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Monday, June 29, 2026

मेषलग्नान्तर केतुफलम्

मेष का केतु लग्न के पहिले स्थान में हो तो वह मनुष्य देह के स्थान में कुछ अशांति व कमी का योग पाने वाला और देह के सबध म कभी २ महान्सांघातिक चोट या वेदना का योग पाने तथा हृदय के अन्दर बड़ी भारी मज-बूती और गुप्त धैर्य की महान् शक्ति रग्बनं वाला ओर दूसरों के सामने दव कर रहने की बात बिलकुल न चाहने वाला किन्तु इसके विपरीत अधाधुंधी के साथ हेकड़ी व हठधर्मी से काम लेने वाला और गुप्त युक्तियों के बल से तथा महान् कठिन। इयों की सहन शक्ति के बल से किसी प्रकार की ख्याति प्राप्त करने की शक्ति पा लेने वाला और अपने अन्दर की किसी खास कमी का दुःख अनु-भव करने वाला होता है।

वृष का केतु लग्न से दूसरे स्थान में  हो तो वह मनुष्य धन के स्थान में कभी वड़ी हानि पाने वाला और धन की कमी के कारण से भी कष्ट का अनु-भव करने वाला तथा धान की वृद्धि करने के लिये बड़ी चतुराई के साधनों का पालन गुप्त हिम्मत के बल से करने वाला और धन के हर एक संबंध में बड़े धैर्य से काम लेने बालां और धन के पक्ष में कभी २ घोर संकट का सामना पाने वाला तथा अंत में किसी धन के संबंध की गुप्त शक्ति का साधन पा लेने से संतोष पाने वाला और कुटुम्ब स्थान में बहुत हानियों व क्लेश का साधन पाने वाला तथा धन के लिये अधाधुंध शक्ति एवं युक्ति का प्रयोग करने बाला होता है।

 मिथुन का केतु लग्न से तीसरे स्थान में हो तो वह मनुष्य भाई बहन के स्थान "में हानि व क्लेश का योग पाने वाला और अपने पुरुषार्थ बल में कुछ कम-जोरी पाने वाला किन्तु अपने शक्ति के अंदर बहुत गुप्त हिम्मत का बहुत भरोसा रखने वाला तथा छिपी हुई शक्ति से बहुत काम लेने वाला और कुछ अनुचित रीति से अपभी बहादुरी का परिचय देने वाला और अपने बल पुरु-षार्थ व हिम्मत के ऊपर कभी २ बड़े भीषण प्रहार सहने वाला और बड़ी से बड़ी मुशीबत के अंदर भी आन्तरिक धैर्य को न छोड़ने वाला और छिपे तौर से हमेशा अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगा रहने वाला होता है। 

 कर्क का केतु लग्न से चौथे स्थान में हो तो वह मनुष्य माता के पक्ष में हानि पाने वाला और मातृ स्थान से कुछ अलहदगी पाने वाला और मकान भूमि आदि के संबध में कुछ हानि व कुमी का योग पाने वाला और सुख व आराम के स्थान में बहुत प्रकार से कमी व अशांति का योग पाने वाला और सुख प्राप्ति के स्थान में मजबूती पाने के लिये महान् परिश्रम व कठिनाइयां सहने वाला और अपने निज स्थान में कभी २ असहनीय दारुण विपत्ति का सामना पाने वाला और अंत में किसी सुख संबंध की मज-बूती को पा लेने वाला तथा सुख प्राप्ति के लिये अधाधुंद शक्ति का प्रयोग करने वाला होता है।

 सिंह का केतु लग्न से पांचवें स्थान में  हो तो वह मनुष्य संतान पक्ष में कष्ट सहन करने वाला तथा संतान की हानि " पाने वाला और विद्या की कमी पाने वाला तथा विद्या ग्रहण करने में बड़ी २ गहरी परेशानियां सहने वाला और विद्या स्थान व बुद्धि स्थान में और सतान स्थान में कभी कभी असहनीय दारुण संकट का योग पाने वाला और दिमाग के अन्दर अधिक गर्मी होने के कारण से अपने शब्दों के भाव दूसरों को न समझा सकने वाला और अपने बुद्धि की कमी को दूर करने के संबंध में महान् से महान् परिश्वप अंध विश्वास के साथ बराबर करते रहने वाला तथा कुछ छिपाव की बातों वाला होता है।

 कन्या का केतु लग्न से छठे स्थान में हो तो वह मनुष्य शत्रु स्थान में महान् पुरुषार्थ शक्ति का परिचय देने बाला  तया शत्रु को परास्त करने वाला और महान् से महान् कठिनाइयों व दिक्कतों की जरा भी परवाह न करने वाला और अपनी प्रभाव की बहुत उत्तति करने के लिये अधाधुंद शक्ति का प्रयोग करने वाला तथा ननसाल पक्ष में कुछ कमजोरी पाने वाला और शत्रु स्थान में कभी २ अचानक भीषण मुशीबत की आशंका यें, पाने वाला किन्तु वास्तव में हमेशा जीत में रहने वाला और बड़ी बहा-दुरी का दावा रखने वाला और पाप दोष की परवाह न करके स्वार्थ सिद्धि का पूरा ध्यान रखने वाला होता है।

 तुला का केतु लग्न से सातवें स्थान  में हो तो वह मनुष्य स्त्री स्थान में कुछ हानि और कुछ अशांति पाने वाला और इन्द्रिय भोगादिक की शक्ति केसंबध में विशेष अधिकार रखने वाला और रोजगार की लाइन में बहुत परि-श्रन करके गुप्त युक्ति व शक्ति से काम निकालने वाला और रोजगार के दायरे में कभी २ महान् कठिनाई का भीषण सामना पाने वाला किन्तु महान् धैर्य से हिम्मत के साथ समय के कार्य को करते रहने वाला और रोजगार के संबंध में अंत तक किसी स्थिर मजबूती को प्राप्त कर लेने वाला और प्रत्येक लौकिक कार्यों में कुछ कमी के बावजूद भी बड़े साहस के साथ उन्नति को प्राप्त करने वाला होता है। 

 वृश्चिक का केतु लग्न से अष्टम स्थान  में हो तो वह मनुष्य पेट के अंदर निचलेव पिछले हिस्से में कुछ शिकायत पाने  वाला और जीवन की दिनचर्या में बहुत अशांति अनुभव करने वाला और पुरा-तत्त्व की कुछ, हानि पाने वाला तथा जीवन की आयु के संबंध में कभी २सांघातिक हानिमां पाने वाला और अपने जीवन से संबंधित मार्ग में महान् हेकड़ी रखने वाला तथा तीक्ष्ण गुप्त युक्तियों के बल से निर्वाहक शक्ति में सहयोग पैदा करने वाला और महान् कठिन परिश्रम से जीवन का विकाश करने वाला और अंत तक जीवन में कुछ प्रसिद्धता पाने में सफल होने वाला व प्रभाव वाला होता है।

 घन का केतु लग्न से नवम स्थान में  हो तो वह मनुष्य भाग्य की उन्नति केलिये अधिक से अधिक परिश्रम करने वाला तथ। भाग्य के स्थान में बड़े २ महान् झंझटों का योग पाने वाला तथा कुछ गुप्त शक्ति के महान् प्रयोगों के द्वार। उन्नति का साधन पाने वाला और धर्म पालने क स्थान में वास्तविक धर्म का पालन करने वाला और महान् तामसी धर्म का बड़े रूप से बहुत पालन करने वाला और वास्तविक सुयश न पाकर तमोगुण की लाईन से यश प्राप्त करने वाला और फिर भी भाग्य स्थान में कुछ कमी नअशांति अनुभव करने वाला तथा बहुत बड़े आड-म्बर से भाग्य का चमत्कार पाने वाला शील रहित होता है।

मकर का केतु लग्न से दसवें स्थान में  हो तो वह मनुष्य पिता स्थान में कुछ हानि व कुछ कमी व क्लेश का योग पाने वाला और कारोबार के अन्दर कुछ अधिक परिश्रम व परेशानी से काम करने वाला और उन्नति प्राप्त करने के लिये गुप्त शक्ति का प्रयोग बड़े धैर्य और साहस के साथ करने वाला और राज समाज के संबंध में बहुत दिक्कतों को सहने के बाद उन्नति व मान वृद्धि का साधन पाने वाला और मान प्रतिष्ठा के स्थान में कभी २ सांघातिक हानियों का योग पाने वाला और अपनी इज्जत की मजबूती में कुछ कमी का योग पाने पर भी बड़ी बहादुरी से काम लेने वाला होता है।

कुम्भ का केतु लग्न से ग्यारहवें स्थान  मे हो तो वह मनुष्य बहुत लाभ पाने वाला तथा अधिक लाभ पाने के लिये अधिक प्रयत्न करने वाला और कुछ मुफ्त का सा लाभ सदैव प्राप्त करते रहने की सी योजनायें बनाने वाला और धने लाभ के स्थान में महान् धैर्य और कुछ गुप्त शदितयो से काम लेने वाला तथा लाभ के स्थान में किसी भी प्रकार की कमी का योग महसूस करने वाला और शेष में आमदनी के संबंध में कोई स्थाई योजना प्राप्त करने वाला और कुछ अनुचित लाभ उठाने की शक्ति रखने वाला तथा महान् स्वार्थ युक्त होकर अधाधुंदी से काम लेने वाला होता है।

