अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग (अर्जुन का विषाद) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग
श्लोक 1:
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥
हिन्दी अर्थ: धृतराष्ट्र बोले—हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छा वाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
श्लोक 2:
संजय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥
हिन्दी अर्थ: संजय बोले—उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूह रचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।
श्लोक 3:
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥
हिन्दी अर्थ: हे आचार्य! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए।
श्लोक 4:
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥
हिन्दी अर्थ: इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद हैं।
श्लोक 5:
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥
हिन्दी अर्थ: धृष्टकेतु, चेकितान और बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज तथा मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य हैं।
श्लोक 6:
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥
हिन्दी अर्थ: पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र—ये सभी महारथी हैं।
श्लोक 7:
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥
हिन्दी अर्थ: हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ।
श्लोक 8:
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥
हिन्दी अर्थ: आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा हैं।
श्लोक 9:
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥
हिन्दी अर्थ: और भी मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वाले बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सब-के-सब युद्ध में चतुर हैं।
श्लोक 10:
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥
हिन्दी अर्थ: भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है।
श्लोक 11:
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥
हिन्दी अर्थ: इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसन्देह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें।
श्लोक 12:
तस्य सञ्जनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥
हिन्दी अर्थ: कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वर से सिंह की दहाड़ के समान गरजकर शंख बजाया।
श्लोक 13:
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तमुलोऽभवत्॥
हिन्दी अर्थ: इसके पश्चात् शंख और नगारे तथा ढोल, मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ।
श्लोक 14:
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः॥
हिन्दी अर्थ: इसके अनन्तर सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाए।
श्लोक 15:
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः॥
हिन्दी अर्थ: श्रीकृष्ण महाराज ने पाञ्चजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त नामक और भयानक कर्मवाले भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।
श्लोक 16:
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥
हिन्दी अर्थ: कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए।
श्लोक 17:
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥
हिन्दी अर्थ: श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि—
श्लोक 18:
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक्॥
हिन्दी अर्थ: राजा द्रुपद तथा द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु—इन सभी ने, हे राजन्! सब ओर से अलग-अलग शंख बजाए।
श्लोक 19:
स घोषो धार्तराष्ट्रानां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन्॥
हिन्दी अर्थ: और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों के अर्थात् आपके पक्षवालों के हृदय विदीर्ण कर दिए।
श्लोक 20:
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डुतः॥
हिन्दी अर्थ: इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को देखकर, शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर—
श्लोक 21 - 22:
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥
हिन्दी अर्थ: हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए और जब तक कि मैं युद्धक्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भलीप्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए।
श्लोक 23:
योत्साम्यरान्निषेवेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्सवः॥
हिन्दी अर्थ: दुर्बुद्ध दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा से जो-जो ये राजा लोग इस युद्ध में आए हैं, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा।
श्लोक 24:
संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥
हिन्दी अर्थ: संजय बोले—हे भारत! अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे हुए महाराज श्रीकृष्णचन्द्र ने दोनों सेनाओं के बीच में उत्तम रथ को खड़ा कर दिया।
श्लोक 25:
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पश्य पार्थैतान् समवेतान्कुरूनिति॥
हिन्दी अर्थ: भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने [श्लोक 24-25 के अनुसार] भगवान ने कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख।
श्लोक 26 - 27:
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्॥
हिन्दी अर्थ: वहाँ पार्थ ने दोनों ही सेनाओं में स्थित ताऊ-चाडों, दादाओं, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, ससुरों और सुहृदों को देखा।
श्लोक 28:
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्विमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥
हिन्दी अर्थ: उन सम्पूर्ण बन्धुओं को वहाँ डटे हुए देखकर अर्जुन अतिशय करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए बोले—
श्लोक 29:
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुः शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥
हिन्दी अर्थ: हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजन समुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है, मेरे शरीर में कंपकंपी छूट रही है और रोमांच हो रहा है।
श्लोक 30:
गाण्डीवं स्रंसते हस्तत्वाक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥
हिन्दी अर्थ: हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है। मेरा मन भ्रमित सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़े रहने को भी समर्थ नहीं हूँ।
श्लोक 31:
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥
हिन्दी अर्थ: हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ और युद्ध में स्वजन को मारकर कल्याण भी नहीं देखता हूँ।
श्लोक 32:
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
कि नो राज्येेन गोविन्द कि भोगैर्जीवितेन वा॥
हिन्दी अर्थ: हे कृष्ण! न मैं विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से क्या लाभ, भोगों से अथवा जीवन से क्या प्रयोजन है?
श्लोक 33 - 34:
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्ता धनानि च॥
आचार्याः पितॄः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः सालाः सम्बन्धिनस्तथा॥
हिन्दी अर्थ: जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुखों की इच्छा करते हैं, वे ही ये सब धन और प्राणों की आशा को छोड़कर युद्ध में खड़े हैं—गुरुजन, ताऊ, चाचा, लड़के, दादा, मामा, ससुर, पोते, साले तथा अन्य संबंधी।
श्लोक 35:
एतान् न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किनु महकृते॥
हिन्दी अर्थ: हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?
श्लोक 36:
निहत्य धार्तराष्ट्रान् का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेद् अस्मान् हत्वैतानाततायिनः॥
हिन्दी अर्थ: हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने से तो हमें पाप ही लगेगा।
श्लोक 37:
तस्मान्न अर्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥
हिन्दी अर्थ: अतः हे माधव! अपने ही बान्धवतुल्य धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना हमारे लिए उचित नहीं है। अपने ही स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं?
श्लोक 38 - 39:
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोचे च पातकम्॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्माद्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥
हिन्दी अर्थ: यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते हैं, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न पाप को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?
श्लोक 40:
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुल कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत॥
हिन्दी अर्थ: कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं और धर्म के नष्ट हो जाने पर संपूर्ण कुल को अधर्म भी दबा लेता है।
श्लोक 41:
अधर्্মাभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥
हिन्दी अर्थ: हे कृष्ण! अधर्म के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
श्लोक 42:
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥
हिन्दी अर्थ: वर्णसंकर कुल को और कुल का नाश करने वालों को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। पिंड और जल की क्रिया से विहीन हुए इनके पितर लोग भी गिर जाते हैं।
श्लोक 43:
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥
हिन्दी अर्थ: कुल का नाश करने वाले इन दोषों से वर्णसंकर पैदा करने वाले कारकों द्वारा जातियों के धर्म और कुल के सनातन धर्म नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 44:
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरके नियतं वासो भवत्यनुश्रुम श्रुतम्॥
हिन्दी अर्थ: हे जनार्दन! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है—ऐसा हमने सुना है।
श्लोक 45:
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवस्थिता वयं।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥
हिन्दी अर्थ: हा! हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने के लिए तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हुए हैं।
श्लोक 46:
यदि मामप्रतिकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रारणे हन्युस्तन्मम क्षेमतरं भवेत्॥
हिन्दी अर्थ: यदि शस्त्र हाथ में न लेने वाले और सामने प्रतिरोध न करने वाले मुझको शस्त्र लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें, तो वह मारना मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।
श्लोक 47:
संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥
हिन्दी अर्थ: संजय बोले—रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाणसहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए।
अध्याय 2: सांख्ययोग (ज्ञान योग / सांख्य दर्शन) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 2: सांख्ययोग
श्लोक 1:
संजय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥
हिन्दी अर्थ: संजय बोले—उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आंसुओं से परिपूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले, शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति मधुसूदन श्रीकृष्ण ने यह वचन कहा।
श्लोक 2:
श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनाजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे अर्जुन! इस विषम अवसर पर तुम्हारे मन में यह मोह कहाँ से आया? यह न तो श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरण किया गया है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को बढ़ाने वाला ही है।
श्लोक 3:
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त होओ, तुममें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की इस क्षुद्र दुर्बलता को छोड़कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।
श्लोक 4:
अर्जुन उवाच
कथं भिष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के साथ बाणों से कैसे युद्ध करूँगा? हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजा के योग्य हैं।
श्लोक 5:
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥
हिन्दी अर्थ: इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर इस लोक में भिक्षा का अन्न खाना भी कल्याणकारी है; क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस संसार में रुधिर से सने हुए भोगों को ही तो भोगूँगा।
श्लोक 6:
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥
हिन्दी अर्थ: हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना श्रेष्ठ है या नहीं, अथवा यह भी नहीं जानते कि हमें वे जीतेंगे या हम उन्हें जीतेंगे। जिन धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे मुकाबले में सामने खड़े हैं।
श्लोक 7:
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान् निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥
हिन्दी अर्थ: इसलिए कायरता रूपी दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला और धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित रूप से कल्याणकारक हो, वह कहिए। मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपकी शरण में आए हुए मुझको शिक्षा दीजिए।
श्लोक 8:
न हि प्रपश्यामि ममापपनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषुष्म इन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥
हिन्दी अर्थ: क्योंकि भूमि पर अजिंत और धनवान राज्य को तथा देवताओं के स्वामित्व को प्राप्त करके भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले शोक को दूर कर सके।
श्लोक 9:
संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥
हिन्दी अर्थ: संजय बोले—हे परंतप! गुडाकेश (नींद को जीतने वाले) अर्जुन ने अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज से इस प्रकार कहकर 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' और चुप हो गए।
श्लोक 10:
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! तब दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को श्रीकृष्ण महाराज ने हँसते हुए से यह वचन कहा।
श्लोक 11:
श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंच नानुशोचन्ति पण्डिताः॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—तुम न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करते हो और पंडितों जैसे वचन बोलते हो, लेकिन जिनके प्राण चले गए हैं और जिनके प्राण नहीं गए हैं, उनके लिए पंडित लोग शोक नहीं करते।
श्लोक 12:
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥
हिन्दी अर्थ: न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि हम सब इसके आगे नहीं रहेंगे।
श्लोक 13:
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिः धीरस्तत्र न मुह्यति॥
हिन्दी अर्थ: जैसे इस शरीर में जीवात्मा की कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही दूसरी देह की प्राप्ति होती है। धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता।
श्लोक 14:
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तिक्षस्व भारत॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको सहन करो।
श्लोक 15:
यं हि न व्यथयत्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥
हिन्दी अर्थ: हे पुरुषश्रेष्ठ! जिस धीर पुरुष को ये सुख और दुःख व्याकुल नहीं करते, वे दोनों में समान रहने वाले पुरुष को मोक्ष के योग्य बनाते हैं।
श्लोक 16:
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥
हिन्दी अर्थ: असत् वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत् का कभी अभाव नहीं होता। इन दोनों का ही तत्त्व ज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है।
श्लोक 17:
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥
हिन्दी अर्थ: जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उसे तू नाश रहित जान। इस अव्यय का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।
श्लोक 18:
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेस्य तस्माद् युध्यस्व भारत॥
हिन्दी अर्थ: नाशवान शरीरों वाले इस नित्य, अनाशयी और अप्रमेय शरीरधारी (आत्मा) के ये शरीर अंत वाले कहे गए हैं। इसलिए हे भारत! युद्ध कर।
श्लोक 19:
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥
हिन्दी अर्थ: जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसको मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा न तो किसी को मारता है और न किसी से मारा जाता है।
श्लोक 20:
न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरिरे॥
हिन्दी अर्थ: यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है, और न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है। यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुराना है; शरीर के मारे जाने पर भी यह मारा नहीं जाता।
श्लोक 21:
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! जो पुरुष इस आत्मा को नाश रहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष किसको मरवाता है और किसको मारता है?
श्लोक 22:
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
हिन्दी अर्थ: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को छोड़कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।
श्लोक 23:
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
हिन्दी अर्थ: इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसे आग नहीं जला सकती, इसे जल नहीं गला सकता और वायु इसे सूखा नहीं सकता।
श्लोक 24:
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥
हिन्दी अर्थ: यह आत्मा अच्छेद्य है, यह अदाह्य है, अक्लेद्य और अशोष्य ही है। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर रहने वाला, अचल और सनातन है।
श्लोक 25:
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वा नं नानुशोचितुमर्हसि॥
हिन्दी अर्थ: यह आत्मा अव्यक्त है, अचिन्त्य है और विकार रहित कहा जाता है। इसलिए इस आत्मा को ऐसा जानकर तू शोक करने योग्य नहीं है।
श्लोक 26:
अथ चैनं नित्यजाततं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥
हिन्दी अर्थ: किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला और सदा मरने वाला मानता है, तो भी हे महाबाहो! तू इसके लिए शोक करने योग्य नहीं है।
श्लोक 27:
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥
हिन्दी अर्थ: क्योंकि जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इसलिए इस अपरिहार्य विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है।
श्लोक 28:
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! सब प्राणी जन्म से पहले अप्रकट (अव्यक्त) थे, बीच में प्रकट हैं और मरने के बाद फिर अप्रकट हो जाने वाले हैं। फिर इसमें शोक करने की क्या बात है?
श्लोक 29:
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥
हिन्दी अर्थ: कोई महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है और वैसे ही दूसरा महापुरुष इसके विषय में आश्चर्य की तरह कहता है तथा दूसरा कोई इसे आश्चर्य की तरह सुनता है और सुनकर भी कोई इसे नहीं जानता।
श्लोक 30:
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! इस शरीर में रहने वाला यह आत्मा सबका वध न किए जाने योग्य है। इसलिए तू किसी भी प्राणी के लिए शोक करने योग्य नहीं है।
श्लोक 31:
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥
हिन्दी अर्थ: अपने धर्म को देखकर भी तुझे भय नहीं करना चाहिए; क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है।
श्लोक 32:
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृत्तम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं।
श्लोक 33:
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥
हिन्दी अर्थ: किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा, तो अपने धर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा।
श्लोक 34:
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणदतिरिच्यते॥
हिन्दी अर्थ: सब लोग तेरी बहुत समय तक रहने वाली अपकीर्ति का कथन करेंगे और सम्मानित मनुष्य के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी बढ़कर होती है।
श्लोक 35:
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतः भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥
हिन्दी अर्थ: बड़े-बड़े महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से भागा हुआ मानेंगे और जिन लोगों में तू बहुत सम्मानित था, वे तुझे तुच्छ मानेंगे।
श्लोक 36:
अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥
हिन्दी अर्थ: तेरे शत्रु तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए न कहने योग्य बहुत से वचन बोलेंगे। उससे अधिक दुःख और क्या होगा?
श्लोक 37:
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥
हिन्दी अर्थ: तू युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग को प्राप्त करेगा और यदि जीत गया तो पृथ्वी का भोग भोगेगा। इसलिए हे अर्जुन! युद्ध के लिएनिश्चय करके खड़ा हो जा।
श्लोक 38:
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैव पापमवाप्स्यसि॥
हिन्दी अर्थ: सुख और दुःख को, लाभ और हानि को तथा विजय और पराजय को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा; इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को प्राप्त नहीं होगा।
श्लोक 39:
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥
हिन्दी अर्थ: यह बुद्धि तेरे लिए सांख्ययोग के विषय में कही गई है और अब इसे कर्मयोग के विषय में सुन। हे पार्थ! इस बुद्धि से युक्त होकर तू कर्मों के बंधन को त्याग देगा।
श्लोक 40:
नेह अभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥
हिन्दी अर्थ: इस कर्मयोग में आरंभ का नाश नहीं होता और उलटा फल भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा सा भी साधन बड़े से बड़े भय से रक्षा कर लेता है।
श्लोक 41:
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥
हिन्दी अर्थ: हे कुरुनन्दन! इस मार्ग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है, किंतु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही अनन्त शाखाओं वाली होती हैं।
श्लोक 42 - 44:
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलै भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! जो वेदों के वचनों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम वस्तु है और जो भोग तथा ऐश्वर्य को देने वाली इस वाणी को ही सुंदर कहते हैं, उनके द्वारा कही गई इस पुष्पित (मोहक) वाणी के प्रति जिनकी बुद्धि आसक्त हो जाती है, उनकी समाधि में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं टिकती।
श्लोक 45:
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥
हिन्दी अर्थ: वेद तीनों गुणों के विषय वाले हैं। हे अर्जुन! तू तीनों गुणों से ऊपर उठ जा, द्वंद्वों से रहित, नित्य सत्वगुण में स्थित, योग-क्षेम की चिंता से मुक्त और आत्मवान बन जा।
श्लोक 46:
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥
हिन्दी अर्थ: सब ओर से परिपूर्ण बड़े जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय का मनुष्य के लिए जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों से उतना ही प्रयोजन रहता है।
श्लोक 47:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
हिन्दी अर्थ: तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और तेरी बिना कर्म किए भी आसक्ति न हो।
श्लोक 48:
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्धयसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
हिन्दी अर्थ: हे धनंजय! आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाले होकर योग में स्थित हुए कर्तव्य कर्मों को कर। समत्व भाव को ही योग कहते हैं।
श्लोक 49:
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥
हिन्दी अर्थ: हे धनंजय! समभाव रूप बुद्धि योग से सकाम कर्म अत्यंत निम्न कोटि का है। इसलिए तू बुद्धि में ही शरण खोज; फल के हेतु बनने वाले लोग कृपण (दीन) हैं।
श्लोक 50:
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥
हिन्दी अर्थ: बुद्धि से युक्त मनुष्य इस लोक में पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए तू योग में लग जा; योग ही कर्मों में कुशलता है।
श्लोक 51:
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥
हिन्दी अर्थ: बुद्धि से युक्त ज्ञानी जन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्म रूपी बंधनों से मुक्त हो जाते हैं और परम पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 52:
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥
हिन्दी अर्थ: जब तेरी बुद्धि मोह रूपी दलदल को भली प्रकार पार कर जाएगी, तब तू सुने हुए और सुनने योग्य सभी भोगों के प्रति वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा।
श्लोक 53:
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥
हिन्दी अर्थ: अनेक प्रकार के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर हो जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा।
श्लोक 54:
अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे केशव! समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य के क्या लक्षण हैं? वह स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
श्लोक 55:
श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे पार्थ! जब यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भली-भाँति त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में संतुष्ट रहता है, तब वह 'स्थितप्रज्ञ' (स्थिर बुद्धि वाला) कहा जाता है।
श्लोक 56:
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
हिन्दी अर्थ: दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में कोई उद्विग्नता नहीं होती, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा स्पृहा रहित है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, वह स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहा जाता है।
श्लोक 57:
यः सर्वत्रानభిस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष सर्वत्र स्नेह रहित होकर उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त करके न तो प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।
श्लोक 58:
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
हिन्दी अर्थ: और कछुआ जैसे अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से खींच लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
श्लोक 59:
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥
हिन्दी अर्थ: इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, किंतु उनमें रहने वाली आसक्ति (रस) निवृत्त नहीं होती। इस परब्रह्म का साक्षात्कार करके इस पुरुष की आसक्ति भी निवृत्त हो जाती है।
श्लोक 60:
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए ज्ञानी मनुष्य के मन को भी बलपूर्वक हर लेती हैं।
श्लोक 61:
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
हिन्दी अर्थ: वह पुरुष उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे; क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर होती है।
श्लोक 62:
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संलायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
हिन्दी अर्थ: विषयों का चिंतन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न आने से क्रोध उत्पन्न होता है।
श्लोक 63:
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
हिन्दी अर्थ: क्रोध से अत्यंत मूढ भाव (सम्मोह) उत्पन्न होता है, सम्मोह से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम होने से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह मनुष्य नष्ट हो जाता है।
श्लोक 64:
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानीन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधाय्यात्मा प्रसादमधिगच्छति॥
हिन्दी अर्थ: परन्तु अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरता हुआ अपने अधीन अन्तःकरण वाला मनुष्य राग और द्वेष से रहित होकर शांति को प्राप्त होता है।
श्लोक 65:
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्युतिष्ठति॥
हिन्दी अर्थ: अंतःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्न चित्त वाले मनुष्य की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर भली-भांति स्थिर हो जाती है।
श्लोक 66:
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चाययुक्तस्य भावना।
न च भावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥
हिन्दी अर्थ: न जीते हुए मन और इंद्रियों वाले पुरुष की निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और न ऐसे अयुक्त मनुष्य के अंतःकरण में भावना होती है। भावना के बिना शांति नहीं मिलती और अशांत मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?
