समुद्र योग-
यदि प्रथम भाव से आरम्भ करके एक-एक घर को छोड़कर छः भावों में अर्थात् द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम, दशम एवं द्वादश भावों में सब ग्रहों की स्थिति हो तो 'समुद्र' नामक योग होता है। इस योग वाला जातक दयावान, कीर्तिमान्, धैर्यवान्, ऐश्वर्यवान् होकर अपने कुल को धन्य करता है।
गोल योग-
सभी ग्रह एक राशि में हों तो गोल योग होता है। इस योग वाला पाखण्डी, निर्धन, समाज से बहिष्कृत, माता पिता के सुख से वंचित, धनहीन एवं अस्वस्थ्य रहता है।
युग योग-
यदि दो राशियों में ही सातों ग्रहों की स्थिति हो तो युग नामक योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला निर्लज्ज, हिंसक, धनपुत्र हीन, अधर्मी, अनाचारी, अविवेकी, पाखण्डी, माता-पिता के सुख से रहित तथा अस्वस्थ शरीर वाला होता है।
शूल योग-
यदि तीन राशियों में सातों ग्रहों की स्थिति हो तो 'शूल' नामक योग होता है। इस योग वाला जातक शूर, युद्ध में विजयी, हिंसक, निन्दित कर्म करने वाला, तीक्ष्ण स्वभाव वाला, आलसी, खल तथा निर्बल होता है। वह अन्य लोगों के मन में काँटे की भांति चुभता है। ऐसा व्यक्ति राज्यकर्मचारी बनता है।
केदारयोग-
यदि चार राशियों में सभी सातों ग्रह स्थित हों तो केदार योग होता है। इस योग वाला जातक तीक्ष्ण स्वभाव, आलसी, निर्धन, हिंसक, शूर, युद्ध में विजयी और राजकर्मचारी होता है।
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