मीन का केतु लग्न से बारहवें स्थान  में हो तो वह मनुष्य खर्च अधिक करने वाला और खर्च के कारणों से कुछ कष्ट  प्राप्ति के योग प्राप्त करने वाला तथा खर्च के मार्ग में कुछ बड़प्पन व हेकड़ी और बड़ी दृढ़ता से काम लेने बाला तथा महान् धैर्य की शक्ति के गुप्त बल से खर्च संचालन करते रहने वाला और कभी २ खर्च के मार्ग में भीषण संकटों का भी साममा पाने वाला और बाहरी अन्य स्थानों के संपर्क में बड़ी कठिनाइयों तथा परेशानियों का योग पाने वाला और बाहरी संबंध में अपनी कमजोरी या कमी की परवाह न करके आन्तरिक शक्ति के द्वारा बड़े भारी परिश्रम से काम निकालने वाला तथा अन्त में खर्च संचालन की स्थिर शक्ति प्राप्त करने वाला होता है।


Thursday, June 25, 2026

चन्द्रमा  - राहु 

अथ चन्द्रराहुफलम 

जन्मकर्मे शुभे धर्मे चंद्राथदि पतेत्तमः ।
जन्मकाले भूपतिश्व वृद्धकाले महाधनी ॥ १ ॥

जिस मनुष्यकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमासे दशम या नवम घरमें अथवा चन्द्रमा के साथ राहु बैठा हो तब मनुष्य वृद्धानस्थामें राजाके बराबर धनवान् होताहै

षष्ठे च द्वादशे राहुश्चंद्राच्च पतितो यदि ।
स राजा राजमंत्री च धनधान्यसमाकुलः ॥ २ ॥

और जिसके जन्म समयमें चन्त्रमासे छटे घरमें या बारहवें घरमें राहु हो यह मनुप्य राजा या राजा का मंत्री तथा धनधान्यों से परि पूर्ण रहता है ।। २॥

चतुर्थे सप्तमे राहुचंद्राच्च यदि जायते । 
माता पिता महाकष्टी सदा ह्यसुखदायकः ॥ ३ ॥

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमासे चतुर्थ या सप्तम घरमें राहु होता है उस मनुष्य के माता पिताको अत्यन्त कष्ट होता है और सदा स्वय दुःखदायी होता है ॥ ३ ॥

धने एकादशे स्थाने चंद्राद्र। हुः प्रजायते । 
धनमानवसंयुक्तः सुखं स्वप्ने न दृश्यते ॥ ४ ॥

और जिसके जन्म समय में चन्त्रमासे दूसरे या ग्यारहये घरमें राहु पैठारो तब यह मनुष्य धन और मनुष्यों से युक्त होने पर भी स्वप्नमेंभी सुखको नहीं देखता है।।४।।

पंचमे च यदा राहुश्चंद्राज्जल जसंभवम् ।
 निधनं चापि सिद्धं च आपदश्च पदे पदे ॥ ५ ॥

और जिसके जन्म समयमें चबमा से पंचम घरमें राहु बैठाडो तब उस मनुप्य को क्षण २ में आपत्ति प्राप्त होतीहै और जलके निमित्त से ममृत्यु का भय होताहै ।।


चन्द्रमा  - शनि 

अथ शनिभावाध्यायः 

चंद्राच्च प्रथमे सौरिर्जन्मकाले यदा भवेत् । 
प्राणनाशोऽर्थनाशश्च बंधुनाशस्तथापरे ॥ १ ॥

जिस मनुष्य की कुंडली में चन्द्रमा के संग एकही घर में शनि बैठा हो उस मनुष्य को प्राणांत दुःख, धन का नाश और बन्धु नाश होता है ॥ १ ।।

चंद्राद्वितीयगो मंदो जन्मकाले यदा भवेत् ।
 मातुश्च कष्टकारी च अजाक्षीरेण जीवति ॥ २ ॥

और जिस मनुष्य के जन्म समय में चन्द्रमा से दूसरे घर में शनि बैठा हो यह नाता को कह देने वाला होकर बकरी का दूध पीकर जीता है ॥ २ ॥

चंद्रात्सहजगः शौ रिर्जन्मकाले यदा भवेत् । 
बहुकन्याभवेत्त्पुंस उत्पद्य म्रियते ध्रुवम् ॥ ३ ॥

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से तीसरे बरसें शुक्र बैठा हो उस मनुष्य के बहुत कन्यो संतत्ति होकर अवश्य मर जाती हैं ॥ ३॥

चंद्राच्चतुर्थगो नूनं शनिर्जन्मनि संभवेत् । 
महापौरुषकारी च शत्रुहंता न संशयः ॥ ४ ।।

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से चतुर्थ घर में शनि होतो है यह बडा पुरुषार्थी और वैरिओं का मारने वाला होता है ॥ ४ ॥

चंद्रात्पंचमगः सौरिर्जन्मकाले यदा भवेत् ।। 
स्त्री स्याच्छ्यामलवर्णा च ह्यथवा प्रियवादिनी ॥ ५ ॥

और जिसके जन्म समय में चंद्रमा से पंचम घर में शनि होता है उस मंनुष्य को श्याम रंग की (काली) और प्रिय वाक्य कहने वाली भार्या मिलती है ।५।

रविजःषष्ठगश्चंद्राज्जन्मकाले यदा भवेत् ।
 महाक्लेशी च कष्टी च आयुर्डीनो भवेन्नरः ॥ ६ ॥

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से छटे घर में शनि होता है वह महा क्रोश पाने वाला, कष्ट पाने वाला और अल्लायु होता है ॥ ६ ॥

चंद्राच्च सप्तमे स्थाने यदा च रविनंदनः । 
महाधर्मी च दाता च खीणां बहुकर ग्रहः ॥ ७ ॥

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से सप्तम घर में शनि हो तो यह मनुष्य चडी धर्मात्मा; दान देने वाला और बहुत खियों का पाणिग्रहण करनेवाला होता है।

रविजो ह्यष्टमे स्थाने चंद्रतो जन्मसंभवः ।
 पितुश्च कष्टकारी च बहुदाने शुभं भवेत् ॥ ८ ॥

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से अष्टम घर में शनि हो यह मनुष्य अपने पिता को कष्ट देने वाला होता है और बहुत दान करने से शुभ होता है।

चंद्रान्नवमगः सौरिर्जन्मकाले यदा भवेत् । 
यदा मुग्धदशाप्राप्तिर्धनहानिर्भविष्यति ॥ ९ ॥

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से नवम घर में शनि हो तप उस मनुष्य को जब शनि की मुग्ध दशां सोती है तब धन का नाश, करता है ॥ ६ ॥

चंद्राद्दशमगःसौरिर्जन्मकाले यदा भवेत् ।
नृप तुल्यो भवेद्देही कृपणो धनपूरितः ॥ १० ॥

और जिसके जन्म समय में चंद्रमा से दाम घर में शनि वैठा हो तब यह मनुष्य राको के तुल्य, अत्यन्त कृपण, और धन से परिपूर्ण रहता है ॥ १० ॥

चंद्रादेकादशे सौरिर्जन्मलग्ने भवेद्यदि । 
देहक्लेशी महाकष्टी ह्यधर्मी च न संशयः ।। ११ ॥

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से ग्यारहवें घर में शनि होती है यद मनु-व्य देह में दुःख पाने पाला, महा कष्ट भोगने घाला; और निःस्संदेह अचर्मी होती है

द्वादशे भुवने सौरिश्चंद्राच्चपतितो यदि । 
निर्धनी भिक्षुकश्चैव धर्मेणैव विवर्जितः ।। १२ ।।

और जिस मनुष्य की जन्म कुंडली में चंद्रमा से चारहवें घर में शनि बैठा होता है यह धन हीन, भीख मांगने पाला, ओर धर्म से रहित होता है ॥ १२ ॥

चन्द्रमा  - शुक्र 


चंद्रात्तु प्रथमे शशुको जन्मकाले यदा भवेत् । 
जले मृत्युर्मवेत्तस्य सन्निपानो हि हिंसया ॥ १ ॥ 

चन्द्रमा शुक एक  घर में बैठे हों बद मनुष्य ज़ल में डूब  कर मृत्यु पाने पाला और सन्निपात  रोग वाला, तथा हिंसा से मृत्यु प्राप्त   करने वाला  होता है ।। १ ।।

चंद्राव् द्वितीयगः शुको जन्मकाले यदा भवेत् । 
महाधनी महाज्ञानी राजतुल्यो न संशयः ।। २ ।।

चन्द्रमा से दूसरे घर  में शुक्र हो तो वह मनुष्य महा भन वान् क्ढा शांनी, और राजा के तुल्य होता है इसमें कुछ संदेह नहीं है ॥ २ ॥

चंद्रात्सहजगः शुक्रो जन्मकाले यदा भवेत् । 
धर्मिष्ठो बुद्धिमांश्चैव म्लेच्छतो लाभदायकः ।। ३ ।।

 चन्द्रमा से तीसरे घर  में शुक्र होता है यो यह मनुष्य बहा धर्मात्या, पुद्धिमान् और किसी म्लेच्छ जाति से धन लाभ करने वाला होता है।३।

