३. वासुकी कालसर्प योग
तृतीय भाव में राहु तथा नवम भाव में केतु हो तो वासुकी कालसर्प योग बनता है।
ऐसा व्यक्ति अपने भाईयों व कुटुम्बियों से दुःखी रहता है। उसे घर का पड़ौस भी अच्छा नहीं मिलता। आत्मीयजन उससे जलन करते हैं।
भाग्य मन्द गति से चलता है। कन्धों में दर्द रहेगा। सफलता के किनारे आकर रुक जाये। प्रतिस्पर्धा में मेरिट में कुछ नम्बरों से रह जाये।
एजेन्सी, ठेका, तेजी मन्दी, शेयर्स में नुकसान रहे। डरावने स्वप्न, काले स्वप्न आये या स्वप्न में सर्प अधिक दिखाई दे। छोटे बच्चे रात को बिस्तर गीला कर देवे। कुटुम्ब में कोई अकाल मृत्यु होवे, उसकी आत्मा परेशान करे।
यदि शुभ ग्रह राहु के साथ होवे तो उसे घटना का पूर्वाभास हो जाये। कुण्डली में अच्छे योग होवे, तृतीयेश नवमेश बलवान होवे तो व्यक्ति भविष्यवक्ता भी हो सकता है।
इस जातक को हनुमान, भैरव या कार्तिक स्वामी की उपासना करनी चाहिये। मनोवाञ्छित फल नहीं मिलने से जातक कभी कभी नास्तिक भी हो जाता है।
यदि तीसरे स्थान में केतु या नवें राहु हो तो व्यक्ति छल कपट करे, तन्त्र मन्त्र प्रयोग करे।
ऐसा व्यक्ति झूठे किस्से आसानी से गढ़ लेता है। जातक वकील, एक्साईज इंस्पेक्टर, नर्सिंगकार्य, तस्करी कार्य भी करता है। परिस्थितिों से झूझते हुये कुछ जातक अदम्य साहसी भी होते हैं।
सातवें घर पर राहु की दृष्टि होने से एवं पञ्चम स्थान कमजोर होने पर विवाह में विघ्न कारक है।
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