श्लोक 67:
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥
हिन्दी अर्थ: जैसे पानी में चलने वाली नाव को वायु हवा में बहा ले जाती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिसके साथ रहता है, वह इस मन को ही उसकी बुद्धि का हरण कर लेता है।
श्लोक 68:
तस्माद् यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
हिन्दी अर्थ: इसलिए हे महाबाहो! जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ इन्द्रियों کے विषयों से सब प्रकार से वश में की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है।
श्लोक 69:
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥
हिन्दी अर्थ: जो सब भूतों के लिए रात्रि (अज्ञान) है, उसमें संयमी पुरुष जागता है और जिसमें सब भूत जागते हैं, वह तत्व को देखने वाले मुनि के लिए रात्रि है।
श्लोक 70:
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥
हिन्दी अर्थ: जैसे सब ओर से परिपूर्ण और अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में जल प्रवेश करता है, वैसे ही सब कामनाएँ जिस पुरुष में समा जाती हैं, वही मनुष्य परम शांति को प्राप्त होता है, कामनाओं को चाहने वाला नहीं।
श्लोक 71:
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममता रहित, अहंकार रहित और स्पृहा रहित होकर विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है।
श्लोक 72:
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए मनुष्य की स्थिति है। इसको प्राप्त होकर मनुष्य कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानंद को प्राप्त होता है।
अध्याय 3: कर्मयोग (कर्म का मार्ग) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 3: कर्मयोग
श्लोक 1:
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे जनार्दन! यदि आपकी मत में ज्ञान, कर्म से श्रेष्ठ है, तो हे केशव! आप मुझे इस भयानक कर्म में क्यों लगाते हैं?
श्लोक 2:
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोहमाप्नुयाम्॥
हिन्दी अर्थ: आप मिले-जुले वचनों से मेरी बुद्धिको मानो मोहित कर रहे हैं; इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए, जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो सकूँ।
श्लोक 3:
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे अनघ (पापरहित अर्जुन)! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गई है—उनमें सांख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञान से और योगियों की निष्ठा कर्म योग से होती है।
श्लोक 4:
न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥
हिन्दी अर्थ: मनुष्य न तो कर्मों को आरंभ किए बिना निष्कर्मता (कोच/सिद्धि) को प्राप्त होता है और न कर्मों के त्याग मात्र से सिद्धि को ही प्राप्त होता है।
श्लोक 5:
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥
हिन्दी अर्थ: निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता; क्योंकि प्रकृति के गुणों द्वारा विवश हुआ हर कोई मनुष्य कर्म करने के लिए बाध्य होता है।
श्लोक 6:
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥
हिन्दी अर्थ: जो मूर्ख मनुष्य समस्त इन्द्रियों को ऊपर से रोककर मन से उन विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मिथ्याचारी (दम्भी) कहा जाता है।
श्लोक 7:
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियमيارभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥
हिन्दी अर्थ: किंतु हे अर्जुन! जो मनुष्य मन द्वारा इन्द्रियों को वश में करके आसक्ति रहित होकर समस्त कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है।
श्लोक 8:
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः॥
हिन्दी अर्थ: तू नियत किए हुए कर्तव्य कर्म को कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं हो सकता।
श्लोक 9:
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥
हिन्दी अर्थ: यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त यह मनुष्य समुदाय कर्मों से बंधा हुआ है। इसलिए हे अर्जुन! तू आसक्ति से रहित होकर उसी यज्ञ के लिए भली-भांति कर्म कर।
श्लोक 10:
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्वेष कामधुक॥
हिन्दी अर्थ: प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजा को रचकर कहा कि इसके द्वारा तुम वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम्हारी सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो।
श्लोक 11:
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥
हिन्दी अर्थ: तुम इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम्हें उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त होओगे।
श्लोक 12:
इष्टान्भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदाइभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥
हिन्दी अर्थ: यज्ञ द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम्हें बिना माँगे ही इष्ट भोग निश्चित रूप से देंगे। इस प्रकार देवताओं द्वारा दिए हुए भोगों को जो मनुष्य उनको बिना दिए स्वयं भोगता है, वह चोर ही है।
श्लोक 13:
यज्ञशिष्टाशिनः संतो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा पचन्त्यात्मकारणात्॥
हिन्दी अर्थ: यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपने शरीर-पोषण के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं।
श्लोक 14:
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥
हिन्दी अर्थ: अन्न से सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होता है।
श्लोक 15:
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्म अक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥
हिन्दी अर्थ: कर्म को वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।
श्लोक 16:
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! जो मनुष्य इस लोक में इस प्रकार चलाई गई सृष्टि रूप परंपरा के अनुकूल नहीं बरतता, अर्थात् अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह पापयूरी, इन्द्रियों के परायण और व्यर्थ ही जीने वाला है।
श्लोक 17:
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥
हिन्दी अर्थ: किंतु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही संतुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।
श्लोक 18:
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥
हिन्दी अर्थ: उस महापुरुष का इस संसार में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्म न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा संपूर्ण प्राणी मात्र में उसका ऐसा कोई स्वार्थ नहीं होता।
श्लोक 19:
तस्मादसक्तः सततम् कार्यं कर्म समाचार।
असतो ह्यचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥
हिन्दी अर्थ: इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा करने योग्य कर्तव्य कर्म को भली-भांति कर; क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त होता है।
श्लोक 20:
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसङ्ग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसी॥
हिन्दी अर्थ: जनक जैसे राजा लोग भी आसक्ति रहित कर्मों द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे। इसलिए संसार के हित को देखते हुए भी तुझे कर्म करना ही उचित है।
श्लोक 21:
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
हिन्दी अर्थ: श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, दूसरे पुरुष वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लगता है।
श्लोक 22:
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! मुझे तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही वर्तता हूँ।
श्लोक 23:
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
हिन्दी अर्थ: क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न विचरूँ, तो बड़ी हानि हो जाएगी; क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
श्लोक 24:
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥
हिन्दी अर्थ: यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब लोक नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं वर्णसंकर को उत्पन्न करने वाला तथा इस प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ।
श्लोक 25:
सक्ताः कर्मण्यविद्वानो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वਾਂस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! कर्मों में आसक्त हुए अज्ञानी जन जैसे कर्म करते हैं, आसक्ति रहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ वैसे ही कर्म करे।
श्लोक 26:
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
جوषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥
हिन्दी अर्थ: विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानी जनों की बुद्धि में भ्रम पैदा न करे, अपितु स्वयं योगयुक्त होकर सब कर्मों को अच्छी प्रकार करते हुए उनसे भी वैसे ही करवाए।
श्लोक 27:
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
हिन्दी अर्थ: वास्तव में संपूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका मन अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है।
श्लोक 28:
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥
हिन्दी अर्थ: परंतु हे महाबाहो! गुण और कर्म के विभाग को जानने वाला तत्त्वज्ञानी पुरुष सम्पूर्ण गुण ही गुणों में वर्त रहे हैं—ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
श्लोक 29:
प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचचालयेत्॥
हिन्दी अर्थ: प्रकृति के गुणों से अत्यंत मोहित हुए मनुष्य गुणों और कर्मों में आसक्त रहते हैं। उन पूरी तरह न जानने वाले मंदबुद्धि लोगों को पूर्ण रूप से जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे।
श्लोक 30:
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥
हिन्दी अर्थ: मुझ अंतर्यामी परमात्मा में चित्त को लगाकर, सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके, आशारहित, ममता रहित और संताप से मुक्त हुआ तू युद्ध कर।
श्लोक 31:
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यते तेऽपि कर्मभिः॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य दोष-दृष्टि से रहित और श्रद्धा युक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी संपूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं।
श्लोक 32:
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥
हिन्दी अर्थ: परंतु जो मनुष्य मुझमें दोष-दृष्टि रखते हुए मेरे इस मत का अनुसरण नहीं करते, वे अज्ञानी पुरुष सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए को ही तू समझ।
श्लोक 33:
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥
हिन्दी अर्थ: सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार आचरण करते हैं, ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा?
श्लोक 34:
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥
हिन्दी अर्थ: इंद्रियों के अर्थ में (विषयों में) राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए; क्योंकि वे दोनों इसके कल्याण के मार्ग में बड़े शत्रु हैं।
श्लोक 35:
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
हिन्दी अर्थ: अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुणहीन भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारी है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है।
श्लोक 36:
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे वार्ष्णेय! फिर यह मनुष्य इच्छा न होने पर भी बलपूर्वक लगाए हुए की तरह किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?
श्लोक 37:
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—राजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला (कभी न तृप्त होने वाला) और बहुत पापी है। तू इसको ही इस विषय में वैरी जान।
श्लोक 38:
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥
हिन्दी अर्थ: जैसे धुएँ से अग्नि ढँक जाती है, मैल से दर्पण ढँक जाता है और गर्भ जैसे जेर से ढँका रहता है, वैसे ही इस काम द्वारा यह ज्ञान ढँका रहता है।
श्लोक 39:
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेण अनलेन च॥
हिन्दी अर्थ: और हे अर्जुन! इस ज्ञानियों के नित्य शत्रु काम रूपी कभी न भरने वाली अग्नि द्वारा ज्ञानी मनुष्य का ज्ञान ढँका हुआ है।
श्लोक 40:
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतै विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥
हिन्दी अर्थ: इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि—ये सब इसके वास स्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है।
श्लोक 41:
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥
हिन्दी अर्थ: इसलिए हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महापापी काम रूपी शत्रु को निश्चित रूप से बलपूर्वक मार डाल।
श्लोक 42:
इन्द्रियाणि पराण्यहुः इन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥
हिन्दी अर्थ: इन्द्रियों को स्थूल शरीरों से परे (श्रेष्ठ) कहते हैं, इन्द्रियों से पर मन है, मन से पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अति परे है, वह यह आत्मा है।
श्लोक 43:
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥
हिन्दी अर्थ: इस प्रकार बुद्धि से परे आत्मा को जानकर और सात्विक बुद्धि द्वारा मन को वश में करके, हे महाबाहो! तू इस काम रूपी दुर्जेय शत्रु को मार डाल।
अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान और कर्म का संन्यास) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
श्लोक 1:
श्रीभगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वाने मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य को कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र मनु से कहा और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।
श्लोक 2:
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप॥
हिन्दी अर्थ: हे परंतप अर्जुन! इस प्रकार परंपरा से प्राप्त हुए इस योग को राजर्षियों ने जाना, किंतु वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी पर नष्ट हो गया है।
श्लोक 3:
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥
हिन्दी अर्थ: वही यह पुराना योग आज मैंने तुझे कहा है, क्योंकि तू मेरा भक्त और प्यारा सखा है और यह उत्तम रहस्य भी है।
श्लोक 4:
अर्जुन उवाच
अपरो भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—आपका जन्म तो अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पहले का है, फिर मैं कैसे समझूँ कि आपने कल्प के आदि में सूर्य से यह कहा था?
श्लोक 5:
श्रीभगवानुवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किंतु मैं सबको जानता हूँ।
श्लोक 6:
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥
हिन्दी अर्थ: यद्यपि मैं अजन्मा, अविनाशी स्वरूप और समस्त प्राणियों का ईश्वर हूँ, तो भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।
श्लोक 7:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूँ (प्रकट होता हूँ)।
श्लोक 8:
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
हिन्दी अर्थ: साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
श्लोक 9:
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य (अलौकिक) हैं—जो मनुष्य इस प्रकार तत्त्व से जानता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, बल्कि मुझे ही प्राप्त होता है।
श्लोक 10:
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भभावमागताः॥
हिन्दी अर्थ: जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए हैं, जो मुझमें अनन्य प्रेम से स्थित हैं और मेरे ही आश्रय में रहने वाले हैं, ऐसे बहुत-से पुरुष ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।
श्लोक 11:
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! जो मनुष्य जिस प्रकार मेरा भजन करता है, मैं उसको वैसे ही भजता हूँ। सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
श्लोक 12:
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥
हिन्दी अर्थ: इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले देवता का पूजन करते हैं; क्योंकि मनुष्यों को कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिलती है।
श्लोक 13:
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥
हिन्दी अर्थ: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णों का समूह गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उसका रचयिता होने पर भी मुझे अविनाशी अकर्त्ता ही जान।
श्लोक 14:
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्ना स बध्यते॥
हिन्दी अर्थ: मुझे कर्म लेप नहीं करते और कर्मों के फल में मेरी स्पृहा (इच्छा) नहीं है। जो मनुष्य मुझे इस प्रकार तत्त्व से जानता है, वह कर्मों से नहीं बंधता।
श्लोक 15:
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥
हिन्दी अर्थ: पूर्वकालीन मुमुक्षु (मोक्ष चाहने वाले) पुरुषों ने भी ऐसा ही जानकर कर्म किया है। इसलिए तू भी पूर्ववर्ती पुरुषों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्तव्य कर्म को ही कर।
श्लोक 16:
किं कर्म किमकर्मति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥
हिन्दी अर्थ: कर्म क्या है और अकर्म क्या है—इस बारे में ज्ञानी पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्म तुझे अच्छी तरह समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ (संसार बंधन) से मुक्त हो जाएगा।
श्लोक 17:
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥
हिन्दी अर्थ: कर्तव्य कर्म को भी जानना चाहिए, निषेध किए गए पापकर्म को भी जानना चाहिए और अकर्म (कर्म न करने) को भी जानना चाहिए; क्योंकि कर्म की गति बड़ी गहरी है।
श्लोक 18:
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है; वह योगी और संपूर्ण कर्मों को करने वाला है।
श्लोक 19:
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तं प्रबुद्धं बुधैः विदुः॥
हिन्दी अर्थ: जिसके संपूर्ण आरंभ (कर्म) कामना और संकल्प से रहित होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञान रूप अग्नि द्वारा भस्म हो गए हैं, ऐसे पुरुष को ज्ञानी जन पंडित (बुद्धिमान) कहते हैं।
श्लोक 20:
त्यक्त्वा कर्मफलसङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष कर्मों के फल की आसक्ति को सर्वथा त्यागकर सदा संतुष्ट रहता है और किसी का भी आश्रय नहीं लेता, वह कर्मों में अच्छी प्रकार प्रवृत्त होने पर भी वास्तव में कुछ नहीं करता।
श्लोक 21:
निरासीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥
हिन्दी अर्थ: जिसका अंतःकरण जीता हुआ है, जो समस्त परिग्रहों (संग्रह) को त्याग चुका है और आशा रहित है, ऐसा शरीर मात्र को चेष्टा करने वाला पुरुष पाप को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 22:
यादृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥
हिन्दी अर्थ: जो बिना माँगे अपने-आप प्राप्त वस्तु से सदा संतुष्ट रहता है, जो हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से सर्वथा अतीत और ईर्ष्या रहित है तथा सिद्धि और असिद्धि में समान रहता है, ऐसा कर्म करता हुआ भी नहीं बंधता।
श्लोक 23:
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
यज्ञायाहरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥
हिन्दी अर्थ: जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो मुक्त हो चुका है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है और जो केवल यज्ञ के लिए कर्म करता है, उसके संपूर्ण कर्म भली-भांति विलीन हो जाते हैं।
श्लोक 24:
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
हिन्दी अर्थ: यज्ञ में अर्पण (कड़छी आदि) ब्रह्म है, हवन करने योग्य हवि भी ब्रह्म है, ब्रह्म रूप अग्नि द्वारा ब्रह्म रूप कर्ता द्वारा ही आहुति दी गई है। उस ब्रह्म रूप कर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त करने योग्य भी ब्रह्म ही है।
श्लोक 25:
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
ब्रह्मानेवापरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥
हिन्दी अर्थ: दूसरे योगी जन देवताओं के पूजन रूप यज्ञ की ही भली-भांति उपासना करते हैं और अन्य ज्ञानी जन परब्रह्म परमात्मा रूप अग्नि में अभेद दर्शन रूप यज्ञ द्वारा ही आत्म-स्वरूप यज्ञ का हवन करते हैं।
श्लोक 26:
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्ये इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥
हिन्दी अर्थ: अन्य योगी जन श्रोत्र आदि समस्त इंद्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन करते हैं तथा दूसरे लोग शब्द आदि समस्त विषयों को इंद्रियों रूप अग्नियों में हवन करते हैं।
श्लोक 27:
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥
हिन्दी अर्थ: अन्य योगी जन इंद्रियों के संपूर्ण कर्मों को और प्राणों के संपूर्ण कर्मों को ज्ञान से प्रज्वलित आत्मसंयम रूप योग अग्नि में हवन करते हैं।
श्लोक 28:
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥
हिन्दी अर्थ: कई मनुष्य द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले हैं, कई तप रूप यज्ञ वाले हैं, कई योग रूप यज्ञ वाले हैं और तीखे व्रतों वाले ज्ञानी मनुष्य स्वाध्याय और ज्ञान रूप यज्ञ करने वाले हैं।
श्लोक 29:
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥
हिन्दी अर्थ: दूसरे योगी जन अपान में प्राण का हवन करते हैं और वैसे ही प्राण में अपान का हवन करते हैं। तथा प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणायाम के परायण होते हैं।
श्लोक 30:
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदः यज्ञक्षपितकल्मषाः॥
हिन्दी अर्थ: अन्य जो नियमित आहार करने वाले हैं, वे प्राणों को प्राणों में ही हवन करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले और यज्ञ द्वारा पापों को नष्ट कर चुके होते हैं।
श्लोक 31:
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥
हिन्दी अर्थ: यज्ञ के परिणाम स्वरूप बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करने वाले मनुष्य के लिए यह लोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है? हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन!