चंद्राचतुर्थंगःशुको जन्मकाले यदा भयेत् । 
कफाधिको महाक्षामो बार्द्धक्ये धनवर्जितः ॥ ४

जन्म कुंडली में चन्द्रमा से चतुर्व घर में शुक हो वह मनुष्य कफाधिक, अत्ति दुर्वलांग, और वृद्धश्न में वन हीन होता है ।॥ ४॥

चंद्रात्पंचमगःशुक्रो जन्मकाले यदा भवेत् । 
बहुकन्या भविष्यंति धनाढ्यो येशवर्जितः ॥ ५ ॥

चन्द्रमा से पंचम घर में शुक बैठा हो वह मनुष्य बहुत कन्यां संतति वाला, धनाढ्य और यश  से हीन होता है ॥ ५ ॥

चंद्राच षष्ठगःशुको जन्मकाले यदा भवेत् । 
दुव्र्व्ययाद्भयकारी च संग्रामे च पराजितः ॥ ६ ॥

 चन्द्रमा से छटे घर में शुक्र होता है यह मनुष्य मोटे खर्च से करने वाला और संग्राम में हारने वाला रोता है ।। ६॥

चंद्रात्सप्तमगः शुक्रो जन्मकाले यदा भवेत् । 
पुरुषार्थहीनो ऽकुशलः शक्तिश्च पदे पदे ।। ७ ।।

 चन्द्रमा से सप्तम घर में शुक्र होता है वह मनुष्य द्दीन पुरुार्थ वाला और क्षण पाया में शंका युक्त होता है ॥ ७ ॥

चंद्राद्दष्टमगः शुक्रो जन्मकाले यदा भवेत् ।
प्रसिद्धो हि महायोद्धा दाता भोक्ता महाधनी ॥ ८ ॥

 चन्द्रमा  से अष्टम   घर में शुक्र बैठा हो यह मनुष्य सर्वत्र प्रसिद्ध, महापोद्धा, दाता, भोका और महा धनवान् होता है ।। ८ ।।

चंद्रान्नवमगःशुको जन्मकाले यदा भवेत् । 
बहुभ्राता तथा मित्रमगिनीबहुलो भवेत् ॥ ९ ॥

 चन्द्रमा से नवम घर में शुक्र बैठा हो तो वह मनु ब्य बहुत भाई वाला और मित्रयुक्त तथा बहुत भगिनी वाला होता है ॥ ६ ॥

चंद्राच्च दशमे शुक्रो जन्मकाले यदा भवेत् ।
 माता पित्रोः सुखप्राप्तिर्जीवितं तु बृहद्भवेत् ॥ १० ॥

 चन्द्रमा से दशम घर में शुक्र हो तो यह मनुष्प माता पितों को सुख दिलाने वाला, और दीर्घायु होता है ।॥ १० ॥

चंद्रादेकादशे शुको जन्मकाले यदा भवेत् । 
बह्नायुश्च भवेत्पुंसो रिपुरोगविवर्जितः ॥ ११ ॥

चन्द्रमा से ग्यारहवें घर में शुक्र बैठा हो यह मनुष्य दीर्घायु और शत्रु तथा रोग से रहित होता है ॥ ११ ॥

चंद्राद्धादशगःशुको जन्मकाले यदा भवेत् । 
परदाररतो नित्यं लंपटो ज्ञानहीनकः ॥ १२ ॥

और जिसकी कुंडली में चंद्रमा से बारहवें घर में शुक्र बैठा हो यह मनुष्य परत्री गामी, अन्यन्त लंपट, और ज्ञान से हीन होता है ॥ १२ ॥


चन्द्रमा  - गुरु 

अथ चन्द्राह्न रुभाय फलम् ।

चन्द्रात्प्रथमगो जीवो जीवयोग्यो भवेन्नरः ।
व्याधिना रहितःङ्कारो निर्धनो न कदाचन ॥ १ ॥

 जन्म समय में चन्द्रमा और वृहस्पति एकही घर में बँठे है।ते हैं वह आदमी जीने के योग्य, अनेक व्याथि रहित, बडा शूरवीर और सदा धन सम्पन्न होता है॥१॥

चंद्रा‌द्वितीयगो जीवौ राजमान्यः शतायुषी । 
अत्युग्रश्च प्रतापी च धर्मिष्ठः पापवर्जितः ॥ २ ॥

 जन्म कुण्डली में चन्द्रमा से पृहस्पत्ति दूसरे घर में बैठा है। यह राजा से मोन पाने वाला, पूर्ण दातवर्ष की आयुयुक्त, बडा उग्र, श्डा प्रतापी, धर्मात्मा और पाप से चर्जित होता है ॥ २ ॥

चंद्रातृतीयगे जीवे नारीणां वल्लभो भवेत् ।
 धनवृद्धिः पितृगेहे वर्षे सप्तदशे तथा ॥ ३ ॥

 जिसकी जन्मकुंडली में चंद्रमा तीसरे घर वृहस्पति बैठा है। वह  स्त्रियों को प्रिय होता है, और उसके पिता के घरम सप्तदश वर्ष में धनकी वृद्धि होती है ॥ ३ ॥

चन्द्राच्चतुर्थगो जीवः सुखैश्चैव विवर्जितः। 
मातृपक्षे महाकष्टी परेषां गृहकर्मकृत् ॥ ४ ॥ 

 जन्म कुंडली में चन्द्रमा से चतुर्थ घर में वृहस्पति बैठा हो तक वह मनुष्य सुख मात्र से रहित, मातृ पक्षसे महा कष्ट भोगने वाला और अन्य मनुष्यों के घर का काम करने वाला (नृत्य) होता है ॥ ४ ॥

चंद्रात्पंचमगो जीवो दिव्यदृष्टिमेवेन्नरः । 
तेजस्वी पुत्रदा नारी ह्यत्युग्रश्च महाधनी ।। ९ ।।

 कु'डली में चन्द्रमा से पंचम स्थान में वृहस्पति वैठा हो तो वह मनुष्य दिव्य दृष्टि वाला, तेजस्वी और उसकी श्री पुत्रों को उत्पन्न करने वाली तथा स्वयं महा उग्र, और वडा धनवान्, होता है ॥ ५॥

चंद्राच्च षष्ठगो जीवो ह्युदासी गृहवर्जितः । 
आयुर्वाह्य भवेत्पुसांभिक्षाभोक्ताऽव्यवस्थितः ।। ६ ।।

 जन्म कुण्डली में चन्द्रमा से छटे स्थान में वृहस्पति हो तो वह मनुष्य उदासीन रहने वाला, घर से हीन, देशान्तर में आयु बिताने वाला और खर्च के अधिक होने से मनुष्यों में भिक्षा करके खाने वालो व्यवस्था रहित होती है।। ६ ।।

चंद्रात्सप्तमगो जीवो बहुजीवी व्ययं विना । स्थूलदेहीक्लीवपांडुर्गृहमध्ये च नायकः ॥ ७ ॥

 जन्म समय में चन्द्रमा से सप्तम घर में वृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य बहुत काल तक जीने वाला, खरच करने से रहित, पुष्ट देह वाला; नपुसक, पांडुरोग से युक्त और अपने घर का स्वामी होता है ॥ ७ ॥

चंद्रादष्टमगो जीवो देहरोगी सदा नरः । 
सुतातोपि महाक्लेशी सुखं स्वप्ने न दृश्यते ॥ ८ ॥

 जन्म कुण्डली में चन्द्रमा से अष्टम घर में बृहस्पति बैठा हो यह मनुष्य सब समय देह में रोग युक; अच्छे पिता वाला, महा झुश पाने वाला, स्वप्न में भी मुख न पाने वाला होता है ॥ ८ ॥

चंद्रान्नवमगो जीवो धर्मिष्ठो धनपूरितः ।
सुमार्गे सुगतश्चैव देवगुर्वोश्च सेवकः ॥ ९ ॥

 कुण्डली में चन्द्रमों से नवे घर में बृहस्पति होता है वह मनुष्य बडा धर्मात्मा, धन से पूर्णं, सुमार्ग में अच्छो तरह चलने वाला और गुरु तथा देव-वाओं का सेवक होता है ॥ ६ ॥

चंद्राद्दशमगो जीवो जन्मकाले यदा भवेत् । 
पुत्रदारपरित्यागी तपस्वी च भवेन्नरः ॥ १०॥

 चन्द्रमा से दशम स्थान में बृहस्पति वैठा हो तव यह मनुष्य पुत्र खी का त्यागने वाला तपस्वी होता है ॥ १० ॥

चद्रादेकादशे जीवो जन्मकाले यदा भवेत् ॥
अश्वारूढो भवेत्पुत्रो राजतुल्यो भवेन्नरः ॥ ११ ॥

 जिसके चन्द्रमा से ग्यारहवें स्थान में वृहस्पति बैठा हो उस मनुष्य का पुत्र राजा के समांन, घोडों पर बैठने चाला होता है ॥ ११ ॥

चंद्राद्वादशगो जीवो जन्मकाले यदा भवेत् । 
स्यात्कुटुंबविरोधी च सुखं शत्रोदेशाग्रहे ॥ १२ ॥

  कुण्डली में चन्द्रमा से बारहवें घर में बृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य कुडुम्ब से विरोध करने वाला होता है तथा लग्न से छटे स्थान के स्वामी की दशा में उस मनुष्य को सुख होता है ॥ १२ ॥ 

