भूमि की आकृति
भवन-निर्माण हेतु भूमि की प्रशस्त आकृति आयताकार एवं चौकोर होती है। कहीं-कहीं चौकोर (सम-चतुरस्र) भूमि को प्रशस्त नहीं माना गया है, किन्तु आयताकार भूमि की सर्वत्र प्रशंसा की गई है। इनके अतिरिक्त भद्रासन एवं वृत्ताकार भूमि की भी प्रशंसा प्राप्त होती है-
आयते सिद्धयः सर्वाश्चतुरस्त्रे धनागमः ।
भद्रासने कृतार्थत्वं वृत्ते पुष्टिविवर्धनम् ।।
(वास्तुसौख्य)
आयताकार भूमि सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाली, चौकोर भूमि धन प्रदान करने वाली, भद्रासन भूमि अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली एवं वृत्ताकार भूमि पुष्टि (हर प्रकार की वृद्धि) प्रदान करने वाली होती है। इनके अतिरिक्त भूमि की आकृतियाँ चक्राकार, विषम-बाहु, त्रिकोण, शकटाकृति, दण्ड, पणवाकृति, मुरज, बृहन्मुख, व्यजन, कूर्मपृष्ठ, धनुषाकृति एवं सर्वाकृति होती है। ये सभी आकृतियाँ त्याज्य होती हैं। इनका दुष्परिणाम 'वास्तुसौख्य' में इस प्रकार वर्णित है-
चक्र -दारिद्र्य
विषम बाहुक -शोक
(सभी भुजायें असमान हों)
त्रिकोण- राजभय
शकट- धन का नाश
दण्ड- पशु-नाश
पणव -धन-क्षय
मुरज -पत्नी-नाश
बृहन्मुख -बन्धु-नाश
(आगे की ओर चौड़ा)
व्यजन -धन-नाश
(पंखे का आकार)
कूर्माकार -बन्धन एवं पीडा
सर्पाकार -धन-नाश
धनुषाकार -चोरी का भय
अतः कल्याण की कामना करने वाले गृहस्थ को आयताकार, चौकोर, वृत्ताकार एवं भद्रासन (आयताकार का एक भेद) भूमि का ही चयन करना चाहिये-
आयतं चतुरस्त्रन्तु वृत्तं भद्रासनं तथा ।
चत्वार्येतानि कार्याणि गृहस्थेन श्रियोऽर्थिना ।।
(वास्तुसौख्य)
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