श्लोक 32:
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजं विद्धि ताान्सर्वान्चैव ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥
हिन्दी अर्थ: इस प्रकार वेदों की वाणी में कई प्रकार के यज्ञ विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको तू कर्म से उत्पन्न हुआ जान। ऐसा जानकर तू कर्म बंधन से मुक्त हो जाएगा।
श्लोक 33:
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥
हिन्दी अर्थ: हे परंतप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान यज्ञ सर्वथा श्रेष्ठ है। हे पार्थ! संपूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त (पूर्ण) हो जाते हैं।
श्लोक 34:
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
हिन्दी अर्थ: उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ; उनको दण्डवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरल भाव से प्रश्न करने से वे तत्त्वज्ञानी महात्मा तुझे उस ज्ञान का उपदेश करेंगे।
श्लोक 35:
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥
हिन्दी अर्थ: जिसे जानकर हे पाण्डव अर्जुन! तू फिर ऐसे मोह को प्राप्त नहीं होगा और जिस ज्ञान के द्वारा तू संपूर्ण प्राणियों को पहिले अपने में और तब मुझ सच्चिदानंदघन परमात्मा में देखेगा।
श्लोक 36:
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि॥
हिन्दी अर्थ: यदि तू संसार भर के समस्त पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञान रूप नौका द्वारा निश्चित रूप से संपूर्ण पाप-समुद्र को अच्छी तरह पार कर जाएगा।
श्लोक 37:
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानावग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥
हिन्दी अर्थ: जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन (लकड़ियों) को भस्म कर देता है, हे अर्जुन! वैसे ही ज्ञान रूप अग्नि संपूर्ण कर्मों को भस्म कर देती है।
श्लोक 38:
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥
हिन्दी अर्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को जो मनुष्य योग के द्वारा सिद्ध हो चुका है, वह अपने-आप ही काल पाकर आत्मा में पा लेता है।
श्लोक 39:
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
हिन्दी अर्थ: जो श्रद्धा से युक्त है, जो अपनी इंद्रियों को वश میں किए हुए है और जो ज्ञान की प्राप्ति में तत्पर है, वह मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है और ज्ञान को प्राप्त होकर तत्काल ही परम शांति को प्राप्त होता है।
श्लोक 40:
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥
हिन्दी अर्थ: विवेकहीन, श्रद्धा रहित और संशययुक्त मनुष्य का पतन हो जाता है। संशययुक्त आत्मा वाले मनुष्य के लिए न तो यह लोक है, न परलोक है और न कोई सुख ही है।
श्लोक 41:
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मानं बद्धं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय॥
हिन्दी अर्थ: हे धनंजय! जिसने योग के द्वारा समस्त कर्मों का त्याग कर दिया है और ज्ञान के द्वारा जिसके सारे संशय छिन्न-भिन्न हो गए हैं, ऐसे आत्मवान पुरुष को कर्म नहीं बाँधते।
श्लोक 42:
तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥
हिन्दी अर्थ: इसलिए हे भारत! हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न हुए इस अपने संशय को ज्ञान रूपी तलवार से काटकर योग में स्थित हो जा और युद्ध के लिए खड़ा हो जा।
अध्याय 5: कर्मसंन्यासयोग (कर्म का संन्यास) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 5: कर्मसंन्यासयोग
श्लोक 1:
अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनর্যोगं च शंससि।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। इसलिए इन दोनों में से जो एक साधन मेरे लिए निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, उसे बताइए।
श्लोक 2:
श्रीभगवानुवाच
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—कर्मों का संन्यास और कर्मयोग—ये दोनों ही परम कल्याण को देने वाले हैं। परंतु उन दोनों में भी कर्मों के संन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने के कारण श्रेष्ठ है।
श्लोक 3:
ज्ञेयः स नित्यसंवासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥
हिन्दी अर्थ: हे महाबाहो! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है; क्योंकि राग-द्वेष आदि द्वंद्वों से रहित पुरुष संसार के बंधन से आसानी से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 4:
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥
हिन्दी अर्थ: नासमझ लोग ही ऐसा कहते हैं कि सांख्य योग (ज्ञानयोग) और कर्मयोग अलग-अलग फल देने वाले हैं, पंडित लोग ऐसा नहीं कहते। इन दोनों में से एक में भी अच्छी प्रकार स्थित हुआ पुरुष दोनों के फल को प्राप्त होता है।
श्लोक 5:
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥
हिन्दी अर्थ: ज्ञानयोगियों द्वारा जो स्थान प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही स्थान प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फल रूप में एक देखता है, वही वास्तविक यथार्थ देखता है।
श्लोक 6:
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म चिरेणाधिगच्छति॥
हिन्दी अर्थ: परंतु हे महाबाहो! कर्मयोग के बिना संन्यास (कर्मों का स्वरूप से त्याग) प्राप्त होना कठिन है। भगवत्स्वरूप में मन को लगाने वाला योगयुक्त मुनि ब्रह्म को शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 7:
योगयुक्तो विशुद्धात्मा जितात्मा जितेन्द्रियः।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥
हिन्दी अर्थ: जिसका मन अपने वश में है, जो जीता हुआ अंतःकरण वाला और जीती हुई इंद्रियों वाला है, जो संपूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता।
श्लोक 8 - 9:
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रनश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥
हिन्दी अर्थ: तत्व को जानने वाला योगयुक्त पुरुष देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और बंद करता हुआ भी अपने मन में ऐसा समझे कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ; इंद्रियाँ ही अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं।
श्लोक 10:
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष संपूर्ण कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पाप से वैसे ही लिप्त नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता जल से लिप्त नहीं होता।
श्लोक 11:
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥
हिन्दी अर्थ: योगी जन केवल शरीर से, मन से, बुद्धि से और इंद्रियों द्वारा भी आसक्ति को त्यागकर अंतःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।
श्लोक 12:
युक्तः कर्मफलम् त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो बध्यते॥
हिन्दी अर्थ: कर्मयोगी पुरुष कर्मों के फल को त्यागकर भगवत्प्राप्ति रूप शांति को प्राप्त होता है और सकाम पुरुष कामना के प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बँध जाता है।
श्लोक 13:
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥
हिन्दी अर्थ: अंतःकरण को वश में रखने वाला यह देही पुरुष संपूर्ण कर्मों को मन से त्यागकर, न तो कुछ करता हुआ और न किसी से कुछ करवाता हुआ नौ द्वारों वाले इस शरीर रूपी घर में आनंदपूर्वक रहता है।
श्लोक 14:
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥
हिन्दी अर्थ: परमेश्वर मनुष्य के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न ही कर्मों के फल के संयोग की रचना करते हैं, बल्कि स्वभाव ही प्रवृत्त होता है।
श्लोक 15:
नादत्ते कस्याचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥
हिन्दी अर्थ: परमेश्वर न तो किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभ कर्म को ही ग्रहण करते हैं, किंतु अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, जिससे सब जीव मोहित हो रहे हैं।
श्लोक 16:
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥
हिन्दी अर्थ: किंतु जिनका वह अज्ञान आत्मा के ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के समान उस सच्चिदानंदघन परमात्मा को प्रकट कर देता है।
श्लोक 17:
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥
हिन्दी अर्थ: जिनका मन उसी परमात्मा में लग रहा है, जिनकी बुद्धि उसी में स्वरूप स्थित है और जिनका परम प्रेम उसी परमात्मा में है, ऐसे ज्ञान द्वारा जिनके पाप नष्ट हो चुके हैं, वे पुरुष अपुनरावृत्ति (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 18:
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥
हिन्दी अर्थ: ज्ञानी जन विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में तथा कुत्ते और चांडाल में भी समदर्शी (सबको समान देखने वाले) होते हैं।
श्लोक 19:
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्यं स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥
हिन्दी अर्थ: जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही संपूर्ण संसार जीत लिया गया है; क्योंकि सच्चिदानंदघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इसलिए वे पुरुष परमात्मा में ही स्थित हैं।
श्लोक 20:
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष प्रिय वस्तु को पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रप्रिय को पाकर उद्विग्न नहीं होता, वह स्थिर बुद्धि वाला, संशय रहित और ब्रह्म को जानने वाला पुरुष परब्रह्म परमात्मा में नित्य स्थित रहता है।
श्लोक 21:
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥
हिन्दी अर्थ: बाहर के विषयों में आसक्ति रहित अंतःकरण वाला पुरुष अंतःकरण में जो सुख है, उसको प्राप्त होता है। वह पुरुष ब्रह्म के ध्यान रूप योग में युक्त हुआ अक्षय आनंद का अनुभव करता है।
श्लोक 22:
ये हि संस्पर्शजा भोगो दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥
हिन्दी अर्थ: जो ये इंद्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले भोग हैं, वे यद्यपि विषयों के सुख रूप भासते हैं, तथापि दुःख के ही कारण हैं और आदि-अंत वाले (नाशवान) हैं। इसलिए हे अर्जुन! बुद्धिमान पुरुष उनमें रमण नहीं करता।
श्लोक 23:
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखीजनः॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य इस शरीर के छूटने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष इस लोक में योगी और सुखी है।
श्लोक 24:
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष अंतःकरण में ही सुख वाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है और जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह शांत स्वभाव योगी ब्रह्म को प्राप्त होकर शांत ब्रह्म (मोक्ष) को प्राप्त होता है।
श्लोक 25:
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥
हिन्दी अर्थ: जिनके पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके संशय ज्ञान द्वारा छिन्न-भिन्न हो गए हैं, जो जीते हुए मन वाले और संपूर्ण प्राणियों के हित में लगे हुए हैं, वे ऋषि शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 26:
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥
हिन्दी अर्थ: काम और क्रोध से रहित, जीते हुए चित्त वाले और परमात्मा को भली-भांति जानने वाले संन्यासी पुरुषों के लिए सब ओर से शांत ब्रह्म परिपूर्ण है।
श्लोक 27 - 28:
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्याञ्जुक्षुश्चैवांतरे भ्रुवोः।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥
हिन्दी अर्थ: बाहर के विषय-भोगों को बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को दोनों भृकुटियों के बीच में टिकाकर तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को अंदर रोककर सम करने वाला, जो पुरुष इंद्रियों, मन और बुद्धि को वश में किए हुए है, ऐसा जो मोक्ष परायण मुनि इच्छा, भय और क्रोध से सर्वथा रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है।
श्लोक 29:
भोक्तारं यज्ञतपासां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥
हिन्दी अर्थ: मेरा वह भक्त यज्ञ और तपों के भोगने वाले को, संपूर्ण लोकों के महेश्वर को और संपूर्ण प्राणियों के सुहृद (मित्र) को इस प्रकार तत्त्व से जानकर शांति को प्राप्त होता है।
अध्याय 6: ध्यानयोग (ध्यान का मार्ग / आत्मसंयम योग) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 6: ध्यानयोग
श्लोक 1:
श्रीभगवानुवाच
अनाशः कर्मफलणं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्तव्य कर्म करता है, वही संन्यासी है और वही योगी है; न तो केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी है और न क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी है।
श्लोक 2:
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥
हिन्दी अर्थ: हे पाण्डव अर्जुन! जिसे संन्यास कहते हैं, उसी को तू योग जान; क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी मनुष्य योगी नहीं होता।
श्लोक 3:
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगरूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥
हिन्दी अर्थ: योग पर चढ़ने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए कर्म ही कारण कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उसी पुरुष के लिए शम (मन की शांति) ही कारण कही जाती है।
श्लोक 4:
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगरूढस्तदोच्यते॥
हिन्दी अर्थ: जिस समय न तो इंद्रियों के विषयों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, वह पुरुष संपूर्ण संकल्पों का त्यागी 'योगारूढ़' कहा जाता है।
श्लोक 5:
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
हिन्दी अर्थ: मनुष्य को चाहिए कि वह अपने द्वारा अपना उद्धार करे और अपने को नीचे न गिराए; क्योंकि यह मन ही तो अपना बंधु (मित्र) है और यह मन ही अपना शत्रु है।
श्लोक 6:
बन्धुरात्मआत्मानस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य द्वारा अपना मन जीत लिया गया है, उसका मन ही उसका बंधु है और जिसके द्वारा मन नहीं जीता गया है, उसका वह शत्रु के समान शत्रुता में वर्तता है।
श्लोक 7:
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥
हिन्दी अर्थ: जीते हुए मन वाले और शांत पुरुष के अंतःकरण में परमात्मा पूरी तरह शांत भाव से स्थित है, जिसके लिए सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख तथा मान और अपमान एक समान हैं।
श्लोक 8:
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूूटस्थो विजितेंद्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः॥
हिन्दी अर्थ: जिसका अंतःकरण ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो विकार रहित और जीती हुई इंद्रियों वाला है तथा जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण समान हैं, वह योगी 'युक्त' कहा जाता है।
श्लोक 9:
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यमध्यस्थेषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिविशिष्यते॥
हिन्दी अर्थ: जो सुहृद (निःस्वार्थ मित्र), मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी और बंधुगणों में तथा धर्मात्माओं और पापियों में भी समान बुद्धि रखता है, वह विशेष श्रेष्ठ है।
श्लोक 10:
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥
हिन्दी अर्थ: मन और शरीर को वश में रखने वाला, आशा रहित और संग्रह से मुक्त योगी अकेला एकांत स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगाए।
श्लोक 11 - 12:
शुचाउ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्जीयाद्योगमात्मशुद्धये॥
हिन्दी अर्थ: पवित्र स्थान में, जिसकी जमीन पर कुश, उसके ऊपर मृगचर्म और उसके ऊपर वस्त्र बिछा हुआ है, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा है—अपने ऐसे स्थिर आसन को स्थापित करके, उस आसन पर बैठकर, चित्त और इंद्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, मन को एकाग्र करके अंतःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
श्लोक 13 - 14:
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलो स्थिरः।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानुपोलयन्॥
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिणि व्रते।
मनः संयम्य मच्चित्तः युक्त आसीत मत्परः॥
हिन्दी अर्थ: शरीर, सिर और गर्दन को समान तथा अचल धारण करके, स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर और अन्य दिशाओं को न देखता हुआ—शांत अंतःकरण वाला, भय रहित, ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, मन को अच्छी प्रकार वश में करके मुझमें चित्त वाला और मेरे परायण होकर आसन पर बैठे।
श्लोक 15:
युञ्जन्नेव सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥
हिन्दी अर्थ: मन को वश में रखने वाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरंतर मुझमें लगाता हुआ मेरे में रहने वाली परम शांति को प्राप्त होता है।
श्लोक 16:
नात्यशनतस्तु योगोऽस्ति न च एकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का सिद्ध होता है और न सर्वथा न खाने वाले का, तथा न बहुत सोने वाले का ही सिद्ध होता है और न बहुत जागने वाले का ही।
श्लोक 17:
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
हिन्दी अर्थ: दुखों को नष्ट करने वाला यह योग तो यथासङ्ग आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
श्लोक 18:
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवातितिष्ठति।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥
हिन्दी अर्थ: जब अच्छी प्रकार वश में किया हुआ चित्त आत्मा में ही स्थिर हो जाता है, तब वह पुरुष संपूर्ण कामनाओं से रहित होकर 'योगयुक्त' कहा जाता है।
श्लोक 19:
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥
हिन्दी अर्थ: जिस प्रकार वायु रहित स्थान में रखा हुआ दीपक चलित नहीं होता, वैसी ही उपमा योग में लगे हुए जीते हुए चित्त वाले योगी के चित्त की कही गई है।
श्लोक 20 - 23:
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्॥
हिन्दी अर्थ: योग के अभ्यास से निरुद्ध (वशीभूत) हुआ चित्त जिस अवस्था में शांत हो जाता है और जिस अवस्था में चित्त द्वारा आत्मा को देखता हुआ आत्मा में ही संतुष्ट रहता है; इंद्रियों से अतीत, केवल बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनंत आनंद है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है और तत्त्व से विचलित नहीं होता; जिस लाभ को प्राप्त करके उससे अधिक दूसरा कोई लाभ नहीं मानता और जिस अवस्था में स्थित हुआ बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता—दुखों के संयोग से रहित उस अवस्था का नाम 'योग' है।
श्लोक 24:
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः॥
हिन्दी अर्थ: संकल्प से उत्पन्न होने वाली संपूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से त्यागकर और मन द्वारा इंद्रियों के समुदाय को सब ओर से अच्छी प्रकार रोककर, उस योग को धैर्य और बिना खिन्न हुए चित्त से निश्चयपूर्वक करना चाहिए।
श्लोक 25:
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिᱫपि चिन्तयेत्॥
हिन्दी अर्थ: धैर्य से युक्त बुद्धि द्वारा धीरे-धीरे अभ्यास करते-करते उपराम हो जाए और मन को आत्मा में स्थित करके अन्य किसी वस्तु का चिंतन न करे।
श्लोक 26:
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥
हिन्दी अर्थ: यह चंचल और स्थिर न रहने वाला मन जिस-जिस कारण से संसार में विचरता है, उस-उस कारण से इसे रोककर बार-बार आत्मा के ही वश में करे।
श्लोक 27:
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥
हिन्दी अर्थ: क्योंकि जिसका मन अच्छी प्रकार शांत है, जो पाप रहित है, जिसका रजोगुण शांत हो चुका है और जो ब्रह्मस्वरूप हो गया है, ऐसे इस उत्तम योगी को उत्तम आनंद प्राप्त होता है।
श्लोक 28:
युञ्जन्नेव सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तमश्नुते॥
हिन्दी अर्थ: पाप रहित योगी निरंतर इस प्रकार आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ आसानी से परब्रह्म के स्पर्श रूप अनंत आनंद को अनुभव करता है।
श्लोक 29:
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥
हिन्दी अर्थ: योग मेंयुक्त हुआ और सब जगह समभाव देखने वाला योगी आत्मा को संपूर्ण भूतों में स्थित और संपूर्ण भूतों को आत्मा में देखता है।
श्लोक 30:
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष संपूर्ण भूतों में मुझे देखता है और सब भूतों को मुझमें देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता।
श्लोक 31:
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष एकत्व भाव में स्थित होकर संपूर्ण भूतों में स्थित मुझ परमात्मा को भजता है, वह सब प्रकार से वर्तमान होने पर भी मुझमें ही वर्तता है।
श्लोक 32:
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति संपूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सब जगह समान देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।
श्लोक 33:
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येेन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे मधुसूदन! जो योग आपने समभाव से कहा है, मन के चंचल होने के कारण मैं उसकी स्थिर स्थिति को नहीं देखता हूँ।
श्लोक 34:
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरे सुदुष्करम्॥
हिन्दी अर्थ: क्योंकि हे कृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बलवान और दृढ़ है। इसलिए उसका वश में करना मैं वायु को रोकने के समान अत्यंत कठिन मानता हूँ।
श्लोक 35:
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, किंतु हे अर्जुन! यह अभ्यास से और वैराग्य से वश में होता है।
श्लोक 36:
असंयतत्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥
हिन्दी अर्थ: जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है—ऐसा मेरा मत है, किंतु वश में किए हुए मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से वह प्राप्त होना शक्य है।
श्लोक 37:
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे कृष्ण! जो योगाभ्यास में श्रद्धा रखता है, किंतु संयमी नहीं है, जिसका मन योग से विचलित हो गया है, ऐसा बढ़ा हुआ मनुष्य योग की सिद्धि को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है?
श्लोक 38:
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥
हिन्दी अर्थ: हे महाबाहो! क्या वह ब्रह्म के मार्ग से विमूढ और आश्रयहीन मनुष्य, कटे हुए बादल की तरह दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?
