स्वतन्त्र व्यवसाय के योग-
चन्द्र कुण्डली में शुभग्रह केन्द्र में होवें। चन्द्र गुरु व शुक्र परस्पर दूसरे और 12 भाव में। चन्द्र कुण्डली में गुरु तृतीय भाव में शुक्र लाभ भाव में। बुध राहु या शनि युत्त दृष्ट हो। बुध शनि की युति में शनि बलवान् होने पर नौकरी का धन्धा भी दिलाता है।
व्यापार के योग-
ततमेश पन भाप में। जुध तरान भाव ने धनेश के साथ जुध सारा में सराभरा धन भाव में। बुध और शुक्र धन भाव या स्प्तम भाव में शुभ दृष्ट हो। उच्चराशिस्थ बुध पर धनेश की दृष्टि। धनेश पर गुरु की दृष्टि। दशमस्थ सूर्य बुध का योग। लग्नेश दशमेश की युति दृष्टि या अन्योन्यराशि स्थिति। दशमेश केन्द्र या त्रिकोण में। शनि आत्मकारक ग्रह के नवमांश में।
कर्कराशि पर सूर्य चन्द्र या गुरु की युति या दृष्टि ज्ञातक को उदार, परोपकारी और सम्पन्न बनाती है कर्क राशि में चन्द्र गुरु का योग या इनकी दृष्टि योग्य शिक्षक व सामाजिक कार्यकर्त्ता बनाती है। दशमस्य मेष राशि में बुध या गुरु स्थित होने पर लेखक, पत्रकार व वकील बनाती है मेष राशि का शुक्र दशमस्थ विक्रय प्रतिनिधि बनाता है। दशगस्थ मेष राशि में सूर्य राजनेता लकड़ी का व्यापारी व बड़ा उद्योगपति बनाता है। वृषराशिस्थ चन्द्र दशम में कुशल संगीत वादक, दशमस्थ मिथुन राशि में बुध लेखक, मिथुन का गुरु दशम में नाटककार, मिथुन का शुक्र दशम में चन्द्र मंगल का शुक्र दशमस्थ कर्क राशि में होने पर होटल, अल्पाहार पेयपदार्थ नौकरी बर्फ या हलवाई का काम, कर्क राशि में दशमेश पाप कान्त होने पर शराब का कार्य, कन्या राशिस्थ बुध सप्तम भावस्थ दशमेश महिला वर्ग से तथा स्वयं की पत्नी से द्रव्यलाभ, विदेश से लाभएवं उदार सुखी गुणी सत्य व धर्म का पलक जातक होता है।
दशमेश अष्टमेश का योग या दृष्टि बीमा, वसीयत, जनगणना व पैतृक धंधे से लाभ देता है। वकील न्यायाधीश अनुष्ठान कर्ता, यज्ञ कर्ता, प्रवचन द्वारा धर्म का प्रचार-प्रसार दशमेश, प्रशासक, प्रबंधक, उच्चपदाधिकारी बड़ा उद्योगपति बनाता है।
दशमेश लाभ भाव में बड़ा उद्योगपति व व्यापारी बनाकर धनी मानी व सुखी बनाता है वित्तीय संस्था में कार्यकर्ता बनाकर धनी बनाता है।
किसी भी भाव के विचार में भाव, भावेश, भावात् भाव, भाव का कारक एवं भावस्थ ग्रह, इन सबका विचार कर भाव का फल विवेचन किया जाता है। इन 5 प्रकारों में लग्नादि 12 भावों के कारक का विचार हेतु लग्न का चन्द्र, सूर्य, धन भाव का गुरु, तृतीय का मंगल, चतुर्थ का चन्द्र, शनि पंचम का बुध, षष्ठ का शनि, सप्तम का शुक्र, अष्टम का शनि, नवम का बुध, गुरु, दशम का सूर्य, मंगल एकादश का गुरु, शुक्र, द्वादश का शान ग्रह कारक होता है। पिता का सूर्य माता का चन्द्र भाई का मगल, पुत्र का गुरु, रोग का शनि, स्त्री का शुक्र, आयु का शनि, हिंसा का मंगल, राज्य का सूर्य, बड़े भाई का गुरु, भोगों का शुक्र कारक होता है। भावात् भाव से तात्पर्य जैसे पंचम भाव से पंचम भाव, चतुर्थ से चतुर्थ भाव आदि का विचार करना चाहिए। उपर्युका भाप भावेशादि पर राहु शनि मंगल व सूर्य के योग या दृष्टि अशुभ फल कारक तथा शुक्र गुरु और पूर्ण चन्द्र की युति अथवा दृष्टि उस भाव को शुभ फल प्रद होती है।
स्वक्षेत्र अर्थात् ग्रह अपनी राशि में स्थित होकर शुभ ग्रहों से युत दृष्ट शुभ फल प्रद एवं पाप ग्रहों से युत दृष्ट अशुभ फल कारक हो जाता है। शुभ ग्रह अपनी राशि में स्थितहोकर केतु के साथ हो जाता है तब उस भाव में प्रबलता हो जाती है। जो भाव भावेश से युत या दृष्ट हो अथवा भावेश उच्चस्थ हो या केन्द्रगत हो तब भी उस भाव का शुभ फल होता है। यदि पाप ग्रह अपने भाव को देखता हो तो उस भाव संबंधी पदार्थों की तो वृद्धि करता है, किन्तु उस भाव से संबंधित प्राणी का विनाश करना है। पंचम भावस्थ कुंभ राशि में सूर्य स्थित होकर लाभ भाव में अपनी सिंह को देखता हो तो लाभ प्रद अवश्य होगा किन्तु लाभ भाव से बड़े भाई का भी विचार होता है अतः बड़े भाई का विनाश करता है। इसो प्रकार पाप ग्रह शनि, मंगल राहु क्षीण चन्द्र का भी विचार करना चाहिए। अर्थात वस्तु व गदार्थों का लाभ तथा उस भाव संबंधी प्राणी का विनाश करते हैं।
No comments:
Post a Comment