Saturday, June 20, 2026

पार्श्वगामिनी दृष्टि योगफल

षष्ठ व अष्टम भाव में ग्रहों की स्थिति उस भाव की हानि करते हैं, जिसके वे स्वामी होते हैं। यदि शुभग्रह षष्ठ व अष्टम भाव में होते हैं तो जिस भाव से षष्ठ व अष्टम हो, उस भाव या भावेशजन्य शुभफल प्रद होते हैं।

लग्न से षष्ठ में शुक्र और अष्टन में गुरु स्थित होने पर लग्न को अर्थात् પ્રથમ ભાવ વ્યો યલ મિલ ખાતા હૈ । શુરુ છા વ્યવ ભાવ વો વેલ્કના તથા ગુરુ ઋો ધન भाव को देखना शुभत्व प्रदान करता है। इसी प्रकार प्रत्येक भाव से षष्ठ और अष्टमस्थ शुभग्रह होने से उस भाव को शुभफल कारक होते हैं। यदि भाव से षष्ठ व अष्टम में बली पापग्रह स्थित हों तो उस भाव को तथा भावेश को जिससे षष्ठ व अष्टम हो जाते हैं, उसको हानिप्रद हो जाते हैं।

पाप कर्तरीयोग-

लग्न के द्विर्द्वादश में पाप ग्रह होने तथा किसी भाव या ग्रह के द्विर्द्वादश में पाप ग्रह होने पर पाप कर्तरी योग बनता है। जो उस भाव व ग्रह को निर्बल बना देता है। यदि द्विर्द्वादश शुभ ग्रह हो तो शुभ कर्तरी शेषफल कर्त्ता होता है।


No comments:

Post a Comment