निषिद्ध भूमि एवं परिवेश
जिस भूमि पर गृह बनवाना हो, उसके
पूर्व में बरगद,
दक्षिण में पाकड़,
पश्चिम में पीपल
एवं उत्तर में गूलर
का वृक्ष नहीं होना चाहिये। इनसे गृहस्वामी को क्रमशः अग्निभय, प्रमाद, शस्त्रभय एवं उदररोग होता है
अश्वत्थोऽग्निभयं कुर्यात् प्लक्षः कुर्यात् प्रमादकम् ।
न्यग्रोधः शखसम्पातं कुक्षिरोगमुदुम्बरः ॥
(बृहद्वास्तुमाला)
भूमि कटी-फटी न हो, ऊषर न हो, भूमि के भीतर (लगभग १ पुरुष-प्रमाण की गहराई में) हड्डी आदि न हो, भूमि ऊबड़-खाबड़ न हो अर्थात् समतल हो, भूमि में दीमक की बाँबी न हो तथा जहाँ गृह बनवाना हो वहाँ चचैत्य वृक्ष (ग्राम का प्रधान वृक्ष, जहाँ देवी-देवताओं आदि का स्थान हो) नहीं होना चाहिये-
स्फुटिता च सशल्या च वल्मीकारोहिणी तथा ।
दूरतः कर्तुरायुर्धनापहा ।
परिहर्तव्या चैत्ये भयं गृहकृतं वल्मीकश्वभ्रसंकुले विपदः ।
(वास्तुसौख्य)
वराहमिहिर के अनुसार गृह के समीप मन्त्री का आवास (सचिवालय), धूर्त व्यक्ति का निवास, देवकुल, चौराहा, ग्राम का प्रधान वृक्ष, दीमक की बाँबी, जीव-जन्तुओं के बिल, गड्डा एवं कछुए की आकृति (बीच से उठी) नहीं होनी चाहिये। यदि गृह के निकट मन्त्री का आवास हो तो धन की हानि, धूर्त व्यक्ति का गृह हो तो पुत्र का वध, देव-कुल हो तो व्याकुलता, चौराहा हो तो अपयश, चैत्य-वृक्ष हो तो यह आदि (भूत-प्रेत आदि की भी) की बाधा, दीमक की बॉबी तथा बिल हों तो विपत्ति, गड्डा होने पर प्यास तथा भूमि बीच से उभरी हो तो धन का विनाश होता है-
सचिवालयेऽर्थनाशो धूर्तगृहे सुतवधः समीपस्थे ।
उद्वेगो देवकुले चतुष्पथे भवति चाकीर्तिः ॥
चैत्ये भयं ग्रहकृतं वल्मीकश्वभ्रसङ्गुले विपदः ।
गर्तायां तु पिपासा कूर्माकारे धनविनाशः ॥
(बृहत्संहिता, ५२/८७-८९)
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