श्लोक 39:
एतन्मे संशयः कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥
हिन्दी अर्थ: हे कृष्ण! मेरे इस संशय को आप पूरी तरह से दूर करने के योग्य हैं; क्योंकि आपके सिवाय इस संशय को दूर करने वाला दूसरा कोई मिलना संभव नहीं है।
श्लोक 40:
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही; क्योंकि हे तात! कल्याणकारी कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 41:
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानोष्विताः शाश्वतीः समाः।
शुचिनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥
हिन्दी अर्थ: योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त करके और उनमें अनन्त काल तक निवास करके, फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमानों के घर में जन्म लेता है।
श्लोक 42:
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥
हिन्दी अर्थ: अथवा वह योगियों के ही कुल में उत्पन्न होता है, जो कि इस संसार में ऐसा जन्म पाना अत्यंत दुर्लभ है।
श्लोक 43:
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदैहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥
हिन्दी अर्थ: वहाँ उस पूर्व शरीर के संबंध से युक्त बुद्धि को वह पा जाता है और हे कुरुनन्दन! इसके बाद वह फिर से परम सिद्धि के लिए पहले से बढ़कर प्रयत्न करता है।
श्लोक 44:
पूर्वाभ्यासैन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्म अतिवर्तते॥
हिन्दी अर्थ: वह पूर्व के अभ्यास से ही निःसंदेह परवश हुआ भी अपनी ओर खींचा जाता है। योग का जिज्ञासा करने वाला भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों से ऊपर उठ जाता है।
श्लोक 45:
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुल्किल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥
हिन्दी अर्थ: परंतु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करता हुआ योगी पिछले सब पापों से पूरी तरह शुद्ध होकर अनेक जन्मों में सिद्ध हो जाता है और तब परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 46:
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मभ्यश्च अधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥
हिन्दी अर्थ: योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञ ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन! तू योगी हो जा।
श्लोक 47:
योगिनामपि सर्वेषां मद्यान्तेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥
हिन्दी अर्थ: संपूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान पुरुष मुझमें लगे हुए आंतरिक मन से मेरा निरंतर भजन करता है, वह योगी मुझे सबसे अधिक श्रेष्ठ मान्य है।
अध्याय 7: ज्ञानविज्ञानयोग (ज्ञान और विज्ञान का योग) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 7: ज्ञानविज्ञानयोग
श्लोक 1:
श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्மदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे पार्थ! मुझमें मन को आसक्त करके, मेरे शरण में रहकर और योग का अभ्यास करते हुए तू जिस प्रकार संपूर्ण रूप से मुझको जानेगा, उसे सुन।
श्लोक 2:
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥
हिन्दी अर्थ: मैं तेरे लिए इस विज्ञान सहित ज्ञान को पूरी तरह से कहूँगा, जिसे जानकर इस संसार में फिर दूसरा कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रहता।
श्लोक 3:
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥
हिन्दी अर्थ: हज़ारों मनुष्यों में कोई एक ही सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक ही मुझको तत्त्व से जानता है।
श्लोक 4:
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥
हिन्दी अर्थ: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—ये आठ प्रकार से मेरी कल्पित की हुई अपरा (जड़) प्रकृति है।
श्लोक 5:
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूता महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥
हिन्दी अर्थ: हे महाबाहो! इससे दूसरी को मेरी परा (चेतन) प्रकृति जान, जो कि जीव रूप है और जिसके द्वारा यह संपूर्ण जगत धारण किया जाता है।
श्लोक 6:
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्नस जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥
हिन्दी अर्थ: तू ऐसा समझ कि संपूर्ण भूत (प्राणी) इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होने वाले हैं और मैं संपूर्ण जगत का प्रभव (उत्पत्ति का कारण) तथा प्रलय (नाश का कारण) हूँ।
श्लोक 7:
मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगण इव॥
हिन्दी अर्थ: हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ दूसरी कोई भी वस्तु नहीं है। यह संपूर्ण जगत सूबे में मणियों के धागे की तरह मुझमें ही पिरोया हुआ है।
श्लोक 8:
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चंद्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, संपूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ।
श्लोक 9:
புண்யோ गंधः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥
हिन्दी अर्थ: मैं पृथ्वी में पवित्र गंध और अग्नि में तेज हूँ, तथा संपूर्ण प्राणियों में जीवन और तपस्वियों में तप हूँ।
श्लोक 10:
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! तू संपूर्ण प्राणियों का सनातन बीज (कारण) मुझे ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।
श्लोक 11:
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥
हिन्दी अर्थ: हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति और काम से रहित बल हूँ और प्राणियों में धर्म के अनुकूल काम (कामना) हूँ।
श्लोक 12:
యే చైवा सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एव इत्येतान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥
हिन्दी अर्थ: और जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, उन सबको तू मेरे से ही उत्पन्न हुए जान, किंतु वास्तव में उनमें मैं नहीं हूँ और वे मुझमें नहीं हैं।
श्लोक 13:
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥
हिन्दी अर्थ: गुणों के कार्य रूप इन तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) के भावों से यह सारा संसार मोहित हो रहा है, इसलिए इन गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता।
श्लोक 14:
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुर्दत्यया।
मामेव ये प्रपद्यते मायामेतां तरन्ति ते॥
हिन्दी अर्थ: मेरी यह दैवी और गुणों से युक्त माया बड़ी कठिनता से पार करने योग्य है। जो पुरुष केवल मुझको ही भजते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।
श्लोक 15:
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यंते नराधमाः।
मायापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥
हिन्दी अर्थ: माया के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुरी स्वभाव को धारण करने वाले, मनुष्यों में नीच और पापी मूर्ख लोग मुझको नहीं भजते।
श्लोक 16:
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आतो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥
हिन्दी अर्थ: हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करने वाले आर्त (दुःखी), जिज्ञासु (ज्ञान को चाहने वाला), अर्थार्थी (धन चाहने वाला) और ज्ञानी—ये चार प्रकार के भक्त जन मुझको भजते हैं।
श्लोक 17:
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥
हिन्दी अर्थ: उनमें से नित्ययुक्त (सदा मुझमें जुड़ा हुआ) और एकीभक्ति वाला ज्ञानी भक्त सबसे श्रेष्ठ है; क्योंकि ज्ञानी को मैं अतिशय प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अतिशय प्रिय है।
श्लोक 18:
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थिताः स हि युक्तात्मा मामेवागमां गताम्॥
हिन्दी अर्थ: ये सभी भक्त उदार हैं, किंतु ज्ञानी तो मेरा साक्षात् स्वरूप ही है—ऐसा मेरा मत है; क्योंकि वह मतिमान भक्त मुझ उत्तम गति स्वरूप परमात्मा में ही अच्छी प्रकार स्थित है।
श्लोक 19:
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
हिन्दी अर्थ: बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्त्वज्ञान को प्राप्त हुआ ज्ञानी पुरुष 'सब कुछ वासुदेव (परमात्मा) ही है'—इस प्रकार मुझको भजता है। ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।
श्लोक 20:
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥
हिन्दी अर्थ: जिनकी कामनाओं द्वारा ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव के अनुसार प्रेरित होकर उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं।
श्लोक 21:
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाहम्यहम्॥
हिन्दी अर्थ: जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, मैं उसी भक्त की श्रद्धा को उस देवता के प्रति स्थिर करता हूँ।
श्लोक 22:
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥
हिन्दी अर्थ: वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से अपनी कामनाओं को प्राप्त करता है, परंतु वे वास्तविक रूप से मेरे द्वारा ही विधान किए गए होते हैं।
श्लोक 23:
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥
हिन्दी अर्थ: वे अल्पबुद्धि वाले लोग उन देवताओं को पूजते हैं, जिनका फल नाशवान होता है। देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं।
श्लोक 24:
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥
हिन्दी अर्थ: बुद्धिहीन मनुष्य मेरे अनुत्तम, अविनाशी और परम भाव को न जानते हुए, इंद्रियों से परे मुझ अप्रकट (अव्यक्त) परमात्मा को मनुष्य रूप में प्रकट हुआ मानते हैं।
श्लोक 25:
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥
हिन्दी अर्थ: अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता। इसलिए यह अज्ञानी मनुष्य समुदाय मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता।
श्लोक 26:
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! मैं बीते हुए और वर्तमान के तथा आगे होने वाले सभी प्राणियों को जानता हूँ, किंतु मुझको कोई भी नहीं जानता।
श्लोक 27:
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परंतप॥
हिन्दी अर्थ: हे परंतप अर्जुन! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न होने वाले सुख-दुःख आदि द्वंद्व रूप मोह से संपूर्ण प्राणी अत्यंत अज्ञान को प्राप्त हो रहे हैं।
श्लोक 28:
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वंद्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥
हिन्दी अर्थ: परंतु जिन निष्काम पुण्यकर्म वाले मनुष्यों का पाप नष्ट हो चुका है, वे द्वंद्व रूप मोह से मुक्त हुए दृढ़व्रती भक्त मुझको भजते हैं।
श्लोक 29:
जरामुक्तये मामश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥
हिन्दी अर्थ: जो मेरे आश्रय में रहकर जरा (बुढ़ापे) और मृत्यु से छूटने के लिए प्रयत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, संपूर्ण अध्यात्म को और संपूर्ण कर्म को जानते हैं।
श्लोक 30:
साधिभूताधिदैवं मां साधिযজ্ঞं च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्यक्तचेतसः॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ सहित मुझको जानते हैं, वे युक्त चित्त वाले पुरुष अंत समय में भी मुझको जानते हैं।
अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग (अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग
श्लोक 1:
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है, कर्म क्या है, अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसे कहते हैं?
श्लोक 2:
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥
हिन्दी अर्थ: हे मधुसूदन! इस शरीर में अधियज्ञ कौन है और वह कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं?
श्लोक 3:
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—परम अक्षर ब्रह्म है, अपना स्वरूप अर्थात् जीवात्मा 'अध्यात्म' कहा जाता है और प्राणियों के उत्पन्न होने तथा बढ़ने वाला त्याग रूप यज्ञ 'कर्म' नाम से कहा गया है।
श्लोक 4:
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥
हिन्दी अर्थ: उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुएँ 'अधिभूत' हैं, हिरण्मय पुरुष (ब्रह्मा) 'अधिदैवत' है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीर में मैं 'अदियज्ञ' रूप से स्थित हूँ।
श्लोक 5:
अंतकाले च मामേવ स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भभावं याति नास्त्यत्र संशयः॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष अंत समय में भी मेरा ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होता है—इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक 6:
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! यह मनुष्य अंत समय में जिस-जिस भी भाव का स्मरण करता हुआ शरीर को छोड़ता है, वह उस-उसको ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहता है।
श्लोक 7:
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर् मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
हिन्दी अर्थ: इसलिए तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मुझमें मन और बुद्धि को अर्पण किया हुआ तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा।
श्लोक 8:
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! अभ्यास रूप योग से युक्त और दूसरी और न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशस्वरूप दिव्य पुरुष को ही प्राप्त होता है।
श्लोक 9 - 10:
कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥
प्रयाणकाले मनसा अचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रूवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंता, सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके रचनहार, अचिन्त्य स्वरूप, सूर्य के समान प्रकाशमान और अंधकार से परे रहने वाले परम ईश्वर का स्मरण करता है; और अंत समय में भक्ति युक्त होकर योग बल से प्राणों को दोनों भौंहों के बीच में अच्छी प्रकार स्थापित करके स्मरण करता है, वह उस परम प्रकाशस्वरूप दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।
श्लोक 11:
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचार्य चरन्ति तं ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये॥
हिन्दी अर्थ: वेद के जानने والے जिसे अविनाशी कहते हैं, आसक्ति रहित यति पुरुष जिसमें प्रवेश करते हैं और जिसे चाहने वाले ब्रह्मचारी का आचरण करते हैं, उस पद को मैं तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा।
श्लोक 12 - 13:
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्धध्यायाधाय आत्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥
हिन्दी अर्थ: इंद्रियों के समस्त द्वारों को अच्छी प्रकार रोककर और मन को हृदय में स्थिर करके, तथा अपनी मूर्धा (मस्तिष्क) में प्राण को स्थापित करके योग-धारणा में स्थित हुआ; जो पुरुष 'ॐ' इस एक अक्षर रूप ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 14:
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! जो पुरुष मुझमें अनन्य चित्त होकर सदा ही निरंतर मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ (आसानी से प्राप्त हो जाता हूँ)।
श्लोक 15:
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवान्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥
हिन्दी अर्थ: परम सिद्धि को प्राप्त हुए महात्मान लोग मुझको प्राप्त होकर दुखों के घर और असत्य (नाशवान) पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते।
श्लोक 16:
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! ब्रह्मलोक पर्यन्त सभी लोक पुनरावर्ती (लौटकर आने वाले) हैं, परंतु हे अर्जुन! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता।
श्लोक 17:
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्र्मणो विदुः।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥
हिन्दी अर्थ: ब्रह्मा का एक दिन हजार युगों की अवधि वाला और रात भी हजार युगों की अवधि वाली है—इसको जो मनुष्य तत्त्व से जानते हैं, वे ही दिन और रात के जानने वाले ज्ञानी हैं।
श्लोक 18:
व्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके॥
हिन्दी अर्थ: दिन के प्रवेश काल में संपूर्ण चराचर प्राणी अव्यक्त से उत्पन्न होते हैं और रात्रि के प्रवेश काल में उसी अव्यक्त नामक प्रकृति में लीन हो जाते हैं।
श्लोक 19:
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥
हिन्दी अर्थ: वही यह प्राणियों का समुदाय बार-बार उत्पन्न होकर रात्रि के प्रवेश काल में परवश होकर लीन होता है और दिन के प्रवेश काल में फिर उत्पन्न होता है।
श्लोक 20:
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनाः।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥
हिन्दी अर्थ: उस अव्यक्त से भी अति परे दूसरा जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह संपूर्ण प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।
श्लोक 21:
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
हिन्दी अर्थ: जो अव्यक्त 'अक्षर' कहा गया है, उसी को परम गति कहते हैं। जिसे प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं लौटते, वह मेरा परम धाम है।
श्लोक 22:
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! जिस परमात्मा के अंतर्गत सभी प्राणी हैं और जिससे यह संपूर्ण जगत व्याप्त है, वह परम पुरुष तो अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है।
श्लोक 23:
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।
प्रयाता यान्ति तं कालং वक्ष्यामि भरतर्षभ॥
हिन्दी अर्थ: हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! जिस काल में (मार्ग से) शरीर त्यागकर गए हुए योगी जन तो लौटकर न आने वाली गति को और जिस काल में गए हुए लौटकर आने वाली गति को ही प्राप्त होते हैं, उस काल को मैं कहूँगा।
श्लोक 24:
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥
हिन्दी अर्थ: जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि देवता, दिन का समय, शुक्ल पक्ष और उत्तरयण के छह महीने हैं—उस मार्ग में मरे हुए ब्रह्म को जानने वाले योगीजन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 25:
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥
हिन्दी अर्थ: जिस मार्ग में धूमावती रात्रि, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छह महीने हैं—उस मार्ग में मरा हुआ योगी चंद्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर फिर लौटकर आता है।
श्लोक 26:
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः॥
हिन्दी अर्थ: क्योंकि जगत की ये शुक्ल (उजाला) और कृष्ण (अंधेरा) नाम की दोनों गतियाँ सनातन मानी गई हैं। इनमें से एक के द्वारा जाने वाले मनुष्य वापस नहीं लौटते और दूसरी के द्वारा जाने वाले फिर लौटकर आते हैं।
श्लोक 27:
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! इन दोनों मार्गों को अच्छी तरह जानता हुआ कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन! तू सब काल में योगयुक्त हो जा।
श्लोक 28:
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलप्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्॥
हिन्दी अर्थ: योगी पुरुष इस रहस्य को जानकर वेदों के पढ़ने में, यज्ञों में, तपों में और दान में जो पुण्य फल कहा गया है, उन सबको लाँघकर आदिकरण परम पद को प्राप्त होता है।
अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोग (परम विद्या और परम रहस्य) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोग
श्लोक 1:
श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—दोष-दृष्टि से रहित तेरे लिए इस अतिशय गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को फिर अच्छी प्रकार कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ (संसार बंधन) से मुक्त हो जाएगा।
श्लोक 2:
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥
हिन्दी अर्थ: यह विद्याओं का राजा है, उत्तम रहस्यों का राजा है, अति पवित्र और अति उत्तम है। यह प्रत्यक्ष फल देने वाला, धर्मयुक्त, करने में बहुत सुगम और अविनाशी है।
श्लोक 3:
अश्रद्धाधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥
हिन्दी अर्थ: हे परंतप अर्जुन! इस उपयुक्त धर्म में श्रद्धा न रखने वाले पुरुष मुझे न प्राप्त होकर मृत्यु रूप संसार के मार्ग में लौटते रहते हैं।
श्लोक 4:
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥
हिन्दी अर्थ: मेरे द्वारा यह संपूर्ण जगत अव्यक्त रूप से व्याप्त है। संपूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं, किंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
श्लोक 5:
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥
हिन्दी अर्थ: और वे प्राणी भी मुझमें स्थित नहीं हैं—मेरी योगशक्ति को देख! प्राणियों को धारण करने वाला और प्राणियों को उत्पन्न करने वाला मेरा यह आत्मा भूतस्थ (प्राणियों में स्थित) नहीं है।
श्लोक 6:
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥
हिन्दी अर्थ: जैसे आकाश में रहने वाला महान वायु सब जगह कल्पित रहने पर भी सदा आकाश में ही स्थित रहता है, वैसे ही संपूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित हैं—ऐसा तू जान।
श्लोक 7:
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! कल्प के अंत में सब प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं (प्रकृति मेंलीन होते हैं) और कल्प के आदि में मैं उनको फिर से रचता हूँ।
श्लोक 8:
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृत्या वशात्॥
हिन्दी अर्थ: अपनी प्रकृति को अपने अधीन करके स्वभाव के बल से परवश हुए इस संपूर्ण प्राणी समुदाय को मैं बार-बार रचता हूँ।
श्लोक 9:
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥
हिन्दी अर्थ: हे धनंजय! वे कर्म मुझको नहीं बाँधते; क्योंकि उदासीन की तरह स्थित और उन कर्मों में आसक्ति रहित उस मुझको वे कर्म नहीं लेपते।
श्लोक 10:
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! मेरी अध्यक्षता में यह प्रकृति चराचर सहित संपूर्ण जगत को रचती है और इसी हेतु से यह संसार चक्कर काट रहा है।
श्लोक 11:
अवजानanti मां मूढा मानुषीं तनुमास्थितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥
हिन्दी अर्थ: मेरे परम भाव को न जानने वाले मूर्ख लोग संपूर्ण प्राणियों के महान ईश्वर रूप मुझको मनुष्य रूप में आया हुआ समझकर मेरी अवहेलना (निंदा) करते हैं।
श्लोक 12:
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं गताः॥
हिन्दी अर्थ: वे व्यर्थ आशा वाले, व्यर्थ कर्म करने वाले और व्यर्थ ज्ञान वाले तथा बुद्धिहीन मनुष्य मोहिनी, राक्षसी और आसुरी प्रकृति को ही धारण किए रहते हैं।
श्लोक 13:
महात्मानास्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥
हिन्दी अर्थ: किंतु हे पार्थ! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा लोग मुझको संपूर्ण प्राणियों का सनातन कारण और अविनाशी जानकर अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।
श्लोक 14:
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥
हिन्दी अर्थ: वे दृढ़व्रती भक्त जन निरंतर मेरा कीर्तन करते हुए और मुझको प्राप्त होने के लिए यत्न करते हुए तथा मुझको बार-बार नमस्कार करते हुए, नित्ययुक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं।
श्लोक 15:
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्यें यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥
हिन्दी अर्थ: दूसरे ज्ञान यज्ञ द्वारा अनन्य भाव से पूजन करते हुए मुझको उपासते हैं और दूसरे लोग मेरे विराट रूप को, अनेक प्रकार से, एक रूप से तथा पृथक्-पृथक् रूप से उपासना करते हैं।
श्लोक 16:
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥
हिन्दी अर्थ: क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा (पितरों के लिए अन्न) मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मंत्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवन रूप क्रिया भी मैं ही हूँ।
श्लोक 17:
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रंोंकार ऋक्साम यजुर्वेद एव च॥
हिन्दी अर्थ: इस जगत का पिता, माता, धाता (धारण करने वाला) और पितामह (ताऊ/दादा) मैं हूँ; जानने योग्य पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।
श्लोक 18:
गतिर्भरता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥
हिन्दी अर्थ: गति, भर्ता (पोषण करने वाला), प्रभु, साक्षी, निवास स्थान, शरण लेने योग्य, सुहृद (मित्र), उत्पत्ति और प्रलय का स्थान, निधान (खजाना) और अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ।
श्लोक 19:
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं च मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! मैं ही तपता हूँ, वर्षा को रोकता हूँ और वर्षा को भेजता हूँ। मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।
श्लोक 20:
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयंते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकम् अश्नंति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥
हिन्दी अर्थ: तीनों वेदों को जानने वाले, सोम रस को पीने वाले और पाप रहित मनुष्य मुझको यज्ञों द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं। वे पुण्यात्मा स्वर्ग लोक को प्राप्त होकर देवताओं के दिव्य भोगों को भोगते हैं।
श्लोक 21:
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशंति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभंते॥
हिन्दी अर्थ: वे उस विशाल स्वर्ग लोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर इस मृत्यु लोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों के धर्म का आचरण करने वाले और भोगों को चाहने वाले लोग बार-बार आने-जाने (जन्म-मरण) को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 22:
अनन्याश्चिंतयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
हिन्दी अर्थ: जो अनन्य भक्तजन चित्त लगाकर निरंतर मेरा स्मरण करते हुए निष्काम भाव से मेरी उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योग-क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा और अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति) मैं स्वयं बहन करता हूँ।
श्लोक 23:
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धान्विताः।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! जो अन्य देवताओं के भक्त हैं और श्रद्धा से युक्त होकर पूजते हैं, वे भी अविधिवत (अज्ञानपूर्वक) मेरा ही पूजन करते हैं।
श्लोक 24:
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनतश्च्युतिः च ते॥
हिन्दी अर्थ: क्योंकि संपूर्ण यज्ञों के भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ, परंतु वे मुझको तत्त्व से नहीं जानते, इसलिए उनका पतन होता है।
श्लोक 25:
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यन्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥
हिन्दी अर्थ: देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं।
श्लोक 26:
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
हिन्दी अर्थ: जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्ता, फूल, फल या जल अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि वाले निष्काम प्रेमी भक्त द्वारा प्रेमपूर्वक दिए गए उस भेंट को मैं स्वीकार करता हूँ।
श्लोक 27:
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोसि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ में हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मुझे ही अर्पण कर।
श्लोक 28:
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥
हिन्दी अर्थ: इस प्रकार करने से तू कर्मों के अच्छे और बुरे फलों से मुक्त हो जाएगा। संन्यास योग से युक्त चित्त वाला और सब बंधनों से मुक्त हुआ तू मुझको ही प्राप्त होगा।
श्लोक 29:
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
हिन्दी अर्थ: मैं सब प्राणियों में समान रूप से व्यापक हूँ, न कोई मेरा शत्रु है और न प्रिय है। परंतु जो भक्त प्रेम से मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रकट हूँ।
श्लोक 30:
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवस्थितो हि सः॥
हिन्दी अर्थ: यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है; क्योंकि उसने अच्छी प्रकार निश्चय कर लिया है।
श्लोक 31:
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥
हिन्दी अर्थ: वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शांति को प्राप्त होता है। हे अर्जुन! तू प्रतिज्ञा कर कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
श्लोक 32:
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि वाले जो कोई भी हों, वे भी मेरे शरण में आकर परम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 33:
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥
हिन्दी अर्थ: फिर पवित्र ब्राह्मण और राजर्षि भक्तगण मुझको प्राप्त हों, इसमें तो कहना ही क्या है! इसलिए इस अनित्य और दुखों से भरे हुए लोक को प्राप्त होकर तू मेरा भजन कर।
श्लोक 34:
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥
हिन्दी अर्थ: मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर और मुझको नमस्कार कर। इस प्रकार आत्मा को मुझमें लगाकर और मेरे परायण होकर तू निश्चित रूप से मुझको ही प्राप्त होगा।
अध्याय 10: विभूतियोग (भगवान की विभूतियां व ऐश्वर्य) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 10: विभूतियोग
श्लोक 1:
श्रीभगवानुवाच
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे महाबाहो अर्जुन! फिर भी मेरी उस परम बात को सुन, जिसे मैं तेरी भलाई चाहने वाले के लिए प्रेम से कह रहा हूँ।
श्लोक 2:
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥
हिन्दी अर्थ: मेरे उत्पन्न होने को न तो देवता जानते हैं और न महर्षिगण ही जानते हैं; क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदि (कारण) हूँ।
श्लोक 3:
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य मुझको अजन्मा, अनादि और संपूर्ण लोकों का महेश्वर जानता है, वह मनुष्यों में भ्रम रहित होकर संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 4 - 5:
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।
सुखं दुःखं भवोंऽभावो भयं चाभयमेव च॥
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥
हिन्दी अर्थ: बुद्धि, ज्ञान, असंमोह (मोक्ष का साधन), क्षमा, सत्य, इंद्रियों का दमन, मन का शमन, सुख, दुःख, उत्पत्ति, प्रलय, भय और अभय, अहिंसा, समता, संतुष्टि, तप, दान, यश और अपयश—प्राणियों के ये नाना प्रकार के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 6:
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥
हिन्दी अर्थ: सातों महर्षि, उनसे भी पहले के चारों मनु तथा सनक आदि चार कुमार—ये सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनमें इस लोक की सारी प्रजा है।
श्लोक 7:
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥
हिन्दी अर्थ: मेरी इस परम विभूति को और योग को जो मनुष्य तत्त्व से जानता है, वह निश्चल योग से युक्त होता है—इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक 8:
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥
हिन्दी अर्थ: मैं संपूर्ण जगत का प्रभव (उत्पत्ति का कारण) हूँ और मुझसे ही सब कुछ चेष्टा करता है—ऐसा मानकर बुद्धिमान और भावयुक्त भक्त मुझको भजते हैं।
श्लोक 9:
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥
हिन्दी अर्थ: जिनके प्राण मुझमें लगे हैं और जिनका मन मुझमें ही स्थित है, ऐसे मेरे भक्त जन आपस में मेरी चर्चा करते हुए और मेरा गुणगान करते हुए सदा संतुष्ट रहते हैं और आनंदित होते हैं।
श्लोक 10:
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥
हिन्दी अर्थ: उन निरंतर मेरे में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह बुद्धि-योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।
श्लोक 11:
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥
हिन्दी अर्थ: उन पर कृपा करने के लिए ही उनके अंतःकरण में स्थित मैं स्वयं उनके अज्ञान से उत्पन्न हुए अंधकार को प्रकाशवान ज्ञान के दीपक द्वारा नष्ट करता हूँ।
श्लोक 12 - 13:
अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजमविभुम्॥
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं। आपको सभी ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास ऋषि सनातन, दिव्य, आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं और आप स्वयं भी मुझसे ऐसा ही कहते हैं।
श्लोक 14:
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥
हिन्दी अर्थ: हे केशव! आप मुझसे जो कुछ कहते हैं, उस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्! आपकी लीला को न तो देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं।
श्लोक 15:
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥
हिन्दी अर्थ: हे भूतभावन! हे भूतेश! हे देवदेव! हे जगत्पते! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने को अपने से जानते हैं।
श्लोक 16:
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥
हिन्दी अर्थ: आप अपनी उन दिव्य विभूतियों को पूरी तरह से कहिए, जिनके द्वारा आप इन संपूर्ण लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।
श्लोक 17:
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥
हिन्दी अर्थ: हे योगिन्! मैं निरंतर आपका स्मरण करता हुआ आपको किस प्रकार जानूँ? और हे भगवन्! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं?