चन्द्रमा  - बुध 

अथ बुधभावाध्यायः ।

 चंद्रात्प्रथमगः सौम्यः सुखरूपं विना नरः । 
दुष्टभाषी मतिभ्रंशी स्थानभ्रष्टो दिने दिने ॥ १ ॥

जिसके जन्म कुंडलीमें चन्द्रमा बुध दोनों एक घर  में ही स्थितहों तो यह मनुष्य सुख और रूपसे हीन, दुष्टु वाक्य पोलने वाला, बुद्धि जिसकी अष्ट हो जाय और अति दिन अपने स्थान से अष्ट होने पाला होता है ॥ १ ॥

चंद्राद्वितीयगःसौग्यो धन धान्यसैमाकुलः ।
गृहबंधुधनप्राप्तिः शीतरोगैर्विनश्यति ॥ २ ॥

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से दूसरे घर में बुध बटाहो तो वह मनुष्य बन धान्यों से युक्त और घर बन्धु तथा धनकी प्राप्ति करने बोलो तथा शीतजन्य रोगों से मरता है ॥ २ ॥

चंद्रात् सहजगः सौम्यः कुरुते चार्थसंपदः । 
राज्यलाभो भवेत्तस्य महंतां संगमो ध्रुवम् ॥ ३ ॥

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से तृतीय घरमें बुध होता है यह मनुष्य अर्थ संपत्ति का करने वाला होता है और उसको राज्य तथा सत्सङ्ग का अवश्य ही लाभ होता है ॥ ३ ॥

चंद्राच्चतुर्थगः सौम्यःसर्वदा सुखकारकः ।
मातृपक्षे महालाभः सुखं जीवति मानवः ॥ ४ ॥

और जिसके चन्द्रमा से चतुर्थ घरमें युथ बैठता है तब वह सदा सुखका पाने वाला और मातृपक्ष से महालाभ करने बोला होता है और वह मनुष्य सुख सहित जीने वाला होता है ॥ ४ ॥

चंद्रात्पंचमगः सौम्यो बुद्धिमांश्च विचक्षणः ।
रूपवांश्च महाकामी कुवाक्यं धारयेन्नरः ॥ ५ ॥

और जिसकी कुण्डली में चन्द्रमा से पंचम घरम बुध बैठा होता है तत्र वद मनुष्य बडा बुद्धिर्मान्, चतुर, रूपवान्, बडा कामी और कुवाक्य का बोलने वाला होता है ॥ ५ ॥

चंद्रात्षष्ठगतः सौम्यः कृपणः कातरो भवेत् ।
 विवादे च महाभीरू रोमेशो दीर्घलेोचनः ॥ ६ ॥

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से छटे घरमें बुध बैठा होता है वह कृपण, बडा कायर, विवाद से अत्यन्त डरने वाला, शरीर में रोंगटे जिसके अत्यन्त खडेहों और विशाल नेत्र वाला होता है ।। ६ ।।

चंद्रात्सप्तमगः सौम्यःस्त्रीणां च वशगो नरः । 
कृपणश्व धनाढ्यश्च बह्नायुश्च भविष्यति ॥ ७ ॥

 और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से सप्तम घरमें बुध बैठा होता है वह आदमी खियोंके वशमें रहने वाला, बडा कृपया, परन्तु धनाढ्य और दीर्घायु होताहै। ॥ ७ ॥

चंद्रादष्टमगे सौम्ये देहे शीतो भविष्यति ।
राजमध्ये प्रसिद्धश्व शत्रूणां च भयंकरः ॥ ८ ॥

और जिसकी कुण्डली में चन्द्रमा से अष्टम चरमें बुध बैठता है यद मनुष्य देहम' शीत प्रकृति वाला, राजाओं के बीच में प्रसिद्ध तथा शत्रुजनों को भय देने बाला होता ॥ ४ ॥

चंद्रान्नवमगः सौम्यः स्वधर्मस्य विरोधकः ।
अन्यधर्मरतः पुंसो बिरोधी दारुणो भवेत् ॥ ९॥

और जिसकी कुण्डली में चन्द्रमासे नवे घरमें बुध बैठाहो वह मनुष्य अपने धर्म का बिरोधी, अन्य धर्म में निरतः पुरुषों का विरोधी और महा दारुण होता है ।। ६ ।।

चंद्राद्दशमगःसौम्यो राजयोगी नरः सदा ।
 कर्मराशौ यदा चंद्रःकुटुंबे नायको भवेत् ॥ १० ॥

और जिसकी कुण्डली में चन्द्रमों से दशम घरम बुध बैठा है। यह मनुष्य राज योग याला और अर कि चन्द्रमा कर्म राशि (दशमभाव में स्थित है। तब यह मनुष्य अपने कुटुम्ब का स्वासी होता है ।॥ १० ॥

चंद्रादेकादशे सौम्यो लाभकारी पदे पदे । 
वर्ष एकादशे पुंसःपाणिग्राहो मविष्यति ॥ ११॥

और जिसकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा से ग्यारहय घरम बुध बैठा है। यह मनुष्य को क्षण चाणा में लाभ कराने वाला होता है और उस मनुष्यका ग्यारहवें अर्ष में पाणिग्रहया (व्यिाह) हो जाता है ।। ११ ।।

चंद्राद्वादशगः सौम्यः सर्वदा कृपणो भवेत् । 
तत्सुतस्य जयो नास्ति पराजयं लभेद्दिने ॥ १२ ॥

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से बारह घरम सुब बैठा होता है यह पादसी सदा कृपया होता है और उसके पुत्रकी कभी जीत नहीं होती है और दिन दिन परोक्षय होती है ।। १२ ।। 

Wednesday, June 24, 2026

चन्द्रमा  - मंगल 

अथ भौमभावाध्यायः ।

चंद्रात्प्रथमगो भौमो जन्मकाले यदा भवेत् ।
रक्ताक्षी रुधिरस्रावी रक्तवर्णो भवेन्नरः ॥ १ ॥

जिसकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा के संग मंगल वैठाहो तवे वह मनुष्य लाल नेत्र वाला, रुधिर साव विकार से युक्त और रक्त वर्ण होता है ॥ १ ॥

चंद्राद्वितीयगो भौमो जन्मकाले यदा भवेत् । 
धराधीशो भवेत्पुत्रःकृषिकर्ता न संशयः ॥ २ ॥

और जिसकी कुसडली में चन्द्रमा से दूसरे घरमें संगल होता है. यह मनुष्य भूमिका पति होता है परन्तु उसका पुत्र खेती करने वाला होता हैं ॥ २ ॥

चंद्रात्ततीयगो भौमो जन्मकाले यदा मवेत् ।
चतुर्भ्रातृसमायुक्तः सुशीलःसर्वदा सुखी ॥ ३

भौर जिसकी कुंडली में चन्द्रमा से तीसरे घरमें मंगल बैठाहो तब यह मनुष्य चार भाई वाला बडा सुशील और सदा सुखी होता है ॥ ३ ॥

चंद्राच्चतुर्थगो भौमो जन्मकाले यदा भवेत् ।
सुखभंगो दरिद्री स्यात्त्पुंसःस्त्री म्रियते ध्रुवम् ॥ ४ ॥

 और जिसके जन्म समय में चन्द्रमासे चतुर्थ घरमें मंगल बैठा हो वह मनुष्य
सुखसे रहित, महा दरिद्री और उस पुरुष की स्त्री अवश्य ही मरजाती है ।। ४ ।।

 चंद्रात्पचमगो भौमो जन्मकाले यदा भवेत् । 
पुत्रहीनो नरःस्त्रीणां लग्ने पतति निश्चितम् ॥ ५ ॥

और जिसके जन्म कालमें चन्द्रमा से पंचम घरमें मंगल बैठा हो तब वह धनुष्य पुत्रहीन होता है और यदि येही योग स्त्री के होवे तत्र तो अवश्यही संराति का अभाष करता है॥ ५ ॥

चंद्राच्च षष्ठगो भौमो जन्मकाले यदा भवेत् । 
अधर्मे शत्रुता चैव रोगेण पीडितः सदा ॥ ६ ॥

और जिसके जन्म समय कु'डली में चन्द्रमा से छटे घर में मंगल बैठा हो तब यह मनुष्य अधर्म के जंजाल में फंस कर मनुष्योंसे शत्रुता करने वाला और निरन्तर रोगों से पीडित होता है ॥ ६॥

चंद्रात्सप्तमगो भौभो जन्मकाले यदा भवेत् ।
स्त्री कुशीला भवेत्तस्य सदा चाप्रियवादिनी ॥ ७ ।।

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से सप्तम घरमें मंगल बैठा हो उसकी मार्या दुःशीला (दुष्ट स्वभाव की "शील स्वभाषे सइ से" इयमरः और सदा -दुचाक्य कहने वाली होती है ॥ ७ ॥

चंद्रादष्टमगो भौमो जन्मकाले यदा भवेत् ।
जीवहंता महापापी शीलसत्वविवर्जितः ॥ ८ ॥

और जिसके जन्म समय में चन्द्रमा से अष्टम घरमें मंगल बैठा हो यह मनुष्य जीवोंको मारने वाला महापाप करने वाला और शील एवम् सत्यसे रहित होता है।॥ ८ ॥

