विभिन्न व्यवसाय विचार-
01. धनेश लाभ में और लाभेश धन भाव में होने से बहुत बड़ा व्यापारी होता है।
02. बुध का भी दशम भाव से युक्त दृष्टि होने पर व्यापार की (वाणिज्य) प्रवृत्ति होती है।
03. एल गोग में अर्थात् सम्पूर्ण राह परस्या निकोण में हो और लग्न में कोई गढ़ नहीं हो तो कृषि (खेती) का व्यवसाय होता है।
04. केदार योग अर्थात् सम्पूर्ण ग्रह 4 ही स्थानों में सम्पूर्ण ग्रह होने से निर्विघ्रता से कृषि का कार्य चलता है।
05. यदि दशमेश के साथ चन्द्र, शुक्र हो अथवा उस पर दृष्टि हो और मंगल और चतुर्थेश केन्द्र या. त्रिकोण में हो अथवा लाभ भाव में हो तो कृषि कार्य प्रधान जीवन यापन होता है।
06. शनि, बुध और शुक्र भाग्य भवन में बैठने पर भी कृषि कार्य से आजीविका चलती है।
07. चन्द्र बुध और गुरु के भाग्य भाव में रहने से शैक्षणिक जीवन व्यतीत होता है।
08. शकट योग अर्थात् सम्पूर्ण ग्रह लग्न और सप्तम भाव में स्थित होनेसे वाहन द्वारा मोटर, गाड़ी, लौरी द्वारा यातायात कार्यकर्ता बनता है।
०५. यदि चर राशि में अधिक ग्रह ही तो चलते फिरते धन्धे से स्वतन्त्र व्यवसाय, स्थिर राशि में अधिक ग्रहों से स्थायी धन्धे सरकारी नौकरी प्राचीन संस्था द्वारा अथवा चिकित्सक आदि का व्यवसाय होता है। दुकान आदि के कार्य में भी सफलता मिलती है। द्विस्वभाव राशि में अधिक ग्रह होने से अध्यापक प्रोफेसर, मास्टर, किसान गिरी नौकरी आड़तिया गुमास्ता आदि के व्यवसाय से लाभहोता है। व्यवसाय के विषय में लग्न चन्द्र लग्न से और सूर्य लग्न से यदि दशमस्थान में ग्रह स्थित हो उसमें जो बली ग्रह हो उससे आजीविका का विचार करना चाहिये। यदि तीनों के दशम स्थान में कोई ग्रह नहीं हो तो ऐसी स्थिति दशमेश के नवमांशधिप से विचार करना चाहिये।
10. सूर्य यदि दशमस्थ हो तो पैतृक सम्पत्ति से लाभ, चन्द्र के दशमस्थ से माता द्वारा, बुध से मित्र द्वारा, मंगल से शत्रु द्वारा, गुरु से भाई या चचेरे भाई से, शुक्र सेस्त्री द्वारा शनि से सेवक द्वारा धन प्राप्त होता है।
11. उपर्युक्त विचार करने पर चन्द्र लग्न सूर्य लग्न में से दशमस्थ जो ग्रह बलवान् हो या नवमांश से बली हो, उसके आधार पर यदि सूर्य दशमस्थ या स्व नवमांश का हो तो स्वर्ण ऊनी वस्त्र खनिज औषधि चिकित्सा औषधि विक्रेता जहाज आदि के व्यवसाय से लाभ होता है। चन्द्रमा दशमस्थ होकर अपने नवमांश में हो तो कृषि जलज पदार्थ वस्त्रादि की दुकान प्रदर्शनी व किसी धनी स्त्री के माध्यम से धन लाभ होता है।
12. मंगल दशमस्थ हो अथवा उसी का नवमांशेश हो तो धातु सम्बंधी क्रय विक्रय, अस्त्र शस्त्र कल पुर्जे बिजली से सम्बन्धित कार्य से अग्नि से संबंधित कार्य से जैसे इंजीनियर ओवरसियर, मिलिट्री, पुलिश विभाग, सरकास, फौजदारी विभाग वकालत आदि के व्यवसाय से लाभ होता है।