श्लोक 18:
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥
हिन्दी अर्थ: हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति को और विभूति को विस्तार से फिर कहिए; क्योंकि आपके अमृत जैसे वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।
श्लोक 19:
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या आत्मविभूतयः।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—अच्छा, अब मैं अपनी उन दिव्य विभूतियों को मुख्य-मुख्य बातें कहूँगा; क्योंकि मेरी विभूतियों का कोई अंत नहीं है।
श्लोक 20:
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूतास्थितः।
अहमादिশ্চ मध्यं च भूतानामन्त एव च॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! मैं संपूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ तथा संपूर्ण प्राणियों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ।
श्लोक 21:
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।
मरीचिर्मारुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥
हिन्दी अर्थ: मैं आदित्यों में विष्णु और प्रकाशमानों में किरणवाला सूर्य हूँ। मैं मरुत्गणों में मरीचि और नक्षत्रों में चंद्रमा हूँ।
श्लोक 22:
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥
हिन्दी अर्थ: मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवताओं में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और प्राणियों की चेतना (जीवन शक्ति) हूँ।
श्लोक 23:
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥
हिन्दी अर्थ: मैं रुद्रों में शंकर हूँ, यक्ष और राक्षसों में कुबेर हूँ, वसुओं में अग्नि हूँ और पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ।
श्लोक 24:
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! पुरोहितों में मुख्य बृहस्पति मुझे जान, सेनापतियों में कार्तिकेय और जलाशयों में समुद्र मैं हूँ।
श्लोक 25:
महर्षीणां भृगुरहं गिरमस्मि एकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावरणां हिमालयः॥
हिन्दी अर्थ: मैं महर्षियों में भृगु ऋषि हूँ, वाणियों में एक अक्षर 'ॐ' हूँ, यज्ञों में जप यज्ञ हूँ और स्थिर रहने वाले वृक्षों में हिमालय हूँ।
श्लोक 26:
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।
गंधर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥
हिन्दी अर्थ: मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गंधर्वों में चित्ररथ और सिद्ध पुरुषों में कपिल मुनि हूँ।
श्लोक 27:
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥
हिन्दी अर्थ: घोड़ों में अमृत से उत्पन्न उच्चैःश्रवा घोड़ा मुझे जान, हाथियों में ऐरावत हाथी और मनुष्यों में राजा मुझे जान।
श्लोक 28:
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणास्मि वासुकिः॥
हिन्दी अर्थ: मैं हथियारों में वज्र हूँ, गायों में कामधेनु हूँ, संतान उत्पन्न करने वाला कामदेव हूँ और सर्पों में वासुकी नाग हूँ।
श्लोक 29:
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥
हिन्दी अर्थ: मैं नागों में अनंत (शेषनाग) हूँ, जलचरों के अधिपति वरुण हूँ, पितरों में अर्यमा हूँ और नियम रखने वालों में यमराज हूँ।
श्लोक 30:
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥
हिन्दी अर्थ: मैं दैत्यों में प्रह्लाद हूँ, गणना करने वालों में समय (काल) हूँ, पशुओं में सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूँ।
श्लोक 31:
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥
हिन्दी अर्थ: मैं पवित्र करने वालों में वायु हूँ, शस्त्रधारियों में राम हूँ, मछलियों में मकर हूँ और नदियों में गंगा हूँ।
श्लोक 32:
सर्णानामादिर्अंतश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि, अंत और मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्म विद्या हूँ और शास्त्रार्थ करने वालों का वाद (तर्क) हूँ।
श्लोक 33:
अक्षराणां अकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥
हिन्दी अर्थ: मैं अक्षरों में 'अ' कार हूँ और समाजों में द्वंद्व समास हूँ। अक्षय काल और सब ओर मुख वाला विराट विधाता भी मैं ही हूँ।
श्लोक 34:
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥
हिन्दी अर्थ: सबका नाश करने वाला मृत्यु और आगे होने वालों की उत्पत्ति भी मैं हूँ। स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धैर्य और क्षमा हूँ।
श्लोक 35:
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥
हिन्दी अर्थ: वेदों की ऋचाओं में बृहत्साम और छंदों में गायत्री छंद हूँ। महीनों में मार्गशीर्ष (अगहन) का महीना और ऋतुओं में फूलों को खिलाने वाली वसंत ऋतु हूँ।
श्लोक 36:
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥
हिन्दी अर्थ: मैं छल करने वालों में जुआ और तेजस्वियों का तेज हूँ। मैं विजय हूँ, निश्चय हूँ और सात्त्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ।
श्लोक 37:
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनां उशना कविः॥
हिन्दी अर्थ: मैं वृष्णि वंशियों में वासुदेव (कृष्ण), पाण्डवों में अर्जुन हूँ, मुनियों में व्यास और कवियों में उशना कवि हूँ।
श्लोक 38:
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवതാमहम्॥
हिन्दी अर्थ: मैं दमन करने वालों का दंड हूँ, जीतने की इच्छा वालों की नीति हूँ, रहस्यों में मौन हूँ और ज्ञानियों का ज्ञान हूँ।
श्लोक 39:
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥
हिन्दी अर्थ: और हे अर्जुन! जो संपूर्ण भूतों का बीज (कारण) है, वह भी मैं ही हूँ। ऐसा चर और अचर कोई भी प्राणी नहीं है, जो मेरे बिना हो।
श्लोक 40:
नांतोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥
हिन्दी अर्थ: हे परंतप अर्जुन! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है। मैंने जो विभूतियों का विस्तार कहा है, वह तो केवल देश (संकेत) मात्र से कहा है।
श्लोक 41:
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्॥
हिन्दी अर्थ: जो-जो भी विभूति युक्त, श्रीयुक्त और तेजयुक्त वस्तु है, उस-उसको तू मेरे तेज के एक अंश से ही उत्पन्न हुई जान।
श्लोक 42:
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥
हिन्दी अर्थ: अथवा हे अर्जुन! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है? मैं इस संपूर्ण जगत को अपनी योगशक्ति के केवल एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ।
अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोग (विराट रूप के दर्शन) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोग
श्लोक 1:
अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतेो मम॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—मुझ पर कृपा करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन कहा है, उससे मेरा यह मोह सर्वथा नष्ट हो गया है।
श्लोक 2:
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥
हिन्दी अर्थ: हे कमलपत्रों जैसे नेत्रों वाले कृष्ण! मैंने आपसे प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है।
श्लोक 3:
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमऐश्वरं पुरुषोत्तम॥
हिन्दी अर्थ: हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक वैसा ही है। अब हे पुरुषोत्तम! मैं आपके उस ऐश्वर रूप को देखना चाहता हूँ।
श्लोक 4:
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभो! यदि आप मेरे द्वारा उस रूप का देखा जाना संभव मानते हैं, तो हे योगेश्वर! आप अपने उस अविनाशी स्वरूप को मुझे दर्शाइए।
श्लोक 5:
श्रीभगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे पार्थ! अब तू मेरी सैकड़ों और हजारों प्रकार की नाना प्रकार की और भाँति-भाँति के रंगों तथा आकृतियों वाली दिव्य रूपओं को देख।
श्लोक 6:
पश्यादित्यान् वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! तू मुझमें आदित्यों को, वसुओं को, रुद्रों को, दोनों अश्विनीकुमारों को और मरुत्गणों को देख। तथा और भी बहुत-से पहले न देखे हुए आश्चर्यमयी रूपों को देख।
श्लोक 7:
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्रष्टुमिच्छसि॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित संपूर्ण चराचर जगत को देख और जो कुछ अन्य भी देखना चाहता है, वह देख।
श्लोक 8:
न तु मां शक्ष्यसे द्रष्टुमननेनैव चक्षुषा।
दिव्यं ददाति ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥
हिन्दी अर्थ: किंतु तू इन अपने प्राकृत नेत्रों से मुझको देखने में सर्वथा असमर्थ है, इसलिए मैं तुझे दिव्य दृष्टि देता हूँ—इससे तू मेरी ऐश्वर्य योग शक्ति को देख।
श्लोक 9:
संजय उवाच
तत एव उक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥
हिन्दी अर्थ: संजय बोले—हे राजन! महायोगेश्वर और सबके स्वामी भगवान ने तब अर्जुन को अपना परम ऐश्वर रूप दिखाया।
श्लोक 10 - 11:
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतयुधम्॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धोऽवलेपनम्।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्॥
हिन्दी अर्थ: उस रूप के अनेक मुख और नेत्र, अनेक अद्भुत दर्शन, अनेक दिव्य आभूषण और अनेक दिव्य उठाए हुए अस्त्र-शस्त्र थे। वह दिव्य मालाओं और वस्त्रों को धारण किए हुए, दिव्य गंध से युक्त, सब प्रकार के आश्चर्यों से परिपूर्ण, अनंत और सब ओर मुख किए हुए था।
श्लोक 12:
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सा सदृशी स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥
हिन्दी अर्थ: आकाश में यदि हजारों सूर्यों का प्रकाश एक साथ उदय हो जाए, तो भी उस महात्मा के प्रकाश के सदृश शायद ही हो सके।
श्लोक 13:
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥
हिन्दी अर्थ: पाण्डव अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त हुए संपूर्ण जगत को देवों के देव भगवान के शरीर में एक जगह स्थित देखा।
श्लोक 14:
ततः स विस्मायविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥
हिन्दी अर्थ: इसके बाद वे आश्चर्य से चकित और रोमांचित हुए धनंजय अर्जुन ने हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर भगवान से कहा।
श्लोक 15:
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान्।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थम् ऋषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे देव! मैं आपके शरीर में संपूर्ण देवताओं को और प्राणियों के विशेष समूहों को तथा कमल के आसन पर बैठे हुए ब्रह्माजी को, महादेव को और संपूर्ण ऋषियों तथा दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ।
श्लोक 16:
अनेकबाहुदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनंतरूपम्।
नांतं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥
हिन्दी अर्थ: हे विश्वेश्वर! हे विश्वरूप! मैं आपके शरीर में अनेक भुजाओं, पेटों, मुखों और नेत्रों को तथा सब ओर से अनंत रूपों को देख रहा हूँ। मुझे न तो आपका अंत दिखाई देता है, न मध्य और न आदि ही।
श्लोक 17:
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमंतम्।
पश्यामि त्वां दुर्निरिक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥
हिन्दी अर्थ: आपको मुकुट से युक्त, गदा और चक्र धारण किए हुए, सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुंज के रूप में देखता हूँ। प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान नेत्रों वाले तथा अप्रमेय तेज के कारण आपके इस रूप को देखना अत्यंत कठिन है।
श्लोक 18:
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥
हिन्दी अर्थ: आप ही जानने योग्य परम अक्षर (ब्रह्म) हैं, आप ही इस विश्व के परम आश्रय हैं, आप ही सनातन धर्म के रक्षक और अविनाशी सनातन पुरुष हैं—ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 19:
अनादिमध्यान्तमनंतवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपंतम्॥
हिन्दी अर्थ: आपको आदि, मध्य और अंत से रहित, अनंत प्रभाव वाले, अनगिनत भुजाओं वाले, चंद्रमा और सूर्य रूपी नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूपी मुख वाले और अपने तेज से इस संपूर्ण जगत को तपाते हुए देखता हूँ।
श्लोक 20:
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥
हिन्दी अर्थ: हे महात्मन्! यह आकाश और पृथ्वी के बीच का संपूर्ण अंतरिक्ष तथा सब दिशाएँ केवल आपसे ही व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अत्यंत व्यथित हो रहे हैं।
श्लोक 21:
अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलैः॥
हिन्दी अर्थ: वे देवताओं के समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं, कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके नाम और गुणों का उच्चारण कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धों के समूह 'कल्याण हो' ऐसा कहकर उत्तम स्तुतियों द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।
श्लोक 22:
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गंधर्वयक्षासुरसिद्धसंघाः वीक्षते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥
हिन्दी अर्थ: रुद्र, आदित्य, वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, दोनों अश्विनीकुमार, मरुत्गण, उष्मप (पितर), गंधर्व, यक्ष, असुर और सिद्धों के समूह—ये सभी चकित होकर आपको देख रहे हैं।
श्लोक 23:
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम्।
बहूडरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्॥
हिन्दी अर्थ: हे महाबाहो! आपके अनेक मुखों और नेत्रों वाले, अनेक भुजाओं, जाँघों और पैरों वाले, बहुत से उदरों वाले तथा भयानक दाँतों वाले इस विशाल रूप को देखकर सब लोक और मेरे साथ मैं भी व्यथित हो रहा हूँ।
श्लोक 24:
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताङ्गलं दीप्तविशालनेत्रम्।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥
हिन्दी अर्थ: हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, अनेक वर्णों से युक्त, प्रज्वलित मुख वाले और बड़े-बड़े फैले हुए नेत्रों वाले आपको देखकर मेरा भयभीत अंतःकरण धैर्ये और शांति को नहीं पा रहा है।
श्लोक 25:
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वा कालानलसन्निभाणि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देव जगत्प्रनिवास॥
हिन्दी अर्थ: प्रज्वलित प्रलय की अग्नि के समान भयानक दाँतों वाले आपके मुखों को देखकर मुझे दिशाओं का ज्ञान नहीं हो रहा है और सुख भी नहीं मिल रहा है। हे देव! हे जगत्प्रनिवास! आप मुझ पर प्रसन्न होइए।
श्लोक 26 - 27:
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥
हिन्दी अर्थ: और वे धृतराष्ट्र के सभी पुत्र राजाओं के समूहों सहित, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा कर्ण और हमारे पक्ष के भी मुख्य योद्धाओं सहित आपके भयानक दाँतों वाले मुखों में तेजी से प्रवेश कर रहे हैं। उनमें से कुछ लोग आपके दाँतों के बीच में फँसे हुए चूर्ण हुए सिरों सहित दिखाई दे रहे हैं।
श्लोक 28:
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखद्रवन्ति।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥
हिन्दी अर्थ: जैसे नदियों के जल के अनेक वेग समुद्र की ओर ही दौड़ते हैं (समाते हैं), वैसे ही मनुष्य लोक के ये वीर योद्धा आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
श्लोक 29:
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥
हिन्दी अर्थ: जैसे पतंगे अपने नाश के लिए प्रज्वलित अग्नि में तीव्र वेग से प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में तीव्र वेग से प्रवेश कर रहे हैं।
श्लोक 30:
लेलिह्यसे ग्रसमानः समंताल्लोकान्सग्रिमान् वद नहीं तैः।
भासो उग्र्याः प्रतपंति विष्णो जगत्समग्रं भासा तवोग्रिभिः॥
हिन्दी अर्थ: आप इन संपूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से चाट रहे हैं। हे विष्णो! आपका उग्र प्रकाश संपूर्ण जगत को अपने तेज से तपा रहा है।
श्लोक 31:
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमद्य न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम॥
हिन्दी अर्थ: मुझे बताइए कि इतने उग्र रूप वाले आप कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो, आप मुझ पर प्रसन्न होइए। मैं आदिपुरुष आपको विशेष रूप से जानना चाहता हूँ; क्योंकि मैं आपकी इस प्रवृत्ति को नहीं जानता।
श्लोक 32:
श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—लोक का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोगों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। तेरे प्रतिपक्ष में खड़े हुए ये योद्धा लोग तेरे बिना भी नहीं रहेंगे, अर्थात् तेरे मारे बिना भी इन सबका नाश हो जाएगा।
श्लोक 33:
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रूंभुंक्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैतानि निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥
हिन्दी अर्थ: इसलिए तू खड़ा हो जा और यश प्राप्त कर। शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोग। ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं, हे सव्यसाची (अर्जुन)! तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा।
श्लोक 34:
द्रोणं च ভীष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यాన్ अपि योधवीरान्।
मया हतास्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्॥
हिन्दी अर्थ: द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, जयद्रथ, कर्ण तथा और भी बहुत-से शूरवीर योद्धाओं को मेरे द्वारा पहले ही मारा जा चुका है। तू उन्हें मार डाल, भय मत कर। तू युद्ध कर, तू रण में शत्रुओं को अवश्य जीतेगा।
श्लोक 35:
संजय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगादगदं भीतः प्रनम्य॥
हिन्दी अर्थ: संजय बोले—केशव के इन वचनों को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपते हुए नमस्कार करके, भयभीत होकर प्रणाम करके गदगद वाणी में फिर से बोले।
श्लोक 36:
अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे हृषीकेश! यह उचित ही है कि आपके प्रभाव से जगत प्रहर्षित और अनुरक्त हो रहा है, राक्षस भयभीत होकर सब दिशाओं में भाग रहे हैं और सिद्धों के समूह आपको नमस्कार कर रहे हैं।
श्लोक 37:
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश जगत्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥
हिन्दी अर्थ: हे महात्मन्! वे आपको नमस्कार क्यों न करें, जो ब्रह्मा से भी बड़े और उनके आदि कर्ता हैं? हे अनंत! हे देवेश! हे जगत्निवास! जो सत्, असत् और उससे परे अक्षर ब्रह्म है, वह आप ही हैं।
श्लोक 38:
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
हिन्दी अर्थ: आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इस विश्व के परम आश्रय हैं, आप जानने वाले और जानने योग्य तथा परम धाम हैं। हे अनन्त रूप! यह संपूर्ण जगत आपसे ही व्याप्त है।
श्लोक 39:
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशांकः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
हिन्दी अर्थ: आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्रमा, प्रजापति और प्रपितामह (ब्रह्मा के भी पिता) हैं। आपको सहस्रों बार नमस्कार हो! आपको फिर-फिर भी नमस्कार हो!
