भूमिप्लव (ढ़लान)
उत्तर की ओर ढलान वाली भूमि ब्राह्मणों के लिये, पूर्व-प्लवा भूमि क्षत्रियों के लिये, दक्षिण-प्लवा भूमि वैश्यों के लिये एवं पश्चिम-प्लवा भूमि शूद्रों के लिये प्रशस्त होती है। इनमें ब्राह्मण राशि का गृह-कर्ता किसी भी भूमि पर गृह-निर्माण करा सकता है, किन्तु अन्य तीन राशि वालों को अपने-अपने अनुकूल ढलान वाली भूमि पर ही गृह-निर्माण कराना चाहिये-
सौम्यादिप्लवभूतले विरचयेद् विप्रादिकोऽग्योऽखिले ।
(मुहूर्तमार्तण्ड)
उदगादिप्लवमिष्टं विप्रादीनां प्रदक्षिणेनैव ।
विप्रः सर्वत्र वसेदनुवर्णं यथेष्टमन्येषाम् ।।
(वास्तुसौख्य)
भूमि-प्लव ईशानादि कोणों में भी सम्भव है। वास्तु-ग्रन्थों में इनका फल इस प्रकार वर्णित है-
श्रियं दाहं तथा मृत्युं धनहानिं सुतक्षयम् ।
प्रवासं धनलाभं च विद्यालाभं क्रमेण च ॥
विदध्यादचिरेणैव पूर्वादिप्लवतो मही।
मध्यप्लवा मही नेष्टा न शुभाः प्लवतत्परा ।
(बृहद्वास्तुमाला)
ईशान कोण में ढलान वाली भूमि गृहकर्ता को विद्या प्रदान करती है। अग्निकोण में अग्नि-दाह, नैर्ऋत्य कोण में धन हानि तथा वायव्य कोण में ढलान वाली भूमि प्रवासरूपी फल प्रदान करती है। पूर्व दिशा में ढलान वाली भूमि लक्ष्मी, दक्षिण ढलान वाली मृत्यु, पश्चिम ढलान वाली भूमि पुत्र-नाश एवं उत्तर की ओर ढलान वाली भूमि धन प्रदान करती है। मध्य में इलान वाली एवं गृह के सम्मुख यदि गृह की ओर ढलान वाली भूमि हो तो वह भूमि त्याज्य होती है। दिशाओं एवं कोणों के प्रवाह को इस प्रकार समझा जा सकता है-
पूर्व - श्री
आग्नेय -दाह
दक्षिण -मृत्यु
नैर्ऋत्य -धनहानि
पश्चिम- सुत-हानि
वायव्य- प्रवास
उत्तर- धनलाभ
ईशान -विद्यालाभ
तात्पर्य यह है कि गृह-भूमि का ढलान ईशान कोण, पूर्व एवं उत्तर शुभ है, शेष त्याज्य है। भूमि के सतह की ऊँचाई एवं ढ़लान को ध्यान में रखते हुये वास्तुविदों ने विभिन्न प्रकार के वास्तु-भेदों का वर्णन किया है। 'वास्तु-प्रबोध' में गजपृष्ठ, कूर्मपृष्ठ, दैत्यपृष्ठ एवं नागपृष्ठ भूमियों का वर्णन प्राप्त होता है, जो इस तालिका में स्पष्ट है-
नाम - लक्षण - वास-परिणाम
गजपृष्ठ -
दक्षिण, पश्चिम, नैर्ऋत्य एवं वायव्य में उच्च
-लक्ष्मी से एवं आयु
से पूर्ण
1 कूर्मपृष्ठ -
मध्य में ऊँची एवं चारो ओर नीची -
नित्य उत्साह, धन-धान्य की विपुलता
2 दैत्यपृष्ठ
पूर्व, आग्नेय एवं ईशान कोण में ऊँची एवं पश्चिम में नीची
लक्ष्मी नहीं आती तथा धन,
पुत्र एवं पशुओं की हानि होती है।
3 नागपृष्ठ
पूर्व एवं पश्चिम में दीर्घ एवं दक्षिण-उत्तर में उच्च
मृत्यु, पत्नी एवं
पुत्र की हानि तथा शत्रु-वृद्धि ।
'बृहद्वास्तुमाला' ग्रन्थ के भूमि-लक्षण प्रकरण (श्लोक ४४-६४) में भूमि की ऊँचाई एवं ढलान को आधार मानकर वास्तु के अनेक भेद प्रस्तुत किये गये हैं। इन्हें अधोलिखित तालिका में दर्शाया गया है।
वास्तुसंज्ञा - ऊँची- नीची- परिणाम
यमवीथी - उत्तर - दक्षिण
गजवीथी -दक्षिण - उत्तर
भूतवीथी - ईशान - नैर्ऋत्य
नागवीथी - आग्नेय - वायु
वैश्वानरी -वायव्य - अग्नि
धनवीथी - नैर्ऋत्य- ईशान
पितामह - पूर्व एवं आग्नेय के मध्य - पश्चिम एवं वायव्य के मध्य -सुखद
सुपथ -दक्षिण एवं आग्नेय के मध्य -उत्तर एवं वायव्य के मध्य -शुभ
दीर्घायु -नैर्ऋत्य एवं दक्षिण के मध्य -उत्तर एवं ईशान के मध्य =कुल-वृद्धि
पुण्यक-पश्चिम एवं नैर्ऋत्य के मध्य- पूर्व एवं ईशान के मध्य=चारो वर्ण के लिए शुभ
अपथ-वायव्य एवं पश्चिम के मध्य-पूर्व एवं आग्नेय के मध्य=वैर एवं कलह
रोगकृत्-उत्तर एवं वायव्य के मध्य-के मध्य दक्षिण एवं आग्नेय=रोग
अर्गल-उत्तर एवं ईशान के मध्य-के मध्य दक्षिण एवं नैर्ऋत्य=पापनाशिनी
श्मशान-पूर्व एवं ईशान के मध्य-पश्चिम एवं नैर्ऋत्य के मध्य=कुल-नाश
श्येनक-नैर्ऋत्य, ईशान तथा वायव्य-आग्नेय=मृत्युकारक
श्वमुख -ईशान, आग्नेय तथा पश्चिम-नैर्ऋत्य=दरिद्रता
ब्रह्मघ्न-नैर्ऋत्य, आग्नेय तथा ईशान-पूर्व, वायव्य=निवास के अयोग्य
स्थावर-आग्नेय-नैर्ऋत्य, ईशान तथा वायव्य=शुभ
स्थण्डिल-नैर्ऋत्य-आग्नेय, वायव्य एवं ईशान=शुभ
शाण्डुल-ईशान-वायव्य, आग्नेय=अशुभ
सुस्थान-नैर्ऋत्य, ईशानआग्नेय--उत्तर=ब्राह्मणों के लिये शुभ
सुतल -नैर्ऋत्य, पश्चिम वायव्य-पूर्व =क्षत्रियों के लिये प्रशस्त
चर -उत्तर, ईशान, वायव्य- दक्षिण=वैश्यों के लिये शुभ
श्वमुख -ईशान, पूर्व, आग्नेय-पश्चिम =शूद्रों के लिये शुभ
इस प्रकार प्लव की दृष्टि से वास्तु-क्षेत्र के उपर्युक्त भेद बनते हैं।
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