और बडा बुद्धिमान होता है ॥ १ ॥
मानी धनी विशालाक्षो लक्ष्यवेधी धनुर्धरः ।
गौरःपौरजनग्राही जायते मानवे गणे ॥ २ ॥
जिस पुरुपका पुरुपगण होता है वह पुरुप अधिमानी, धनवान, विशाल नेत्रों वाला, लक्ष्य (निशाना) वेधने वोला, धनुप धारण करने वाला, गौर अंग वालो और पुरवासी पुरुषों के साथ सहानुभूति करने वाला है।ता है ॥ २ ॥
उन्मादी भीषणाकारः सर्वदा कलिवल्लभः ।
पुरुषो दुःसहं बते प्रमेही राक्षसे गणे ॥ ३ ॥
जिस पुरुप का राक्षसगण होता है वह पुरुप बडा उन्मादी, भय कर आकार वाला, सब समय कलहप्रियः दुर्वाक्य बोलने वाला और प्रमेह के रोग से युक्त होता है ॥ ३ ॥