श्लोक 40:
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनंतविक्रमः पराक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥
हिन्दी अर्थ: आपके आगे से, पीछे से और सब ओर से आपको नमस्कार हो! हे अनंत पराक्रमी! आप समस्त संसार को व्याप्त किए हुए हैं, इसलिए आप ही सब कुछ हैं।
श्लोक 41 - 42:
सत्वेति मत्वा प्रमभतं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अनजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥
यच्चावहासार्थमसतकृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु।
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् समक्षतत्सर्वमचक्षुषे तत्॥
हिन्दी अर्थ: आपकी इस महिमा को न जानते हुए, अज्ञान से अथवा प्रेम से मैंने आपको हे कृष्ण! हे यादव! हे सखे! इस प्रकार जो कुछ सहसा कह दिया है; और हे अप्रमेय! विहार, शय्या, आसन और भोजन में अकेले में अथवा दोस्तों के सामने जो आपका अपमान किया है, उस अपराध के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।
श्लोक 43:
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥
हिन्दी अर्थ: आप इस चराचर जगत के पिता हैं, पूज्य हैं और गुरुओं के भी बड़े गुरु हैं। हे अप्रतिम प्रभाव वाले! तीनों लोकों में आपके समान भी कोई नहीं है, फिर आपसे अधिक तो कोई कैसे हो सकता है?
श्लोक 44:
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥
हिन्दी अर्थ: इसलिए हे पूजनीय ईश्वर! मैं शरीर को भली-भांति झुकाकर प्रणाम करके आपकी प्रसन्नता की प्रार्थना करता हूँ। हे देव! जैसे पिता पुत्र के, मित्र मित्र के और पति प्रिय पत्नी के अपराध को सहन करता है, वैसे ही आप मेरे अपराध को सहन करने योग्य हैं।
श्लोक 45:
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगत्निवास॥
हिन्दी अर्थ: पहले न देखे हुए इस रूप को देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से व्यथित भी हो रहा है। इसलिए हे देवेश! हे जगत्निवास! आप मुझको वही चतुर्भुज रूप दर्शाइए, मुझ पर प्रसन्न होइए।
श्लोक 46:
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम् इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥
हिन्दी अर्थ: मैं वैसे ही मुकुट पहने हुए, हाथ में गदा और चक्र लिए हुए आपको देखना चाहता हूँ। हे सहस्रबाहु! हे विश्वरूप! आप उसी चतुर्भुज रूप से प्रकट होइए।
श्लोक 47:
श्रीभगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तવાर्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे अर्जुन! मुझ पर प्रसन्न होकर मैंने अपनी योगशक्ति से यह मेरा परम तेजोमय, अनंत और आदि रूप तुझे दिखाया है, जिसे तेरे सिवाय दूसरे किसी ने पहले नहीं देखा था।
श्लोक 48:
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥
हिन्दी अर्थ: हे कुरुवीर अर्जुन! मनुष्य लोक में इस प्रकार के मेरे इस विश्वरूप को तेरे सिवाय न तो वेदों के पढ़ने से, न यज्ञों से, न दान से, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से ही दूसरा कोई देख सकता है।
श्लोक 49:
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥
हिन्दी अर्थ: मेरे इस प्रकार के इस भयानक रूप को देखकर तुझको भय और मूढ़ता नहीं होनी चाहिए। तू भय रहित और प्रसन्न मन वाला होकर मेरे उसी चतुर्भुज रूप को फिर देख।
श्लोक 50:
संजय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोत्वा तं दर्शयामास च रूपं स्वकम्।
भूत्वा च सौम्यपुनरेव भूत्वा महात्मानमभयदस्य भीतम्॥
हिन्दी अर्थ: संजय बोले—वासुदेव भगवान ने अर्जुन से ऐसा कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखाया और महात्मा कृष्ण ने शांत रूप होकर उस भयभीत अर्जुन को धीरज बंधाया।
श्लोक 51:
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वा इदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे जनार्दन! आपके इस शांत मनुष्य रूप को देखकर अब मैं शांतचित्त हो गया हूँ और अपने स्वभाव को प्राप्त हो गया हूँ।
श्लोक 52:
श्रीभगवानुवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—मेरा जो यह रूप तुमने देखा है, यह अत्यंत दुर्लभ है। देवता भी इस रूप के दर्शन की हमेशा इच्छा रखते हैं।
श्लोक 53:
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥
हिन्दी अर्थ: जैसा तुमने मुझको देखा है, इस प्रकार का यह रूप न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से ही देखने में आ सकता है।
श्लोक 54:
भक्त्या त्वन्यया शक्य अहमेवंवृधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥
हिन्दी अर्थ: किंतु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा ही इस प्रकार का चतुर्भुज रूप मुझको तत्त्व से जानने के लिए, देखने के लिए और मुझमें प्रवेश करने के लिए भी शक्य है।
श्लोक 55:
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।
निर्द्वेषः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥
हिन्दी अर्थ: हे पाण्डव! जो पुरुष केवल मेरे लिए ही सब कर्म करता है, जो मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्ति से रहित है और संपूर्ण प्राणियों में बैर-भाव से रहित है, वह मुझको ही प्राप्त होता है।
अध्याय 12: भक्तियोग (भक्ति का मार्ग) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 12: भक्तियोग
श्लोक 1:
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—जो भक्तजन इस प्रकार निरंतर आपके भजन में लगे हुए आपकी उपासना करते हैं और जो दूसरे केवल अविनाशी और अव्यक्त रूप परब्रह्म की उपासना करते हैं, उनमें उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?
श्लोक 2:
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—जो मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन में लगे हुए मुझ सगुण रूप परमेश्वर को अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से भजते हैं, वे मुझे योगियों में अति उत्तम मान G गए हैं।
श्लोक 3 - 4:
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलम् ध्रुवम्॥
संन्यस्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥
हिन्दी अर्थ: किंतु जो पुरुष संपूर्ण इंद्रियों के समुदाय को भली-भांति वश में करके, मन को और बुद्धि को समान रखकर, जो इंद्री-अतीत, अचूक, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, कूटस्थ और अचल स्वरूप अक्षर ब्रह्म की उपासना करते हैं, वे सब प्राणियों के हित में लगे हुए पुरुष मुझको ही प्राप्त होते हैं।
श्लोक 5:
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥
हिन्दी अर्थ: उन अव्यक्त में आसक्त चित्त वाले पुरुषों के लिए साधन में परिश्रम विशेष है; क्योंकि शरीर से अभिमान रखने वाले मनुष्यों द्वारा अव्यक्त गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है।
श्लोक 6 - 7:
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥
तेषां अहमसमुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥
हिन्दी अर्थ: किंतु जो मेरे परायण हुए संपूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके अनन्य योग (भक्ति) से निरंतर मेरा चिंतन करते हुए उपासना करते हैं, हे पार्थ! उन मयि आवेशित चित्त वाले पुरुषों का मैं मृत्यु रूप संसार समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला होता हूँ।
श्लोक 8:
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥
हिन्दी अर्थ: मुझमें ही मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को स्थापित कर; इसके बाद तू मुझमें ही निवास करेगा—इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक 9:
अथ चित्तं समाधातं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय॥
हिन्दी अर्थ: यदि तू मुझमें मन को अचल रूप से स्थिर करने में समर्थ नहीं है, तो हे धनंजय! अभ्यास रूप योग के द्वारा मुझको प्राप्त होने की इच्छा कर।
श्लोक 10:
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कार्मपरमो भव।
मदर्फमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि॥
हिन्दी अर्थ: यदि तू अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के परायण हो जा। मेरे लिए कर्मों को करता हुआ भी तू सिद्धि को प्राप्त हो जाएगा।
श्लोक 11:
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योमाश्रितः।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥
हिन्दी अर्थ: यदि तू मेरी इस भक्ति को करने में भी असमर्थ है, तो मन-इंद्रियों को वश में करने वाला होकर, सब कर्मों के फल का त्याग कर।
श्लोक 12:
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनंतरम्॥
हिन्दी अर्थ: अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि त्याग से तुरंत ही शांति मिलती है।
श्लोक 13 - 14:
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिः यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सब प्राणियों में प्रेम और करुणा से युक्त है, ममता रहित, अहंकार रहित, सुख-दुःख की प्राप्ति में सम और क्षमावान है; जो सदा संतुष्ट है, योगी है, मन-इंद्रियों को वश में किए हुए है और मुझमें दृढ़निश्चय वाला है—वह मुझमें मन और बुद्धि को लगाने वाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है।
श्लोक 15:
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥
हिन्दी अर्थ: जिससे कोई भी जीव उद्विग्न नहीं होता और जो किसी भी जीव से उद्विग्न नहीं होता, तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगों से मुक्त है, वह मेरा भक्त मुझको प्रिय है।
श्लोक 16:
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष किसी भी आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से पवित्र, चतुर, पक्षपात से रहित और दुखों से छूटा हुआ है—तथा सब आरंभों का त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझको प्रिय है।
श्लोक 17:
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥
हिन्दी अर्थ: जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है और न कामना करता है—जो शुभ और अशुभ संपूर्ण कर्मों का त्यागी है, वह भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है।
श्लोक 18 - 19:
समः शत्रौ च मित्र च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥
तुल्यनिंदास्तुतिर्मुनी संतुष्टो येन केनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥
हिन्दी अर्थ: जो शत्रु और मित्र में तथा मान और अपमान में समान है, तथा सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख आदि द्वंद्वों में सम है और आसक्ति से रहित है; जो निंदा और स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा संतुष्ट है, रहने के लिए स्थान से रहित और स्थिर बुद्धि वाला है—वह भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है।
श्लोक 20:
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥
हिन्दी अर्थ: किंतु जो श्रद्धालु पुरुष मेरे परायण होकर, इस ऊपर कहे गए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेम से सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं।
अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विभाग) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
श्लोक 1 - 2:
अर्जुन उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च।
एतद्द्बेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥
श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे केशव! प्रकृति और पुरुष को तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को तथा ज्ञान और ज्ञेय को मैं जानना चाहता हूँ। श्रीभगवान ने कहा—हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र' ऐसा कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसे 'क्षेत्रज्ञ' ऐसा तत्त्वज्ञानी पुरुष कहते हैं।
श्लोक 3:
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! तू संपूर्ण क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ (आत्मा) भी मुझे ही जान। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही वास्तविक ज्ञान है—ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 4:
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्बिकारि यतश्च यत्।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥
हिन्दी अर्थ: वह क्षेत्र जो और जैसा है, तथा जिन विकारों वाला है और जिससे जो हुआ है, तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाव वाला है—वह सब मुझसे संक्षेप में सुन।
श्लोक 5:
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्वि निश्चितैः॥
हिन्दी अर्थ: यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है, वेदों की ऋचाओं द्वारा अलग-अलग विभाग से गाया गया है और निर्णय करने वाले निश्चययुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है।
श्लोक 6 - 7:
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च च इन्द्रियगोचराः॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥
हिन्दी अर्थ: महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), अहंकार, बुद्धि और अव्यक्त (प्रकृति), तथा दसों इंद्रियाँ, एक मन और पाँच इंद्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध); इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, शरीर का पिंड, चेतना और धृति—यह क्षेत्र विकारों सहित संक्षेप में कहा गया है।
श्लोक 8 - 12:
अमानित्वमदंभित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्यउपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥
इंद्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानदर्शनम्।
एतज्ज्ञानं प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥
हिन्दी अर्थ: श्रेष्ठता का अभिमान न होना, दंभ न करना, किसी को भी न सताना, सहनशीलता, सरलता, गुरु की सेवा, भीतर-बाहर की पवित्रता, स्थिरता, मन का निग्रह; इंद्रियों के विषयों में वैराग्य और अहंकार का न होना; जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार देखना; पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का न होना तथा ममता का अभाव, इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में सदा समचित्त रहना; मुझ परमेश्वर में अनन्य योग के द्वारा अव्यभिचारिणी (अचल) भक्ति, एकांत और पवित्र स्थानों में रहने का स्वभाव तथा विषयासक्त मनुष्यों के समूह में प्रेम न होना; अध्यात्म ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा को देखना—यह सब ज्ञान है और जो इसके विपरीत है, वह अज्ञान है—ऐसा कहा गया है।
श्लोक 13:
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
अनादि मत्परं ब्रह्म न सत्तदसदुच्यते॥
हिन्दी अर्थ: जो जानने योग्य है तथा जिसको बदलकर अमृत (परम आनंद) को प्राप्त होता है, उसे अच्छी प्रकार कहूँगा। वह अनादि और मत्पर (मेरे अधीन) ब्रह्म न सत् ही कहा जाता है और न असत् ही कहा जाता है।
श्लोक 14:
सर्वतः पाणिपादं तत्तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
हिन्दी अर्थ: वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है; क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है।
श्लोक 15:
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥
हिन्दी अर्थ: वह संपूर्ण इंद्रियों के गुणों को जानने वाला है, किंतु वास्तव में सब इंद्रियों से रहित है; आसक्ति रहित होने पर भी सबका पोषण करने वाला है और गुणों से अतीत होने पर भी गुणों का भोग करने वाला है।
श्लोक 16:
बहिरंतश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥
हिन्दी अर्थ: वह चराचर संपूर्ण भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और सूक्ष्म होने के कारण अज्ञेय है; वह अति समीप में है और दूर भी स्थित है।
श्लोक 17:
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥
हिन्दी अर्थ: वह परमात्मा विभागों में बँटे हुए की तरह स्थित होने पर भी, संपूर्ण भूतों में अविभक्त (एक रूप से) स्थित है। वह जानने योग्य परमात्मा विष्णु रूप से प्राणियों को पालने वाला, संहार करने वाला और उत्पन्न करने वाला है।
श्लोक 18:
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥
हिन्दी अर्थ: वह ज्योतिषियों का भी ज्योति और अंधकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञान, जानने योग्य और ज्ञान से प्राप्त होने वाला परमात्मा सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।
श्लोक 19:
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥
हिन्दी अर्थ: इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान और ज्ञेय का संक्षेप से वर्णन किया गया है। मेरा भक्त इसे अच्छी प्रकार जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
श्लोक 20:
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्॥
हिन्दी अर्थ: प्रकृति और पुरुष—इन दोनों को ही तू अनादि जान और संपूर्ण विकारों को तथा गुणों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न हुए जान।
श्लोक 21:
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥
हिन्दी अर्थ: शरीर और इंद्रियों को उत्पन्न करने में 'प्रकृति' को हेतु कहा जाता है और जीव (पुरुष) सुख-दुखों के भोगने में हेतु कहा जाता है।
श्लोक 22:
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुंक्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥
हिन्दी अर्थ: प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है और इन गुणों की संगति ही इस पुरुष की अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।
श्लोक 23:
उपद्रष्टानुमत्ता च भर्त्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्परः पुरुषः॥
हिन्दी अर्थ: इस शरीर में स्थित यह आत्मा वास्तव में उपद्रष्टा (साक्षी), अनुमति देने वाला, भर्ता (पोषण करने वाला), भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा ऐसा कहा गया है।
श्लोक 24:
य एवम् वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च గుణैः सह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष इस प्रकार पुरुष को और गुणों सहित प्रकृति को तत्त्व से जानता है, वह सब प्रकार से वर्तमान होता हुआ भी फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 25:
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥
हिन्दी अर्थ: कई मनुष्य ध्यान के द्वारा आत्मा को अपने अंतःकरण में देखते हैं, दूसरे लोग सांख्य योग (ज्ञान योग) के द्वारा देखते हैं और अन्य लोग कर्म योग के द्वारा देखते हैं।
श्लोक 26:
अन्ये त्वేవमजानन्तः श्रुत्वा अन्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥
हिन्दी अर्थ: किंतु इनसे दूसरे जो लोग इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से सुनकर उपासना करते हैं, वे भी श्रुतिपरायण होकर मृत्यु रूप संसार को निश्चय ही पार कर जाते हैं।
श्लोक 27:
यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगাত্তद्विद्धि भरतर्षभ॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! जितने भी स्थावर और जंगम (चर-अचर) प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न हुआ जान।
श्लोक 28:
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष नष्ट होने वाले संपूर्ण भूतों में परमेश्वर को समभाव से नाश रहित स्थित देखता है, वही वास्तव में सत्य देखता है।
श्लोक 29:
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥
हिन्दी अर्थ: क्योंकि जो पुरुष सब जगह समान रूप से स्थित परमेश्वर को देखता है, वह अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, इसलिए वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 30:
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥
हिन्दी अर्थ: और जो पुरुष संपूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति द्वारा ही किए जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्त्ता देखता है, वही वास्तव में सत्य देखता है।
श्लोक 31:
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा॥
हिन्दी अर्थ: जिस समय यह पुरुष प्राणियों के पृथक्-पृथक् भाव को एक परमात्मा में ही स्थित देखता है और उस परमात्मा से ही संपूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी समय वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 32:
अनादित्वात्निर्गुणत्वात्परमात्माऽयमव्ययः।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न कुछ करता है और न लिप्त होता है।
श्लोक 33:
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिष्यते।
सर्वत्रअवस्थितो देहे तथात्मानो नोपलिष्यते॥
हिन्दी अर्थ: जैसे सर्वव्यापी आकाश सूक्ष्म होने के कारण किसी से भी लिप्त नहीं होता, वैसे ही शरीर में सब जगह स्थित आत्मा भी किसी से लिप्त नहीं होता।
श्लोक 34:
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! जैसे एक ही सूर्य इस संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है, वैसे ही आत्मा (क्षेत्री) संपूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।
श्लोक 35:
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥
हिन्दी अर्थ: इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के अंतर को तथा भूतप्रकृति (प्रकृति के बंधनों) से मुक्ति को जो पुरुष ज्ञान रूप नेत्रों से जानते हैं, वे महात्मा परम पद को प्राप्त होते हैं।
अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग (प्रकृति के तीनों गुणों का विभाग) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग
श्लोक 1:
श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—ज्ञानों में भी उत्तम इस श्रेष्ठ ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसे जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो चुके हैं।
श्लोक 2:
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥
हिन्दी अर्थ: इस ज्ञान को आश्रय करके यानी धारण करके मेरे स्वभाव को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में भी उत्पन्न नहीं होते और प्रलय काल में भी व्यथित (नष्ट) नहीं होते।
श्लोक 3:
मम योनिरमहद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! मेरी मूल प्रकृति (महद्ब्रह्म) संपूर्ण भूतों की योनि (गर्भधारण करने का स्थान) है और मैं उसमें चैतन्य रूप गर्भ स्थापित करता हूँ। उससे संपूर्ण भूतों की उत्पत्ति होती है।
श्लोक 4:
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! संपूर्ण योनियों में जितने शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी मूल प्रकृति तो गर्भ धारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापित करने वाला पिता हूँ।
श्लोक 5:
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥
हिन्दी अर्थ: हे महाबाहो! सत्व, रज और तम—ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण शरीर में रहने वाले अविनाशी जीवात्मा को बांधते हैं।
श्लोक 6:
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥
हिन्दी अर्थ: हे पापरहित अर्जुन! उन तीनों गुणों में सत्वगुण निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से जीवात्मा को बांधता है।
श्लोक 7:
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥
हिन्दी अर्थ: रजोगुण को रागात्मक (तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न) जान। वह इस जीवात्मा को कर्मों की आसक्ति से बांधता है।
श्लोक 8:
तमस्लज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥
हिन्दी अर्थ: तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न और संपूर्ण देहधारियों को मोहित करने वाला जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा बांधता है।
श्लोक 9:
सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! सत्वगुण सुख में लगाता है, रजोगुण कर्म में लगाता है और तमोगुण ज्ञान को ढँककर प्रमाद में लगाता है।
श्लोक 10:
रजस्तमश्च अभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्वगुण बढ़ता है, वैसे ही सत्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण बढ़ता है, तथा सत्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है।
श्लोक 11:
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं यदा तदा विद्याविवृद्धं सत्त्वमित्युत॥
हिन्दी अर्थ: जिस समय इस शरीर के सब द्वारों में ज्ञान रूप प्रकाश उत्पन्न होता है, तब ऐसा जानना चाहिए कि सत्वगुण बढ़ा हुआ है।
श्लोक 12:
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥
हिन्दी अर्थ: हे भरतर्षभ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरंभ, अशांति और स्पृहा (कामना)—ये सब उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 13:
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥
हिन्दी अर्थ: हे कुरुनन्दन! तमोगुण के बढ़ने पर अंधकार (अप्रकाश), अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह—ये सब उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 14:
यदा सत्त्वे प्रलये याति कर्मसु प्रक्षयम्।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥
हिन्दी अर्थ: जब यह मनुष्य सत्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है।
श्लोक 15:
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥
हिन्दी अर्थ: रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में जन्म लेता है और उसी प्रकार तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य मूर्ख योनियों (कीड़े-पशु आदि) में जन्म लेता है।
श्लोक 16:
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्॥
हिन्दी अर्थ: श्रेष्ठ कर्म का सात्विक फल निर्मल (सुख रूप) कहा गया है, रजोगुण का फल दुःख है और तमोगुण का फल अज्ञान है।
श्लोक 17:
सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसः भवतोऽज्ञानमेव च॥
हिन्दी अर्थ: सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ उत्पन्न होता है और तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 18:
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥
हिन्दी अर्थ: सत्वगुण में स्थित पुरुष ऊंचे लोकों (स्वर्ग आदि) को जाते हैं, रजोगुण में स्थित पुरुष बीच में (मनुष्य लोक में) रहते हैं और तमोगुण के कार्य रूप निद्रा-आलस्य आदि में स्थित निकृष्ट पुरुष नीचे (नर्क या पशु योनियों) को जाते हैं।
श्लोक 19:
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भभावं सोऽधिगच्छति॥
हिन्दी अर्थ: जिस समय दृष्टा (विवेकशील पुरुष) तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से परे सच्चिदानंदघन परमात्मा को जानता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
श्लोक 20:
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देहदेहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखैविमुक्तोऽमृतमश्नुते॥
हिन्दी अर्थ: यह मनुष्य शरीर की उत्पत्ति के कारण इन तीनों गुणों को लाँघकर जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और सब दुखों से मुक्त होकर अमृत (परम आनंद) को प्राप्त होता है।
श्लोक 21:
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणांरतिवर्तते॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे प्रभो! इन तीनों गुणों को पार किया हुआ मनुष्य किन-किन लक्षणों से युक्त होता है, उसका आचरण कैसा होता है और वह इन तीनों गुणों को किस प्रकार लाँघता है?