चंद्रान्नवमगो भौमो जन्मकाले यदा भवेत् ।
 लक्ष्मीवांश्च भवेत्पुत्रो वृद्धकाले न संशयः ॥ ९ ॥

और जिसके जन्म काल में चन्द्रमा से नवम घरमें मंगल बैंठो हो यह आद‌मी धनी क्या वृद्धावस्था में पुत्रवाला होता है ॥ ९ ॥

चंद्राद्दशमगो भौमो जन्मकाले यदा भवेत् ।
 तस्य द्वारेषु तिष्ठंति गजा वाजी न संशयः ॥ १० ॥

और जिस मनुष्य की कुण्डली में चन्द्रमा से दशम घरमें मंगल बैठा हो उत्त मनुष्य के द्वार पर हाथी घोडों की भीड सदा रहती है इसमें संशय नहीं। १०।

चंद्रादेकादशे भौमो जन्मकाले यदा भवेत् ।
राजद्वारे प्रसिद्धः स्याद्यशोरूपसमन्वितः ॥ ११ ॥

और जिस मनुष्य की जन्मकुडली में चन्द्रमो से ग्यारहय घरम मंगल हो बह आदमी राजद्वार में प्रसिद्ध और यश तथा रूपसे संपन्न होता है ।। ११ ॥

चंद्राद्वादशगो भौमो जन्मकाले यदा भवेत् । 
मातुश्चासुखकारी च सदा कष्टस्य दायकः ।। १२ ॥

और जिसकी जन्म कुंडली में चन्द्रमा से बारहवें घरमें म'गल हो तब यह मनुष्य माता को दुःख दायक और सदा केवल कष्ट देने वाला होता है ॥ १२ ॥


चन्द्रमा  - सूर्य 

अथाय राशिभोवाध्यायप्रकारः । 

चन्द्रात्प्रथमगो भानुर्जन्मकाले यदा भवेत् । 
विदेशगामी भोगी च कलहे कृतवासनः ।। १ ॥

जिसकी कुण्डली में चन्द्रमा और सूर्य दोनों एक ही घरमें बैठे हों वह मनुष्य परदेश में जाने वालो, भागों का भोगने वाला और कलह करने में मन रखने वाला होता है ॥ १ ॥

जन्मकाले यदा भानुर्दितीयो यदि चंद्रतः ।
 बहुभृत्ययशाश्चैव राजमान्यो भवेन्नरः ॥ २ ॥

यदि जन्म के समय चन्द्रमो से द्वितीय घरमें सूर्य बैठा है। तब वह मनुष्य अनेक भृत्यों को रखने वाला बडा यशस्वी और राजमान्य होता है ॥ २ ॥

चन्द्राद्भानुस्तृतीयश्च जन्मकाले यदा भवेत् । 
स्वर्णार्थी शोशुचिश्चैव राजतुल्यो भवेन्नरः ॥ ३ ॥

और जिसकी कुडली में चन्द्रमा से तीसरे घरमें सूर्य हो वह मनुष्य सुवर्ण की चाहना करने वाला, बहुत सोच करने वालो तथा उसी के कारण राजा के तुल्य भधिक जनों का स्वामी होता है ॥ ३ ॥

चंद्राच्चतुर्थगो भानुजन्मकाले यदा भवेत् । 
गणकाःकथर्यत्येव मातृहास्ते न भक्तिमान् ॥ ४ ॥

और जिसकी कुंडली में चन्द्रमा से चतुर्थ स्थानमें सूर्य होता है तब ज्योतिषी लोग ऐसा कहते हैं कि वह मनुष्य अपनी माता का मोरने वाला होता है, उसकी भक्ति करने वाला नहीं ॥ ४ ॥

चंद्रात्पंचमगो भानुर्जन्मकाले यदा भवेत् । 
सुतामिश्चासुखी चैव बहुपुत्री भविष्यति ॥ ५ ॥

और जिसकी कुंडली में चन्द्रमा से पंचम घरमें सूर्य बैठा हो तब वह मनुष्य कन्याओं के निमित्त से दुःख पाने वाला तथा बहुत पुत्रों से युक्त होता है ॥ ५॥

चंद्रात्षष्ठगतो भानुर्जन्मकाले यदा भवेत् ।
 शत्रूणां विजयी शूरःक्षत्रकर्मरतः सदा ॥ ६ ॥

 जिसकी कुण्डली में चन्द्रमा से छटे घरमें सूर्य बैठा हो तब वह मनुष्य शत्रु जनों का जीतने वाला, शूरवीर और सदा क्षत्रियों के कर्म में निरत होताहै ॥ ६ ॥

जन्मकाले यदा भानुचंद्रात्सप्तमगो भवेत् । 
सुत्री सुशीलचारी च राजमान्यो महातपाः ॥७ ॥

और जिसकी कुंडली में चन्द्रमां से सप्तम घरमें सूर्य वैठा है। तब वह मनुष्य सुन्दर भार्या वाला, सुशील आचरण करने वाला, राजा से सत्कार पाने वाला, और महा तपस्वी होता है ॥ ७ ॥

चंद्रादष्टमगो भानुर्जन्मकाले यदा भवेत् ।
 सर्वदा क्लेशकारी च ह्यतिरोगात्प्रपीडितः ॥ ८ ॥

और जिसकी कुंडली में चन्द्रमा से अष्टम घरमें सूर्य बैठा हो तब वह मनुष्य सदा लेश करने वाला और अत्यन्त रोगों से पीडित होता है ॥ ८ ॥

चंद्रान्नवमगो भानुर्जन्मकाले यदा भवेत् । 
धर्मात्मा सत्यवादी च बंधुक्लेशी सदा भवेत् ॥ ९॥

और जिसकी कुडली में जन्म समय में चन्द्रमा से नवें घरमें सूर्य वैठाहो तब वह मनुष्य धर्म करने वाला और सत्य बोलने बोला सदा भाई बन्धु से द्वेष करने पाला होता है ॥ ३ ॥

चन्द्राद्दशमगो भानुर्जन्मकाले यदा भवेत् । 
तस्य द्वारेषु तिष्ठति धनांतो न संशयः ॥ १० ॥

और जिसकी कुंडली में चन्द्रमा से दशम घरमें सूर्य हो तब उस मनुष्य, के द्वार पर बडे धनवान् खडे रहते हैं इसमें संदेह नहीं ॥ १० ॥

चंद्रादेकादशे भानुर्जन्मकाले यदा भवेत् ।
 राजगर्व्यतिवेत्ता च प्रसिद्धःकुलनायकः ॥ ११ ॥

जिसकी कु'डली में चन्द्रमासे ग्यारहवें घरमें सूर्य बैठा हो वह मनुष्य राजगर्क बौला, वहुज्ञ, सर्वत्र प्रसिद्ध, और कुलका स्वामी होता हैं ॥ ११ ॥

चंद्राद्वादशगो भानुर्जन्मकाले यदा भवेत् ।
 लग्नद्वादशगे अंधश्चंद्रात्काणोऽयमुच्यते ॥ १२ ॥

और जिसकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा से बारहवें घरमें सूर्य वैठा हो बह मनुष्य काण्णा होता है क्यों कि ऐसा लिखा है कि लग्न से वारहवें घर में सूर्य हो तब वह मनुष्य भंधा और चन्द्रमासे वारहवें घरमें सूर्य बैठे तत्र वह मनुष्य कारणा होता है ॥ १२ ॥


Sunday, June 21, 2026


अथ चन्द्रराशिफलम् । 

लोलनेत्रःसदा रोगी धर्मार्थकृतनिश्चयः ।

 पृथुजंघः कृतघ्नश्च निष्पापो राजपूजितः ॥ १ ॥

 कामिनीहृदयानंदो दाता भीतो जलादपि । 

चंडकर्मा सृदृश्वांते मेषराशौ भवेन्नरः ॥ २ ॥

जिसकी मेष राशि होती है वह मनुष्य चंचल नेत्रों वाला, सदा रोगी, धर्म अर्थ में निश्चय रखने वाला, पुष्ट जंघावाला, कृतघ्नी, पापों से रहित, राजा से पूजा पाने बोला ।। १ ।॥

कामिनी स्त्रियों के हृदय में आनन्द देने बोला, दाता, जलसे डरने वाला, प्रचंड कर्म करता हुआ अन्त में वृद्धावस्था में शान्त होतो है ॥ २ ॥

भोगीदाता शुचिर्दक्षो महासत्वो महाबलः ।

धनी बिलासी तेजस्वी सुमित्रश्च वृषे भवेत् ॥ ३ ॥

 और जिसकी जन्भ समय में वृष राशि होती है वह मनुष्य भोगों का भोगने वाला, दानका देने वाला, बडा पवित्र, बडा चतुर, धैर्य यान्; बलवान्, धनधाण, क्रीडा करने वाला, बडा तेजस्वी और अच्छे २ मित्र वालो होता है ॥ ३ ॥

मिष्टवाक्यो लोलदृष्टिर्दयालुमैथुनप्रियः ।

 गांधर्ववित्कंठरोगी कीर्तिभागी धनी गुणी ॥ ४ ॥

 गौरो दर्षिःपटुर्वक्ता मेधावी च दृढबतः ।

 समर्थो न्यायवादी च जायते मिथुने नरः ॥ ५ ॥

और जिसकी अन्म समय में मिथुन राशि होती है वह मनुष्य मीठे वाक्य फड़ने वाला, चंचल दृष्टि वाला, बडा दयालु, मैथुन (विषय) प्रिय गान विवा आनने पाला, कण्ठ में जिसके रोग, कीर्ति का भागी, धनवान, गुणवान् ॥ ४ ॥

