९. शङ्खचूड़ कालसर्प योग
नवम भाव में राहु तथा तृतीय भाव में केतु तथा अन्य ग्रह इनके मध्य में हो तो शङ्खचूड़ नामक कालसर्प योग बनता है।
इस योग वाले जातक के भाग्य में रुकावटें आती है। धर्म कर्म में रुचि बनें एवं विघ्न आते हैं।
नौकरी में मातहत को उन्नति मिल जाती है, पर उस व्यक्ति की पदोन्नति रुक जाती है।
मङ्गल कार्यों में विघ्न आते हैं। विघ्नों के कारण धर्म में श्रद्धा-अश्रद्धा पैदा होती है।
परिवार के बड़े बुजुर्ग की आत्मा परेशान करे, यदि बृहस्पति भी कमजोर है तो यह योग प्रबल होगा।
व्यक्ति तन्त्र मन्त्र के चक्कर में पड़ता है एवं अधिकांशतः ठगा जाता है।
जीवन में उन्नति करता है तो वृद्धावस्था में सन्तान व स्त्री के कारण चिन्ता परेशानी रहे। धन हानि होवे, वैमनस्यता बढ़े।
इस योग में पिता का सुख भी कम हो जाता है। या तो पिता का सुख कम रहे अथवा माता-पिता, परिवार में वैमनस्यता के कारण पिता से दूर रहे।
जातक की मृत्यु अकस्मात हावे।
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