श्लोक 22 - 25:
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकांचनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिंदात्मसंस्तुतिः॥
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारंभपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे अर्जुन! जो पुरुष सत्वगुण के कार्य रूप प्रकाश को, रजोगुण के कार्य रूप प्रवृत्ति को और तमोगुण के कार्य रूप मोह को आने पर उनसे द्वेष नहीं करता और न जाने पर उनकी आकांक्षा करता है; जो उदासीन की तरह स्थित रहता है और गुणों द्वारा विचलित नहीं होता, 'गुण ही गुणों में बरत रहे हैं' ऐसा समझकर जो स्थित रहता है और अपनी स्थिति से विचलित नहीं होता; जो सुख और दुःख में समान भाव वाला, अपने स्वरूप में स्थित, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण को समान समझने वाला, प्रिय और अप्रप्रिय को एक सा मानने वाला, धीर पुरुष, निंदा और अपनी स्तुति में समान रहने वाला है; जो मान और अपमान में समान है, मित्र और शत्रु के पक्ष में समान है और संपूर्ण आरंभों का त्यागी है—वह पुरुष 'गुणतीत' (गुणों को लाँघने वाला) कहा जाता है।
श्लोक 26:
मां च योऽव्यभिचारेंण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
हिन्दी अर्थ: और जो पुरुष मुझमें अनन्य भक्तियोग द्वारा निरंतर भजता है, वह इन तीनों गुणों को अच्छी प्रकार लाँघकर सच्चिदानंदघन ब्रह्म को प्राप्त होने के योग्य बनता है।
श्लोक 27:
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥
हिन्दी अर्थ: क्योंकि उस अविनाशी अमृत ब्रह्म की, सनातन धर्म की और अलौकिक सुख की प्रतिष्ठा (आश्रय) मैं ही हूँ।
अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोग (उत्तम पुरुष का योग) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोग
श्लोक 1:
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छंदांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—ऊँचे मूल वाला और नीचे शाखाओं वाला जिस संसार रूपी पीपल के वृक्ष को अविनाशी कहते हैं, और वेद जिसके पत्ते कहे गए हैं—जो मनुष्य इस वृक्ष को मूल सहित तत्त्व से जानता है, वही वेदों को जानने वाला है।
श्लोक 2:
अधश्चोर्ध्वं प्रस्तृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥
हिन्दी अर्थ: उस संसार रूपी वृक्ष की तीनों गुणों द्वारा बढ़ी हुई और विषयों को कोंपलों (पत्तियों) वाली नीचे और ऊपर सब ओर शाखाएँ फैली हुई हैं। तथा मनुष्य लोक में कर्मों के बंधन में बाँधने वाली जड़ें भी नीचे और ऊपर सब ओर फैली हुई हैं।
श्लोक 3 - 4:
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नातो न च आदिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम् असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥
हिन्दी अर्थ: इस संसार रूपी वृक्ष का रूप जैसा यहाँ देखने में आता है, वैसा अंत या आदि अथवा स्वरूप यहाँ नहीं पाया जाता। इसलिए इस मजबूत जड़ों वाले अश्वत्थ (पीपल) रूपी वृक्ष को दृढ़ असङ्ग (वैराग्य) रूपी शस्त्र से काटकर, उसके बाद उस परम पद को अच्छी प्रकार खोजना चाहिए, जहाँ गए हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते। और जिस आदि पुरुष से यह पुरानी संसार रूपी प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी की मैं शरण हूँ—ऐसा निश्चय करके उस पुरुष का ही भजन करना चाहिए।
श्लोक 5:
निर्माणमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैविमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययम् तत्॥
हिन्दी अर्थ: जो मान और मोह से रहित हैं, आसक्ति रूप दोष को जीत चुके हैं, जिनका अध्यात्म ज्ञान में नित्य स्वभाव है, जिनकी कामनाएँ सर्वथा निवृत्त हो गई हैं, जो सुख और दुःख नामक द्वंद्वों से मुक्त हैं, वे भ्रमरहित पुरुष उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 6:
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
हिन्दी अर्थ: उस परम पद को न तो सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चंद्रमा और न अग्नि ही। जहाँ जाकर मनुष्य वापस नहीं लौटते, वह मेरा परम धाम है।
श्लोक 7:
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
हिन्दी अर्थ: इस संसार में जीव रूप मेरी ही सनातन अंश (आत्मा) प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इंद्रियों को आकर्षित करता है।
श्लोक 8:
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहणैतान्यासंयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥
हिन्दी अर्थ: वायु जैसे गंध को स्थानों से ले जाता है, वैसे ही शरीर का स्वामी जीवात्मा जिस शरीर को प्राप्त होता है और जिससे उत्क्रमण (शरीर छोड़ता है) करता है, इन मन और इंद्रियों को ग्रहण करके फिर जाता है।
श्लोक 9:
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥
हिन्दी अर्थ: यह जीवात्मा कान, चर्म, नेत्र, जिह्वा और नासिका तथा मन को आश्रय करके विषयों का सेवन करता है।
श्लोक 10:
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥
हिन्दी अर्थ: शरीर को छोड़कर जाते हुए को, अथवा शरीर में स्थित हुए को, या विषयों को भोगते हुए को, अथवा तीनों गुणों से युक्त हुए को अज्ञानी जन नहीं जानते, किंतु ज्ञान रूप नेत्रों वाले ज्ञानी जन तत्त्व से जानते हैं।
श्लोक 11:
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यत्मानमवस्थिते।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥
हिन्दी अर्थ: प्रयत्न करने वाले योगी जन भी अपने अंतःकरण में स्थित इस आत्मा को तत्त्व से देखते हैं, किंतु जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानी जन प्रयत्न करने पर भी इस आत्मा को नहीं देखते।
श्लोक 12:
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥
हिन्दी अर्थ: सूर्य में जो तेज संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है, जो चंद्रमा में है और जो अग्नि में है—उस तेज को तू मेरा ही तेज जान।
श्लोक 13:
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥
हिन्दी अर्थ: और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से संपूर्ण प्राणियों को धारण करता हूँ तथा रस रूप अमृतमयी चंद्रमा होकर संपूर्ण औषधियुक्त वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ।
श्लोक 14:
अह वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमास्थितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥
हिन्दी अर्थ: मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला वैश्वानर (अग्नि) रूप होकर, प्राण और अपान से संयुक्त हुआ चार प्रकार के अन्न (भोजन) को पचाता हूँ।
श्लोक 15:
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तस्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥
हिन्दी अर्थ: और मैं ही सब प्राणियों के हृदय में विशेष रूप से स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (स्मृति का भ्रम दूर होना) होता है। सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ, वेदांत का रचयिता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ।
श्लोक 16:
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥
हिन्दी अर्थ: इस संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं—एक क्षर (नाशवान) और दूसरा अक्षर (अविनाशी)। संपूर्ण प्राणियों के शरीर तो क्षर हैं और विकार रहित जीवात्मा 'अक्षर' कहा जाता है।
श्लोक 17:
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥
हिन्दी अर्थ: इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो 'परमात्मा' इस नाम से कहा गया है। वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका पोषण करता है।
श्लोक 18:
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥
हिन्दी अर्थ: क्योंकि मैं नाशवान (क्षर) क्षेत्र से अतीत (श्रेष्ठ) हूँ और अविनाशी (अक्षर) जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिए संसार में और वेदों में 'पुरुषोत्तम' नाम से प्रसिद्ध हूँ।
श्लोक 19:
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! जो मनुष्य भ्रम रहित होकर इस प्रकार मुझ पुरुषोत्तम को तत्त्व से जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरंतर मुझको ही भजता है।
श्लोक 20:
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥
हिन्दी अर्थ: हे पापरहित अर्जुन! इस प्रकार यह अतिशय गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। इसे जो मनुष्य तत्त्व से समझ जाता है, वह बुद्धिमान हो जाता है और उसके सारे कर्तव्य पूरे हो जाते हैं।
अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवी और आसुरी संपदा का विभाग) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग
श्लोक 1 - 3:
श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—अभय, अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञान-योग के लिए स्थिति, दान, इंद्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय (वेदों का पठन), तप और सरलता; अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शांति, चुगली न करना, प्राणियों पर दया, लोभ का अभाव, नरमी, लज्जा और चंचलता का अभाव; तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, किसी से द्रोह न करना और अहंकार न होना—हे भारत! दैवी संपदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के ये लक्षण होते हैं।
श्लोक 4:
दंभो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम्॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! दंभ, गर्व, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान—ये आसुरी संपदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।
श्लोक 5:
दैवी संपद्विमोक्षाय निबंधायसुरी मता।
मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥
हिन्दी अर्थ: दैवी संपदा मुक्ति के लिए और आसुरी संपदा बांधने के लिए मानी गई है। हे अर्जुन! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी संपदा को लेकर उत्पन्न हुआ है।
श्लोक 6:
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैवत आसुर एव च।
दैवः विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु॥
हिन्दी अर्थ: इस लोक में प्राणियों की सृष्टि दो प्रकार की है—एक दैवी और दूसरी आसुरी। दैवी का विस्तारपूर्वक वर्णन किया जा चुका है, अब तू आसुरी संपदा को मुझसे सुन।
श्लोक 7:
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥
हिन्दी अर्थ: आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य यह नहीं जानते कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। उनमें न तो बाहर-भीतर की पवित्रता होती है, न आचार होता है और न सत्य ही होता है।
श्लोक 8:
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥
हिन्दी अर्थ: वे आसुरी मनुष्य कहते हैं कि यह जगत असत्य, बिना आधार के और बिना ईश्वर के है, जो केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है और जिसका काम (वासना) ही एकमात्र कारण है।
श्लोक 9:
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥
हिन्दी अर्थ: इस दृष्टि (विचार) को धारण करने वाले, नष्ट हुए स्वभाव वाले, मंदबुद्धि और उग्र कर्म करने वाले वे मनुष्य जगत के अहित के लिए शत्रु रूप में उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 10:
काममाश्रित्य दुष्पूरं दंभमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वाअसद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥
हिन्दी अर्थ: जो कभी न भरने वाली काम-कामना का आश्रय लेते हैं, दंभ, मान और मद से युक्त हैं, जो मोह के कारण बुरे संकल्पों को धारण करते हैं और भ्रष्ट आचरण करते हैं।
श्लोक 11 - 12:
चिंतामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥
आशाबशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान्॥
हिन्दी अर्थ: जो मृत्यु पर्यंत रहने वाली असीम चिंताओं का आश्रय लेते हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य केवल काम-भोगों को भोगना है और जो यही मानते हैं कि बस इतना ही सब कुछ है; जो सैकड़ों आशाओं के पाश में बंधे हैं तथा काम और क्रोध के परायण हैं, वे काम-भोग की प्राप्ति के लिए अन्यायपूर्वक धन का संचय करने की इच्छा रखते हैं।
श्लोक 13 - 15:
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥
असाउ मया हतः शत्रुरिहनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवानसुखी॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥
हिन्दी अर्थ: वे सोचते हैं—"आज मैंने यह धन प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूँगा। यह धन मेरे पास है और यह भविष्य में फिर मेरे पास होगा। यह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया है और अन्य शत्रुओं को भी मैं मार डालूँगा। मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही भोगी हूँ, मैं ही सिद्ध, बलवान और सुखी हूँ। मैं बहुत धनवान और ऊँचे कुल वाला हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनंद मनाऊँगा"—इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।
श्लोक 16:
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥
हिन्दी अर्थ: अनेक प्रकार की चिंताओं से भ्रमित, मोह के जाल से घिरे हुए और काम-भोगों में अत्यधिक आसक्त वे लोग अपवित्र नर्क में गिरते हैं।
श्लोक 17:
आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दंभेनाविधिपूर्वकम्॥
हिन्दी अर्थ: अपने को ही श्रेष्ठ मानने वाले, शठ, धन और मान के मद से युक्त वे मनुष्य दंभ के साथ और केवल नाम के लिए विधिहीन यज्ञ करते हैं।
श्लोक 18:
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥
हिन्दी अर्थ: अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध के आश्रय लेने वाले, वे ईर्ष्यालु मनुष्य अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित मुझ अंतर्यामी परमात्मा से द्वेष करने वाले होते हैं।
श्लोक 19:
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रं शुभांयोनिषू आसुरीष्बेव योनिषु॥
हिन्दी अर्थ: उन द्वेषी, क्रूर, पापियों और संसार में नीच मनुष्यों को मैं बार-बार आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ।
श्लोक 20:
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्ति अधमां गतिम्॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! वे मूढ़ मनुष्य जन्म-जन्म में आसुरी योनियों को प्राप्त होकर मुझको न प्राप्त हुए ही उससे भी अत्यंत नीच गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 21:
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
हिन्दी अर्थ: काम, क्रोध और लोभ—ये नरक के तीन द्वार आत्मा का नाश करने वाले हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
श्लोक 22:
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय त्ोद्वारैर्नरिः सुतः।
आचरत्यत्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त हुआ मनुष्य अपने कल्याण का आचरण करता है, जिससे वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 23:
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष शास्त्र की विधि को छोड़कर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है, न सुख को और न परम गति को ही।
श्लोक 24:
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
हिन्दी अर्थ: इसलिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए—इसके निर्णय में तेरे लिए शास्त्र ही प्रमाण है। शास्त्र की विधि से नियत किए हुए कर्म को ही तू इस संसार में करने योग्य है।
अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग (तीन प्रकार की श्रद्धा का विभाग) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग
श्लोक 1:
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमहो रजस्तमः॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र की विधि को छोड़कर केवल श्रद्धा से युक्त होकर पूजन करते हैं, उनकी निष्ठा किस प्रकार की होती है—सात्विक, राजसी या तामसी?