 गौर अंग वालो शरीर का लम्बा, पढा चतुर, बक्ताः बुद्धिनानः दढ संकल्पप्रने याला सब काम करने में समर्थ और न्याय वाक्य का कहने वाला होता है।५ ॥

कार्यकारी धनी शरो धर्मिष्ठो गुरुवत्सलः ।

 शिरोरोगी महाबुद्धिः कृशांगः कृत्यवित्तमः ॥ ६ ॥ 

प्रवासशीलः कोपांथोऽवलो दुःखी सुमित्रकः ।

 अनासक्तो गृहे वक्रःकर्कराशौ भवेन्नरः ॥ ७॥

और जिसकी जन्म समय में कर्क राशि होती है यह मनुष्य कामों का करने चालो; धनपान, शूरवीर, धर्मात्मा, गुरुजनों का वत्सल, शिरका रोगी बडा बुद्धिमान् दुर्वलांग, कृत्य जानने बालों में शिरोमणि ।। ६ ।।

परदेश में रहने बाला सब समय कोर्चाथ, बलसे हीन, दुःख भोगने वाला, उत्तम जिसके मित्र घरमें आसक्ति रहित और बडा टेढा होता है ॥ ७ ॥

क्षमायुक्तः क्रियासक्तो मद्यर्मासरतः सदा । 

देशभ्रमणशीलच शीतभीतः सुमित्रकः ॥ ८ ॥

 विनयी शीघ्रकोपी च जननीपितृवलमः । 

व्यसनी प्रक्टो लोके सिंहराशौ भवेन्नरः ।। ९ ।।

जिसके जन्म समय में सिह रोशि होती है यह मनुष्य क्षमांत्रान्; क्रिया करने में ओसक्त; सदा मय मांस खाने में निरत, देशों में अमण करने वाला, शीत से डरने वाला; सत्पात्र मित्रों बांला ॥ ८ ॥

विनय के स्वभाव वाला, शीघ्रही काप करने वाला, माता पिता का स्नेही, अनेक व्यसनों से युक्त और जगत् में विख्योत होता है॥६॥

बिलासी सुजनाह्लादी सुभगो धर्मपूरितः ।

 दाता दक्षःकविवृद्धो बेदमार्गपरायणः ॥ १० ॥

सर्वलोकप्रियो नाट्यगांधर्वव्यसने रतः । 

प्रवासशीलः स्त्रीदुःखी कन्याजातो भवेन्नरः ।। ११ ।।

और कन्या राशि वाला मनुष्य सब समय विलास करने वाला, सज्जनों को आनन्द देने वाला, बडा सुन्दर धर्मात्मा; दाता, चतुर, कविः वृद्धि अवस्था में वेद मार्ग में परायण ।। १० ।।

सब त्वोक को प्रिय, नृत्य गानका व्यसनी, प्रदेश का रहने वाला और खी निमित्त से दुःखी होता है ॥ ११ ॥

अस्थानरोषणो दुःखी मृदुभाषी कृपान्वितः ।

 चलाक्षश्चललक्ष्मीको गृहमध्येऽतिविक्रमः ॥ १२ ॥

 वाणिज्यदक्षो देवानां पूजको मित्रवत्सलः ।

 प्रवासी सुहृदामिष्टस्तुला जातो भवेन्नरः ।। १३ ।।

और जिसकी तुला राशि होती है वह मनुष्य असमय में क्रोध करने वाला, दुःख युक्त, कोमल वचन बोलने वाला, दयालु, चंचल नेत्र वाला, चंचल लक्ष्मी बोला, गृह में पराक्रमी ॥ १२ ॥

व्यापार में कुशल, देवताओं का पूजक, मित्रों से स्नेह रखने वाला, परदेश में रहने वाला और स्वजनों को इष्ट (प्रिय) होता है ॥ १३ ॥

बालप्रवासी क्रूरात्मा शरःपिंगललोचनः । 

परदाररतो मानी निष्ठुरः स्वजने भवेत् ॥ १४ ॥

 साहसप्राप्तलक्ष्मीको जनन्यामपि दुष्टधीः । 

धूर्तश्चोरकलारंभी वृश्चिके जायते नरः ॥ १५ ॥

और जिसकी वृश्चिक राशि होती है वह मनुष्य बालकपने से ही परदेश में रहने वाला; क्रूर अन्तःकरणा वौला, शूरवीर, पीले नेत्रों वाला, परस्त्रियों से संग करने वाला; बडा मानी स्वजनों में निठुरता युक्त ॥ १४ ॥

साहस से लक्ष्मी पाने वाला, अपनी माता में दुष्ट बुद्धि रखने वाला, बडा पूर्त और चोरी की कलाओं को सीखने वाला होता है ॥ १५ ॥

शुस्ःसत्यधिया युक्तःसात्विको जननंदनः ।

शिल्पविज्ञानसंपन्नो धनाढ्यो दिव्यभायेकः ॥ १६ ॥

 मानो चरित्रसंपन्नो ललिताक्षरभाषकः । 

तेजस्वी स्थूलदेहश्च धनुर्जातः कुलांतकः ॥ १७ ॥

और जिसकी जन्म समय में धनु राशि होती है यह मनुष्य शूरवीर, सत्य बुद्धि-से युथत; सात्विक प्रकृति वाला; मनुष्यों का आनन्द देने वाला, शिल्प विद्या का जामने याला, धन संपन्न, दिव्य जिसकी भार्या ॥ ९६ ॥

बडा मानी, चरित्रों से सम्पन, ललित अक्षरों का कहने चाला और बडा तेजस्वी, पुष्ट जिसका देह तथा अपने कुलका नाश करने वाला होता है ॥ १७ ॥

कुले नष्टो वशःस्त्रीणां पंडितः परिवादकः । 

गीतज्ञो ललिताग्राह्यः पुत्राढयो मातृवत्सलः ॥ १८॥ 

धनी त्यागी सुभृत्यश्च दयालुर्वहुबांधवः ।

परचिंतितसौख्यश्च मकरे जायते नरः ।। १९ ।।

और जो मनुष्य मकर राशि वाला होता है वह अपने जुलमें सबसे हीन, स्त्रियों के बश में रहने पाला, पण्डित, बुराई करने वाला, गान विद्या जानने याला, सुन्दर स्त्रियों से स्वीकृत, पुत्रवान्, माता की सेवा करने वाला ॥ १८ ॥

धनयान, त्यागी, उत्तम जिसके भृत्यः बडा दयालु, अनेक भाई बन्धु वालो और अन्यों के सुखका चितवन करने वाला होता है ॥ १६ ॥

दातालसःकृतज्ञत्र गजवाजिधनेश्वरः ।

 शुभदृष्टिः सदा सौग्यो धनविद्याकृतोद्यमः ।। २० ।।

 पुण्याढद्यः स्नेहकीर्तिश्च धनभोगी स्वशक्तितः ।

 शालूरकुक्षिर्निर्भीतः कुंभे जातो भवेन्नरः ।। २१ ।।

और जिसके जन्म समय में कुम्भ राशि होती है यह मनुष्य दान देने वाला, महा मालसी वि.ये हुए उपकार का जानने याला हांथी थे।डे तथा धनका स्वामी शुम जिसकी दृष्टिः सदा सोभ्य, धन और पिया के अर्थ उद्यम करने बोला ॥२०॥

पुरायवान्, स्नेह कीर्तियुक्त धन भोगने वालो सामथ्य वान, मंडूक समान कृख. वाला और निर्भय रहने बाला होता है ॥ २१ ॥

गंभीरचेष्टितःशुरःदुवाक्यो नरोत्तमः ।

 कोपनःकृपणो ज्ञानी गुणश्रेष्ठः कुलप्रियः ॥ २२॥

 नित्यसेवी शीघ्रगामी गंधर्वकुशलः शुभः ।

 मीनराशौ समुत्पन्नो जायते बंधुवत्सलः ॥ २३ ॥

और जिसके जन्म समय में मीन राशि होतीहै वह मनुष्य गम्भीर चेष्टा करने काला शूरवीर, चतुराई के वाक्यों का कहने वाला मनुष्यों में उत्तमः क्रोधी, कृपया, झानवान, गुणों में श्रेष्ठ, कुलमें प्रिय ॥ २२ ॥

नित्य सेवा करने वाला शीघ्रता से चलने वाला, गान विद्या में कुशल, शुभआचरण वाला और भाई बन्धुओं से स्नेह रखने वाला होता है ॥ २३ ॥ 


अथ नवांश फल 

पिशुनश्चपलो दृष्टः पापकर्मा निराकृतिः । 

परेषां व्यसने सक्तःप्रथमांशे प्रजायते ॥ १ ॥

अपने जन्म राशि के प्रथम नवांश में जन्म लेने वाला मनुष्य चुगलखोर, बडा चपल, पापकर्म करने वाला, बुरी खरत वाला, हर एक जीवको दुःखदायी होता है ॥ १ ॥