13. बुध दशमस्थ या नवमांशेश हो तो लेखक, कवि, गणितज्ञ, ज्योतिषी, पौरोहित्य व्याख्यान, चित्रकारी, शिल्पकारी के धन्धे से लाभ होता है।
14. गुरु दशमस्थ होकर स्व नवमांश में हे तो इतिहास पुराण आदि का पठन पाठन, कथावार्ता, सम्पादन का कार्य धार्मिक संस्था का निरीक्षण, धर्मोपदेशक, हाईकोर्ट या जज या मुंसिफ का कार्य करने से प्रप्य लाभ होता है।
15. शक्र दशमस्थ या नवमांश हो तो गो महिषादि के दूध, मक्खन आदि से डेयरी फार्म से जौहरी के कार्य से वाहन के सम्बंध से होटल चलाने से स्त्रियों के काम में आने वाली वस्तुओं से या किसी धनी स्त्री के सम्पर्क से लाभ होता है।
16. शनि दशमस्थ या स्व नवमांश में हो तो मजदूरी श्रमिक वर्ग के शारीरिक परिश्रम से, सरदारी से फौजदारी कोर्ट से वकालत आदि कार्य से, मुकद्दमें बाजी से और उत्तरदायित्व कार्य से सम्बन्धित धन्धों से आजीविका चलने का योग बनता है। धन्धे द्वारा लाभ कितना होगा इसका विचार ग्रह के बलाबल पर निर्भर करताहै। धन प्राप्ति का योग उत्तम है या अधम है उसके आधार पर धन की प्राप्ति होती है।
17. चन्द्र, गुरु या शुक्र पंचमस्थ होने राज सम्बंधी कार्य से लाभ होता है।
18. लग्न से दशमस्थ सूर्य को मंगल देखता हो तो राज संबंधी कार्यकर्ता होता है। सूर्य पर मंगल की दृष्टि से यह योग बनता है।
19. मूल योग (सभी ग्रह उभावों में हो) में युद्ध सम्बन्धी कार्य से लाभ होता है।
20. लग्नेश अथवा सप्तमेश तृतीय या षष्ठ भाव में पाप ग्रह हो तो सेनापति योग बनता है।
21. धनेश लग्न में चतुर्थ मे उच्च ग्रह और दशमेश 5वें अथवा लग्नेश चतुर्थेश और नवमेश परस्पर केन्द्रगत हो अथवा दशमस्थ उच्च ग्रह पर लग्नेश व नवमेश की दृष्टि हो तो अश्वारोही सेनापति का योग बनता है।
22. 4,5,6 भावों में सभी ग्रह होने से जेलर वार्डर फांसी देने वाला बनता है।
23. सभी ग्रह लगातार 7 ग्रहों के होने पर राजमन्त्री होता है।
24. शनि दशमस्थ होना उसकी दशम पर दृष्टि हो तो अनेक व्यक्तियों का अधिकारी या उत्तरदायित्व का कार्यकत्र्ता या ऐसा कार्य जिस पर लोग विश्वास करते हो ऐसे योग बनते हैं। बैरिस्टर, वकील, मोखतार के ऐसा योग पाया जाता है।
25. चतुर्थ से दशम भाव तक लगातार ग्रह होने पर मिथ्यावादी होता है। तथा जेल का निरीक्षक होता है।
26. केन्द्रस्थ चन्द्र पर गुरु या शुक्र की दृष्ट पड़ती हो तो जज, मजिस्ट्रेट, कलेक्टर, मिनिस्टर बड़े राज्य का मैनेजर आदि होता है। अथवा शनि पर राहु दशमस्थ हो उस पर नवमेश की दृष्टि हो और लग्नेश के साथ पाप ग्रह हो।
27. दशमस्थ पाप ग्रह पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो जातक, डॉक्टर, हकीम, वैद्य .
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