श्लोक 2:
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—मनुष्यों की वह स्वभाव से उत्पन्न होने वाली श्रद्धा तीन प्रकार की होती है—सात्विकी, राजसी और तामसी। उसे तू मुझसे सुन।
श्लोक 3:
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! सबके अंतःकरण की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है; इसलिए जैसी जिसकी श्रद्धा है, वह वैसा ही है।
श्लोक 4:
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥
हिन्दी अर्थ: सात्विक मनुष्य देवताओं को पूजते हैं, राजस मनुष्य यक्ष और राक्षसों को पूजते हैं, तथा अन्य तामस मनुष्य प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं।
श्लोक 5 - 6:
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दंभाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तां विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य दंभ और अहंकार से युक्त हैं तथा काम, राग और बल के अभिमान से प्रेरित हैं, जो शास्त्र की विधि से रहित भयानक तप को तपते हैं—वे शरीर में स्थित भूतों को और मेरे शरीर में स्थित अंतःकरण को सुखाने वाले अज्ञानी पुरुष आसुरी स्वभाव वाले हैं—ऐसा तू जान।
श्लोक 7:
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु॥
हिन्दी अर्थ: भोजन भी सबका तीन प्रकार का प्रिय होता है, वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस भेद को तू सुन।
श्लोक 8:
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥
हिन्दी अर्थ: आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने, स्थिर रहने वाले और हृदय को प्रिय लगने वाले आहार सात्विक स्वभाव वाले मनुष्यों को प्रिय होते हैं।
श्लोक 9:
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥
हिन्दी अर्थ: कड़वे, खट्टे, नमकीन, बहुत गर्म, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले आहार दुःख, शोक और रोगों को उत्पन्न करने वाले हैं तथा राजस मनुष्यों को प्रिय होते हैं।
श्लोक 10:
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥
हिन्दी अर्थ: जो भोजन पहले पका हुआ, रसहीन, सड़ा-गला, बासी, उच्छिष्ट (जूठा) और अपवित्र है, वह भोजन तामस मनुष्यों को प्रिय होता है।
श्लोक 11:
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इष्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥
हिन्दी अर्थ: जो यज्ञ फल की इच्छा से रहित पुरुषों द्वारा शास्त्र की विधि से किया जाता है और जिसमें 'यज्ञ करना ही कर्तव्य है' ऐसा मन का निश्चय होता है, वह सात्विक है।
श्लोक 12:
अभिसंधाय तु फलं दंभार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भारत श्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥
हिन्दी अर्थ: किंतु हे भारत! जो यज्ञ फल को चाहने वाले द्वारा और दंभ के लिए भी किया जाता है, उसे तू राजस यज्ञ जान।
श्लोक 13:
विधिहीनमसृष्टात्रममंत्रमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥
हिन्दी अर्थ: जो यज्ञ शास्त्र की विधि से रहित, बिना अन्न के बाँटे हुए, बिना मंत्र के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किया जाता है, उसे तामस यज्ञ कहते हैं।
श्लोक 14:
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥
हिन्दी अर्थ: देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा—यह शरीर संबंधी तप कहा जाता है।
श्लोक 15:
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
हिन्दी अर्थ: जो किसी को उद्वेग न देने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारी वचन है तथा जो वेदों का पठन-पाठन है—यह वाणी संबंधी तप कहा जाता है।
श्लोक 16:
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
हिन्दी अर्थ: मन की प्रसन्नता, शांत भाव, मन का निग्रह और अंतःकरण की पवित्रता—यह मन संबंधी तप कहा जाता है।
श्लोक 17:
त्रिविधं तपसैतन्नरैः फेर्लप्रेक्षुभिः।
श्रद्धया परया तप्तं तपः सात्त्विकं परिचक्षते॥
हिन्दी अर्थ: फल की इच्छा न रखने वाले पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से युक्त होकर किए गए इस तीन प्रकार के तप को सात्विक तप कहते हैं।
श्लोक 18:
सत्कारमानपूजार्थं तपों दंभेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥
हिन्दी अर्थ: जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा दंभ से किया जाता है, वह इस लोक में अनिश्चित और नाशवान राजस तप कहा गया है।
श्लोक 19:
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥
हिन्दी अर्थ: जो तप मूढ़तापूर्ण आग्रह से, अपने शरीर को पीड़ा देकर अथवा दूसरे का नाश करने के लिए किया जाता है, वह तामस तप कहा गया है।
श्लोक 20:
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥
हिन्दी अर्थ: जो दान उपकार न करने वाले देश, काल और पात्र को देखकर 'दान देना ही कर्तव्य है' इस भाव से दिया जाता है, वह दान सात्विक माना गया है।
श्लोक 21:
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥
हिन्दी अर्थ: किंतु जो दान प्रत्युपकार के उद्देश्य से अथवा फल को उद्देश्य करके और क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान राजस माना गया है।
श्लोक 22:
अशदेशकाल यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमअवज्ञातं तत्तामसमूदाहृतम्॥
हिन्दी अर्थ: जो दान बिना देश-काल के और बिना अपात्रों को अनादरपूर्वक सत्कार किए बिना दिया जाता है, वह तामस दान कहा गया है।
श्लोक 23:
ॐ तत्सदिдитесь निदेशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥
हिन्दी अर्थ: 'ॐ', 'तत्', 'सत्'—यह ब्रह्म का तीन प्रकार का नाम कहा गया है। उसी से सृष्टि के आदि में ब्राह्मण, वेद और यज्ञ रचे गए हैं।
श्लोक 24:
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥
हिन्दी अर्थ: इसलिए वेद को जानने वाले पुरुषों के यज्ञ, दान और तप रूप क्रियाएँ 'ॐ' इस अक्षर का उच्चारण करके ही शास्त्र की विधि के अनुसार सदा प्रवृत्त होती हैं।
श्लोक 25:
तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥
हिन्दी अर्थ: फल को बिना चाहे 'तत्' इस नाम का उच्चारण करके मोक्ष की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा विभिन्न यज्ञ, तप और दान की क्रियाएँ की जाती हैं।
श्लोक 26 - 27:
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥
हिन्दी अर्थ: 'सत्' इस शब्द का प्रयोग श्रेष्ठ भाव में और साधु भाव में किया जाता है। हे पार्थ! उत्तम कर्म में भी 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है। यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, उसे भी 'सत्' कहा जाता है और उस परमात्मा के निमित्त किया जाने वाला कर्म भी 'सत्' ही कहा जाता है।
श्लोक 28:
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान, तप और जो कुछ भी किया गया कर्म है, वह सब 'असत्' कहा जाता है। वह न तो इस लोक में फलदायक है और न परलोक में ही।
अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग (संन्यास द्वारा मोक्ष की प्राप्ति) +
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग
श्लोक 1:
अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।
त्यागम च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिकिषूदन! मैं संन्यास के तत्त्व को और त्याग के तत्त्व को अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
श्लोक 2:
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥
हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—काम्य कर्मों (इच्छाओं वाले कर्मों) का त्याग करना 'संन्यास' विद्वान लोग जानते हैं और संपूर्ण कर्मों के फल का त्याग करना 'त्याग' ऐसा बुद्धिमान पुरुष कहते हैं।
श्लोक 3:
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥
हिन्दी अर्थ: कई विचारवान पुरुष ऐसा कहते हैं कि कर्म दोषयुक्त है, इसलिए त्यागने के योग्य है और दूसरे विद्वान पुरुष यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप रूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं।
श्लोक 4:
तं शृणु मे तत्र त्यागे निर्णयं भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः॥
हिन्दी अर्थ: हे भारतश्रेष्ठ अर्जुन! उस त्याग के विषय में तू मेरा निर्णय सुन; क्योंकि हे पुरुषसिंह! त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।
श्लोक 5:
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥
हिन्दी अर्थ: यज्ञ, दान और तप रूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, बल्कि वे तो अवश्य करने योग्य हैं; क्योंकि यज्ञ, दान और तप—ये तीनों कर्म ज्ञानी पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं।
श्लोक 6:
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥
हिन्दी अर्थ: किंतु हे पार्थ! इन कर्मों को भी आसक्ति और फलों का त्याग करके करना चाहिए—यह मेरानिश्चित और उत्तम मत है।
श्लोक 7:
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥
हिन्दी अर्थ: नियत किए हुए कर्तव्य कर्म का स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं है। मोह के कारण उसका त्याग करना 'तामस त्याग' कहा गया है।
श्लोक 8:
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥
हिन्दी अर्थ: जो कुछ कर्म है, वह दुःख रूप है—ऐसा समझकर शारीरिक क्लेश के भय से जो कर्म का त्याग कर देता है, वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को नहीं पाता।
श्लोक 9:
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलंचैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! जो नियत कर्म केवल 'करने योग्य ही है' ऐसा समझकर आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है, वह सात्विक त्याग माना गया है।
श्लोक 10:
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यक्ती सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य अकुशल (अनिष्ट) कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल (इष्ट) कर्म में आसक्त नहीं होता, वह सात्विक गुणों से युक्त, बुद्धिमान और संशयरहित त्यागी पुरुष संशय से मुक्त रहता है।
श्लोक 11:
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥
हिन्दी अर्थ: शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा संपूर्ण रूप से कर्मों का त्याग किया जाना संभव नहीं है, किंतु जो मनुष्य कर्मों के फल का त्यागी है, वही 'त्यागी' ऐसा कहा जाता है।
श्लोक 12:
अनिष्टं इष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥
हिन्दी अर्थ: कर्मों का फल तीन प्रकार का होता है—अनिष्ट, इष्ट और मिश्र—जो कर्मों का त्याग नहीं करते, उन्हें मरने के बाद मिलता है, किंतु कर्मों का त्याग करने वाले संन्यासियों को कभी नहीं मिलता।
श्लोक 13:
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥
हिन्दी अर्थ: हे महाबाहो! संपूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिए सांख्य शास्त्र में जो पाँच कारण कहे गए हैं, उनको तू मुझसे जान।
श्लोक 14:
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥
हिन्दी अर्थ: इस शरीर में अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, विभिन्न प्रकार के करण (इंद्रियाँ), अलग-अलग प्रकार की चेष्टाएँ और पाँचवाँ दैव (भाग्य/अदृष्ट)—ये पाँच कर्मों के कारण हैं।
श्लोक 15:
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥
हिन्दी अर्थ: मनुष्य शरीर से, वाणी से और मन से जो भी उचित अथवा विपरीत (पाप) कर्म करता है, उसके ये पाँचों कारण होते हैं।
श्लोक 16:
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥
हिन्दी अर्थ: ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि होने के कारण केवल अपने आत्मा को कर्ता समझता है, वह दुर्बुद्धि मनुष्य तत्त्व को नहीं देखता।
श्लोक 17:
यस्य नांकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमान् लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥
हिन्दी अर्थ: जिसके मन में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा अहंकार नहीं है और जिसकी बुद्धि आसक्त नहीं होती, वह मनुष्य इन सब लोगों को मारकर भी वास्तव में न तो मारता है और न बंधता है।
श्लोक 18:
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञातत्रिविधः कर्मचोदनम्।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः॥
हिन्दी अर्थ: ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता—यह तीन प्रकार की कर्म की प्रेरणा है; और करण, कर्म और कर्ता—यह तीन प्रकार का कर्म का संग्रह है।
श्लोक 19:
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥
हिन्दी अर्थ: गुणों के भेद से ज्ञान, कर्म और कर्ता भी तीन प्रकार के ही कहे गए हैं—गुणों के शास्त्र में जैसा कहा गया है, उसे भी तू मुझसे अच्छी प्रकार सुन।
श्लोक 20:
सर्वभूतेषु येनैकमव्ययं वीक्षतेऽविकम्म्।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥
हिन्दी अर्थ: जिस ज्ञान से मनुष्य संपूर्ण भूतों में एक अविनाशी परमात्मा को समभाव से स्थित देखता है और कटा हुआ होने पर भी जो अविभक्त (अखंड) है, उस ज्ञान को तू सात्विक जान।
श्लोक 21:
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥
हिन्दी अर्थ: किंतु जो ज्ञान भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को संपूर्ण भूतों में अलग-अलग देखता है, उस ज्ञान को तू राजस जान।
श्लोक 22:
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहेतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥
हिन्दी अर्थ: और जो ज्ञान एक शरीर रूप कार्य में ही संपूर्ण शरीर के समान आसक्त रहता है तथा जो बिना कारण, तत्त्व से रहित और तुच्छ है, वह तामस ज्ञान कहा गया है।
श्लोक 23:
नियतं सङ्गसहमरअकामद्वेषतः कृतम्।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥
हिन्दी अर्थ: जो कर्म शास्त्र विधि से नियत किया हुआ है, जो कर्ता द्वारा आसक्ति, राग और द्वेष से रहित तथा फल को न चाहने वाले द्वारा किया गया है, वह सात्विक कहा जाता है।
श्लोक 24:
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः।
क्रियते बहुबाहुल्यं तद्राजसम्युदाहृतम्॥
हिन्दी अर्थ: किंतु जो कर्म बहुत परिश्रम करने वाले द्वारा, काम-कामना को चाहने वाले द्वारा और अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह राजस कहा गया है।
श्लोक 25:
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥
हिन्दी अर्थ: जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपने सामर्थ्य को न विचार कर केवल मोह के कारण आरंभ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।
श्लोक 26:
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्धयसिद्ध्योः समः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥
हिन्दी अर्थ: जो कर्ता आसक्ति से रहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा सिद्धि और असिद्धि में समान रहने वाला है, वह सात्विक कहा जाता है।
श्लोक 27:
रागी कर्मफलप्रेप्सुलुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥
हिन्दी अर्थ: जो आसक्ति से युक्त, कर्मों के फल को चाहने वाला, लोभी, दूसरों को कष्ट देने वाला, अपवित्र और हर्ष-शोक से युक्त है, वह राजस कर्ता कहा गया है।
श्लोक 28:
अयুক্তः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥
हिन्दी अर्थ: जो वश में न होने वाला, अयोग्य, घमंडी, धूर्त, दूसरों की जीविका छीनने वाला, आलसी, शोकी और लंबे समय तक काम टालने वाला है, वह तामस कर्ता कहा जाता है।
श्लोक 29:
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु।
प्रोच्यमानमशेषेन पृथक्त्वेन धनंजय॥
हिन्दी अर्थ: हे धनंजय! अब गुणों के अनुसार बुद्धि के और धैर्य के भी तीन प्रकार के भेदों को मुझसे विस्तारपूर्वक सुन।
श्लोक 30:
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बंधं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा सात्त्विकी पार्थ॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, करने योग्य और न करने योग्य कर्मों को, भय और अभय को, तथा बंधन और मोक्ष को तत्त्व से जानती है, वह बुद्धि सात्विकी है।
श्लोक 31:
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा राजसी पार्थ॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! जो बुद्धि धर्म और अधर्म को तथा करने योग्य और न करने योग्य कर्मों को यथार्थ रूप से नहीं जानती, वह बुद्धि राजसी है।
श्लोक 32:
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृताः।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा तामसी पार्थ॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! जो तमोगुण से ढँकी हुई बुद्धि अधर्म को ही 'धर्म है' ऐसा मानती है और संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मानती है, वह बुद्धि तामसी है।
श्लोक 33:
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा सात्त्विकी पार्थ॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! जिस अटूट धैर्य से मनुष्य मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को योग (भक्ति) के द्वारा धारण करता है, वह धैर्य सात्विक है।
श्लोक 34:
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्गेन फलाकांक्षी धृतिः सा राजसी पार्थ॥
हिन्दी अर्थ: किंतु हे अर्जुन! जिस फल की इच्छा से मनुष्य धर्म, अर्थ और काम को धारण करता है, हे पार्थ! वह धैर्य राजसी है।
श्लोक 35:
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा तामसी पार्थ॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! जिससे दुर्बुद्धि मनुष्य नींद, भय, शोक, विषाद और मद को नहीं छोड़ता, वह धैर्य तामसी है।
श्लोक 36:
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च गच्छति॥
हिन्दी अर्थ: हे भारतर्षभ! सुख भी तीन प्रकार का है, उसे मुझसे सुन। जिस सुख में मनुष्य अभ्यास से आनंदित होता है और दुखों के अंत को प्राप्त हो जाता है—
श्लोक 37:
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥
हिन्दी अर्थ: जो सुख पहले विष के समान प्रतीत होता है, किंतु परिणाम में अमृत के तुल्य है, वह आत्मबुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होने वाला सुख 'सात्विक' कहा गया है।
श्लोक 38:
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥
हिन्दी अर्थ: जो सुख विषयों और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले अमृत के तुल्य प्रतीत होता है, किंतु परिणाम में विष के समान है—वह सुख 'राजस' माना गया है।
श्लोक 39:
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥
हिन्दी अर्थ: जो सुख आरंभ में और परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, तथा जो नींद, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह सुख 'तामस' कहा गया है।
श्लोक 40:
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥
हिन्दी अर्थ: पृथ्वी पर या आकाश में देवताओं के बीच ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से मुक्त हो।
श्लोक 41:
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥
हिन्दी अर्थ: हे परंतप अर्जुन! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभाजित किए गए हैं।
श्लोक 42:
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥
हिन्दी अर्थ: अंतःकरण का शम (शांति), दम, तप, पवित्रता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिक्य (ईश्वर में श्रद्धा)—यह ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।
श्लोक 43:
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥
हिन्दी अर्थ: शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुराई, युद्ध में न भागना, दान देना और प्रभुता—यह क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
श्लोक 44:
कृषिगोपरिवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं च कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥
हिन्दी अर्थ: खेती, गो-पालन और व्यापार—यह वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं, तथा सेवा रूप कार्य शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है।
श्लोक 45:
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विंदति तच्छृणु॥
हिन्दी अर्थ: अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्पर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को प्राप्त होता है, उसे तू सुन।
श्लोक 46:
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विंदति मानवः॥
हिन्दी अर्थ: जिससे संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा उस ईश्वर की पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।
श्लोक 47:
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावकृतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥
हिन्दी अर्थ: अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए परधर्म से गुणहीन भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत किए हुए कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 48:
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वाम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! स्वभाव से उत्पन्न हुआ दोषयुक्त कर्म भी नहीं त्यागना चाहिए; क्योंकि जैसे अग्नि धुएँ से ढँकी रहती है, वैसे ही सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से ढँके रहते हैं।
श्लोक 49:
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेन अधिगच्छति॥
हिन्दी अर्थ: जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्ति रहित है, जो जीता हुआ मन और इंद्रियों वाला है तथा जो स्पृहा (कामना) रहित है, वह संन्यास योग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्य सिद्धि को प्राप्त होता है।
श्लोक 50:
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥
हिन्दी अर्थ: सिद्धि को प्राप्त हुआ पुरुष जिस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त होता है, उसे तू संक्षेप में मुझसे सुन—जो कि ज्ञान की परा (सर्वोच्च) निष्ठा है।
श्लोक 51 - 53:
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥
अहंकारं बलंचं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
हिन्दी अर्थ: विशुद्ध बुद्धि से युक्त, धैर्य के द्वारा मन को वश में करने वाला, शब्द आदि विषयों को त्यागकर राग और द्वेष को दूर करने वाला; एकांत स्थान में रहने वाला, कम खाने वाला, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला, ध्यान योग के परायण, वैराग्य का आश्रय लेने वाला; अहंकार, बल, गर्व, काम, क्रोध और परिग्रह को त्यागकर ममता रहित और शांत हुआ पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होने के योग्य बनता है।
श्लोक 54:
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥
हिन्दी अर्थ: ब्रह्म को प्राप्त हुआ, प्रसन्न चित्त वाला मनुष्य न तो किसी के लिए शोक करता है और न किसी की कामना करता है। वह संपूर्ण भूतों में समान भाव वाला होकर मेरी परा भक्ति को प्राप्त होता है।
श्लोक 55:
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
हिन्दी अर्थ: भक्ति के द्वारा ही वह मुझको तत्त्व से जानता है कि मैं कौन हूँ और कितना हूँ। इस प्रकार मुझको तत्त्व से जानकर वह तुरंत ही मुझमें प्रवेश कर जाता है।
श्लोक 56:
सर्वकर्मण्यपि सदा कुर्वाणो मद्याश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥
हिन्दी अर्थ: संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरे आश्रय में रहने वाला भक्त मेरी कृपा से सनातन और अविनाशी परम पद को प्राप्त होता है।
श्लोक 57:
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥
हिन्दी अर्थ: मन से संपूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर और बुद्धि योग का आश्रय लेकर तू निरंतर मुझमें चित्त वाला हो जा।
श्लोक 58:
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
हिन्दी अर्थ: मुझमें चित्त वाला होकर तू मेरी कृपा से संपूर्ण संकटों को आसानी से पार कर जाएगा; किंतु यदि अहंकार के कारण तू मेरे वचनों को नहीं सुनेगा, तो नष्ट हो जाएगा।
श्लोक 59:
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वामि योक्ष्यति॥
हिन्दी अर्थ: यदि तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मानता है कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा', तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है; क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे युद्ध में लगा देगा।
श्लोक 60:
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म द्वारा बंधा हुआ तू परवश होकर उसे करेगा।
श्लोक 61:
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि মায়या॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! शरीर रूप यंत्र पर सवार हुए संपूर्ण प्राणियों को अंतर्यामी ईश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार घुमाता हुआ सबके हृदय में स्थित है।
श्लोक 62:
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परं शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥
हिन्दी अर्थ: हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उसकी कृपा से ही तू परम शांति को और सनातन परम धाम को प्राप्त होगा।
श्लोक 63:
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥
हिन्दी अर्थ: इस प्रकार मैंने यह अतिशय गोपनीय से भी गोपनीय ज्ञान तुझसे कह दिया है। अब तू इस संपूर्ण रहस्य को अच्छी प्रकार विचार कर, जैसा चाहता है वैसा कर।
श्लोक 64:
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥
हिन्दी अर्थ: संपूर्ण गोपनियों से भी अति गोपनीय मेरे इस परम वचन को तू फिर सुन। तू मुझे अतिशय प्रिय है, इसलिए मैं तेरे हित के लिए इसे कह रहा हूँ।
श्लोक 65:
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥
हिन्दी अर्थ: मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर और मुझको नमस्कार कर। तू मुझको ही प्राप्त होगा—यह मैंतुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मेरा अतिशय प्रिय है।
श्लोक 66:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
हिन्दी अर्थ: संपूर्ण धर्मों (कर्तव्य कर्मों) को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वव्यापी परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त करूँगा, तू शोक मत कर।
श्लोक 67:
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥
हिन्दी अर्थ: तुझे इस गीता रूप रहस्य को कभी भी न तो तप रहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्तिहीन से, न सेवा न करने वाले से और न मुझमें दोष-दृष्टि रखने वाले से ही कहना चाहिए।
श्लोक 68:
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष मेरे भक्तों में इस परम गोपनीय गीता रहस्य को कहेगा, वह मुझमें परा भक्ति को प्राप्त होकर निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा।
श्लोक 69:
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥
हिन्दी अर्थ: मनुष्यों में ऐसा मेरा प्रिय कार्य करने वाला दूसरा कोई नहीं है और न भविष्य में पृथ्वी पर उससे बढ़कर मेरा कोई प्रिय दूसरा होगा।
श्लोक 70:
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥
हिन्दी अर्थ: और जो पुरुष हम दोनों के इस धर्मयुक्त संवाद को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञान रूप यज्ञ से पूजित होऊँगा—ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 71:
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँलोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य श्रद्धा से युक्त और दोष-दृष्टि से रहित होकर इस गीता को सुनता भी है, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होता है।
श्लोक 72:
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय॥
हिन्दी अर्थ: हे पार्थ! क्या इसे तूने एकाग्र चित्त से सुना? और हे धनंजय! क्या तेरा अज्ञान जनित मोह नष्ट हो गया है?
श्लोक 73:
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसंदेशः करिष्ये वचनं तव॥
हिन्दी अर्थ: अर्जुन बोले—हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति (तत्त्वज्ञान) प्राप्त हुई है। अब मैं संशय रहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।
श्लोक 74:
संजय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥
हिन्दी अर्थ: संजय बोले—इस प्रकार मैंने वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोम खड़े करने वाले संवाद को सुना।
श्लोक 75:
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥
हिन्दी अर्थ: व्यासजी की कृपा से मैंने इस परम गोपनीय योग को साक्षात् कहते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण से ही सुना है।
श्लोक 76:
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥
हिन्दी अर्थ: हे राजन्! श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस पवित्र और अद्भुत संवाद को बार-बार स्मरण करके मैं बहुत हर्षित हो रहा हूँ।
श्लोक 77:
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमभ्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान्राहन् हृष्यामि च पुनः पुनः॥
हिन्दी अर्थ: हे राजन्! श्रीहरि के उस अत्यंत अद्भुत रूप को बार-बार स्मरण करके मेरे मन में महान विस्मय होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
श्लोक 78:
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
हिन्दी अर्थ: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ हाथ में धनुष लिए हुए पाण्डव अर्जुन हैं, वहीं श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है—ऐसा मेरा मत है।
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