उत्पन्नविभवो भोक्ता संग्रामे विगतस्पृहः ।

गांधर्वप्रमदासक्तो द्वितीयांशे प्रजायते ॥ २ ॥

और लग्न के दूसरे नवांश में जन्म लेने वाला मनुष्य उत्पन्न हुए विभवका भोक्ता, लडने में इच्छा रहित, गान विद्या और त्रियों में आसक्त होता है ॥ २ ॥

धर्मिष्ठः संततव्याधिःसर्वसारज्ञ एव च ।

 सर्वज्ञो देवताभक्तस्तृतीयांशे प्रजायते ॥ ३ ॥

और जिसका जन्म लग्नके तीसरे नांशमें होता है वह मनुष्य धर्मात्मा, निरन्तर रोगी, सबों के अभिप्राय का जानने वाला, सर्वज्ञ, और वैवतों का भक्त होताहै ॥

चतुर्थांशेऽभिजातस्तु दीक्षितो गुरुभक्तिमान् । 

यत्किंचिद्धरणौ वस्तु तत्सर्वं लभते हि सः ॥ ४ ॥

और जो लग्न के चतुर्थ नवांश में जन्म लेता है वह मनुष्य दीक्षित गुरु जनों में भक्ति रखने वाला और जो कुछ भूमि में बस्तु है उस सक्केा प्राप्त करने याला होता है ॥ ४ ॥

सर्वलक्षणसंपन्नो राजा भवति विश्श्रुतः । 

दीर्घायुर्वहुपुत्रश्च जायते पंचमांशके ॥ ५ ॥

और जो मनुष्य लग्न के पंचम नवांश में जन्म लेता है वह सब लक्षणों से संपन्न जगत् में विख्यात राजा, दीर्घायु और बहुत पुत्र वाला होता है ।॥ ५ ॥

स्त्रीनिर्जितःशुमैर्हानो बहुमानी नपुंसकः । 

अर्थध्वंसी प्रमाथी च षष्ठांशे जायते नरः ॥ ६ ॥

और जिसका लग्न के 6टे नवमांश में जन्म होता है वह मनुष्य स्त्री से मैथुन में हारने वाला, शुभ से पर्जित, बहुत अभिमानी, नपुंसक, धनका नाश करने वाला और प्रमाथी होता है ॥ ६ ॥

विक्रांतो मतिमाञ्छूरः संग्रामेष्वपराजितः । 

महोत्साही च संतोषी जायते सप्तमांशके ॥ ७॥

और लग्न के सप्तम अंशका जन्म लेने वाला पुरुष श्डां पर।कभी, बुद्धिमान्, शरबीर स'ग्राम में न हारने वाला, बडा उत्साही और संतोषी होता है ॥ ७ ॥

कृतघ्नो मत्सरी क्रूरः क्लेशभागी बहुप्रजः । 

फलकाले परित्यागी जायते चाष्टमांशके ॥ ८ ॥

और लग्न के अष्टम नवमांश का जन्म लेने वाला मनुष्य बडी कृतघ्न, मत्सरता करने वाला, बडा क्रूर लेशका भोगने वाला, बहुत सन्तान वाला और फल के समय व्याग करने वाला होतो हैं ॥ ८ ॥

क्रियासु कुशलो दक्षःसुप्रतापी जितेंद्रियः । 

भृत्यैश्व वेष्टितो नित्यंजायतेऽय नवांशके ॥ ९ ॥

और लग्न के नवे नवमांश में जन्म लेने वाला मनुष्य अनेक क्रियाओं में कुशल, बडा चतुर, बडां प्रतापी, इन्द्रियों का जीतने बोला और अनेक भृत्य रखने बोला होता है। ६। 

उभये तत्पञ्चमादेरिति चिन्त्यं विचक्षणैः ।

 देवा नृराक्षसाचैव चरादिषु ग्रहेषु च"।

अर्थात् जब नवमांश निकालना है तो चर राशि में उसी राशि से गणना करे, और स्थिर राशि में उससे नवम राशि से गणना करे, और द्विस्वभाव में उससे पांचवी राशि से गणना करे। अव नवमांश के स्वामी कहते हैं, चर राशियों के नवमांशों के स्वामी देवता हैं, और स्थिर राशियों के नवमांशों के  मनुष्य हैं, द्विस्वभाव राशियों के नवमांशों के स्वामी राक्षस हैं ।॥

स्पष्टज्ञानार्थचक्रमिदम् ।



अब चक से नवमांश निकालने की सुगम रीति लिखते हैं ।॥

जिस राशिको नवमांश निकालना है उसके जितने अंश गत हुए हों उन्हीं अंशों के सामने और उसी राशि के नीचे वाले कोष्ठक में जो राशि है बस उसी का नवमांश

जानना चाहिये ।।

उदाहरण ।

जैग्ने मेषका नवमांश निकालना है तो देखिये कि उसके कितने अंश गत हुए हैं अथवा मेपके १५ अंश गन हुए हैं तो १६-४० के सामने देखिये श्रीर मेपके नीचे देखिये तो ५ आया तो सिंह राशि हुई बस यही नवमांश है इसका स्वामी नवमांशेश (स्थ) होगा ॥


अथ लग्न फलम् --

मेषलग्ने समुत्पन्नश्चंडो मानी धनी शुभः । 

कोधी स्वजनहंता च विक्रमी परवत्सलः ॥ १ ॥

मेष लग्न में जन्म लेने वाला पुरुप बडा प्रचंड (तेज मिजौज वाला) अभि-मानी, धनवान, शुभ आचरण वाला, बडा क्रोधी, अपने लोगों को मारने वाला, बडा पराक्रमी तथा अन्य पुरुषों से स्नेह करने वाला होता हैं ।॥ १ ॥

वृषलग्नभवो लोकगुरुभक्तःप्रियंवदः ।

 गुंणी कृती धनी लोभी शूरःसर्वजनप्रियः ॥ २ ॥

और वृष लग्न में जो पुरुष जन्म लेता हैं यह आदमी लोक तर्थों अपने गुरु जनों का भक्त; प्रिय वाक्य का कहने वाला, गुणवान; पण्डित, धनवान्, लोभी, शूरवीर तथा सब जनों का प्रिय होता है ॥ २ ॥

मिथुनोव्यसंजातो मानी स्वजनवल्लमः ।

त्यागी भोगी धनी कामी दीर्घसूत्रोऽरिमर्दकः ॥ ३ ॥

मिथुन लग्न में जन्म लेने वाला आदमी बडा अनिमामी; अपने बन्धु जनों को प्रिय; व्यागी तथा मे।गी; धनवान्, बडा कामी, आलसी (बड़ी देरी से काम करने बाला) और शत्रु जनो का मारने बाला होता है ॥ ३ ॥

कर्कलग्ने समुत्पन्नो भोगी धर्मजनप्रियः । 

मिष्टान्नपानसंयुक्तः सौभाग्यः सुजनप्रियः ।॥ ४ ॥

और जो कर्क लग्ब में जन्म लेता है यह मनुष्य भोग भोगने वालो, धर्मात्मा, व्सनुष्यों को प्रिय, मिष्ठान्न पानसे संयुक्त, भाग्यशोली और सज्जनों को प्रिय होता है।

सिंहलग्नोदये जातो भोगी शत्रुविमर्दकः । 

स्वल्पोदरोऽल्पपुत्रश्च सोत्साही रणविक्रमी ॥ ५॥

और सिंह लग्न में जन्म लेने पाला मनुष्य भोगों का भोगने वालो; शत्रु जनों 'को मारने याला, छोटे पेट पाला, कम पुत्र वाला, उत्साह रखने वाला, रणसें पराकब करने वाला होता है ।। ५॥

कन्यालग्ने भवेद्वालो नानाशास्त्रविशारदः । 

सौभाग्यगुणसंपन्नः सुंदर-सुरतप्रियः ॥ ६ ।।

और कन्या लग्न में जम्म लेने वाला पालक अनेक शाखोंमें विशारद, कल्याण दायक गुणों से सम्पन्न, सुन्दर और स्त्री संगमें रुचि रखने याला होता है ॥ ६ ॥

तुलालग्नोदये जातः सुधीः सत्कर्मजीविकः ।

विद्वान्सर्वकलाभिज्ञो धनाढ्यो जनपूजितः ॥ ७ ॥

और जिसका तुला लनमें जन्म होता है वह मनुष्य वडा पण्डित, सत्कर्मा से लीपिको करने पाला, बडा विद्वान, सब कला जानने वालाः धनवान् और मनुष्यों से पूजित होता है ॥ ७ ॥

वृश्चिकोदयसंजातः शौर्यवान्धनवान्सुधीः । 

कुलमध्ये प्रधानश्च प्राज्ञःसर्वस्य पोषकः ॥ ८ ॥

और वृश्चिक लग्न में जो मनुष्य जन्म लेता है वह मनुष्य शूरवीर, धनवान पण्डित, कुल में मुख्य, बडा बुद्धिमान् और सबको पोषण करने वाला होता है ।॥८॥ 

धनलग्नोदये जातो नीतिमान्धर्मवान्सुधीः । 

कुलमध्ये प्रधानश्च प्राज्ञःसर्वस्य पोषकः ॥ ९ ।।

और जिस मनुष्य का धन लग्न में जन्म होता है वह मनुष्य बडा नीतिमान्, धर्मज्ञ, बुद्धिमान, कुलमें प्रधान, वडा विद्वान् और सब मनुष्य मात्रों का पोषणा करने वाला होता है ।।६ ॥

मकरोदयसंजातो नीचकर्मा बहुप्रजः । 

लुब्धो विनष्टो ऽलसश्च स्वकार्येषु कृतोद्यमः ।। १० ॥

और जिस मनुष्यका मकर लग्नमें जन्म होता है यह नीच कर्मों का करने वाला, वहुत संतति वाला, बड़ा लोभी, सर्वनाशी, आलसी और अपने कामों में उद्यम करने वाला होता है ॥ १० ॥

कुंभलग्ने नरो जातोऽचलचित्तो ऽतिसौहृदः । 

परदाररतो नित्यं मृडुकार्यों महासुखी ।। ११ ॥

और जिसका कुम्भ लम्नमें जन्म होता है वह मनुष्य अटल चित्त वाला; बडे सुहृद भावसे युक्त, नित्य पर स्त्री गामी, धीरे से काम करने वाला भौर अत्यन्त सुख चाहने वाला होता है ॥ ११ ॥

मीनलग्ने भवेद्धालो रत्नकांचनपूरितः । 

अल्पकामोऽतिकृशश्च दीर्घकालविचिंतकः ॥ १२ ॥

और जिसका मीन लग्न में जन्म होता है यह बालक रत्नों से और सुवर्ण से परिपूर्ण, थोडी काम चेष्टा करनेवाला, अत्यन्त दुबला पतला, और बहुत काल तक विचार के कार्य करने वाला होता है ॥ १२ ॥

अथ गणफलम् ।

सुंदरो दानशीलश्च मतिमान्सरलःसदा । 

अल्पभोजी महाप्राज्ञो नरो देवगणे भवेत् ॥ १ ॥

जिस पुरुप का देवगण होता है वह पुरुप स्वरूप से सुन्दर, दान करने में स्वभाव रखने वाला, बुद्धिमान, बडो सरल, अल्प भोजन करने वाला और बडा बुद्धिमान होता है ॥ १ ॥

मानी धनी विशालाक्षो लक्ष्यवेधी धनुर्धरः ।

 गौरःपौरजनग्राही जायते मानवे गणे ॥ २ ॥

जिस पुरुपका पुरुपगण होता है वह पुरुप अधिमानी, धनवान, विशाल नेत्रों वाला, लक्ष्य (निशाना) वेधने वोला, धनुप धारण करने वाला, गौर अंग वालो और पुरवासी पुरुषों के साथ सहानुभूति करने वाला है।ता है ॥ २ ॥

उन्मादी भीषणाकारः सर्वदा कलिवल्लभः । 

पुरुषो दुःसहं बते प्रमेही राक्षसे गणे ॥ ३ ॥

जिस पुरुप का राक्षसगण होता है वह पुरुप बडा उन्मादी, भय कर आकार वाला, सब समय कलहप्रियः दुर्वाक्य बोलने वाला और प्रमेह के रोग से युक्त होता है ॥ ३ ॥



अथ योनिफलम् ।
स्वच्छंदः सद्गुणःशूरस्तेजस्वी घर्घरेश्वरः । 
स्वामिभक्तस्तुरंगस्य योन्यां जातो भवेन्नरः ॥ १ ॥

जिस पुरुषकी अश्वयोनि होती है वह पुरुष स्वेच्छाचारी, उत्तम गुणोंसे युक्त, शूरवीर, घर्घर स्वर वाला और स्वाभी का भक्त होता है ॥ १

राजमान्यो बली भोगी भूपस्थानविभूषणः ।
आत्मोत्साही नरो जातो गजयोनौ न संशयः ॥ २॥

जिस पुरुष की गज (हाथी) योनि होती है वह राजा से मान पाने वाला बलवान्, भोगों का भोगने वाला, रोज स्थानका आभूषण और मनमें उत्साह रखने वाला होता है ॥२॥

स्त्रीणां प्रियःसदोत्साही बहुवाक्यविशारदः । 
स्वल्पायुश्च नरोजातः पशुयोनौ न संशयः ॥ ३ ॥

और जिसकी पशु योनि होती है यह मनुष्य स्रियों का प्रिय सदा उत्साह रखने वाला, मनेक प्रकार के वाक्यों के कहने में कुशल; अल्पायु होता है ॥३॥

दीर्घरोषः सदा क्रूर उपकर्कारं न गृह्यते ।
चैपलो रसनालौल्यः सर्पयोनौ न संशयः ॥ ४ ॥

और जिसकी सर्पयोनि होती है वह मनुष्य बडा क्रोधी सब समय क्रूरता युक्त, किये हुए उपकार का न मानने वाला, बडा चपत्न जीभ से लेालता युक्त (हरएक वस्तु पर मन चलाने वाला) होता है ॥ ४ ॥
सोद्यमः सुमहोत्साही शूरःस्वज्ञातिविग्रही ।
 मातृपित्रोः सदा भक्तः श्वानयोनौ समुद्भवः ॥ ५ ॥
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जिसकी श्व (कुत्ता) योनि होती है वह मनुष्य उद्यम करने वाला बडी उत्साही, शूरवीर, अपनी जाति से विगाड रखने वाला और अपने माता पितां का सदा भक्त होता है ।। ५ ॥

स्वस्वकार्ये शूरदक्षो मिष्टान्नाहारभोजनः । 
निर्दयो दुष्टसद्भावीं'नरो मार्जारयोनिजः ॥ ६ ॥

और जिसकी मार्जार ( बिलाब) योनि होती है यह मनुष्य अपने निज काम में शूरवीर; चतुर, मीठे अन्न का भोजन करने वाला, बडा निर्दयी दुष्टों से सद्भाव (प्रेम) रखने वाला होता है ॥ ६ ॥

महद्विकमयोद्धापि-ईश्वरो विभवेश्वरः । 
परोपकारी नित्यं च मेषयोनौ भवेन्नरः ॥ ७ ॥

और जिस मनुष्य की मेष ये।नि होती है वह बडा पराक्रमी सब कार्यों के करने में समर्थ, बहुत धनका स्वामी और नित्य परोपकार करने वाला होता है ॥ ७॥

बुद्धिमान्वित्तसंपूर्णः स्वकार्यकरणोद्यतः । 
अप्रमत्तोऽप्यविश्वासी नरोमूषकयोनिजः ॥ ८ ॥

और जिसका मूषक योनि में जन्म होता है यह मनुष्य बुद्धिमान् धन सम्पन्न अपने कोम करने में सदा उद्यत, सदो सावधान और सब का अविश्वास करने चाला, युद्ध करने वाला होता है ॥ ८ ॥

स्वधर्मे तु सदाचारःसत्क्रियासद्द्भणान्वितः ।
कुटुम्बस्य ससुद्धर्ता सिंहयोनिभवो नरः ॥ ९ ॥ 

जिस मनुष्य की सिंह योनि होती है वह अपने धर्म में सच्चा आचार रखने वाला; उत्तम क्रिया तथा उत्तम गुणों से सम्पन्न और कुटुम्ब का उद्धार करने बाला होता है ॥ ६ ॥

संग्रामे विजयी योद्धा सकामस्तु बहुप्रजः । 
वाताधिको मंदमतिर्नरो महिषयोनिजः ॥ १०॥

जिसकी महिष योनि होती है वह मनुष्य संग्राम में विजय पाने वाला योद्धा, कोमी, अनेक संतानों से युक्त, बांतपकृति वाला और बडा मंदबुद्धि होतो है ॥१०॥

स्वच्छन्दोऽर्थरतो ग्राही दीक्षावान्स विशुःसदा । आत्मस्तुतिपरोनित्यं व्याघ्रयोनिभवो नरः ॥ ११ ॥

जिसकी व्याघ योनि होती है वह मनुष्य स्वेच्छाचारी, धन के उद्यम में निरत, सदुपदेशों का ग्रहण करने वाला, दीक्षायुक्त सदा समर्थ आत्मस्तुति करने में तत्पर होता है ॥ ११ ॥

स्वच्छंदः शांतसद्धत्तिःसत्यवान्स्वजनप्रियः ।
धर्मिष्ठो रणशूरश्च यो नरो मृगयोनिजः ॥ १२ ॥

और जो मृग योनि याला मनुष्य होता है वह स्वतन्त्रता पूर्वक रहने वाला, शांत प्रकृति, उत्तम वरताब पाला; सत्य वाक्य बोलने वाला; अपने मनुष्यों से स्नेह करने वाला, धर्माचरण करने वाला, युद्ध में शूरवीर होता है ॥ १२ ॥

चपलो मिष्टभोगी चार्थलुब्धश्च कलिप्रियः ।
सकामः सत्त्रजःशूरो नरो वानस्योनिजः ॥ १३ ॥

और जिसकी वानर योनि होती है, यह मनुष्य बडा चपल, मीठी चीज खाने याला; धन का लामी, कलह प्रिय, काम सहित अच्छी सन्तान वाला और शूरवीर होयों है ॥ १३ ॥

परोपकरणे दक्षे वित्तेश्वरविचक्षणः ।
पितृमातृप्रियो नित्यंनरो नकुलयोनिजः ॥ १४ ॥

और जिसकी नकुल योनि होती है यह मनुष्य परे। पकार करने में प्रवीण धनि यों में प्रधान; वडा चतुर और नित्य माता पितासे स्नेह करने वाला होता है।