वास्तु प्रकरण - सम्पूर्ण डेटा सूची
गृहप्रवेश-मुहूर्त
गृहप्रवेश-मुहूर्त के सम्बन्ध में विचार करने से पूर्व गृहप्रवेश की परिभाषा को समझ लेना उचित है। सामान्य तौर पर गृहप्रवेश दो प्रकार का होता है - नूतन और जीर्ण, किंतु आचार्यों ने इसे तीन प्रकार का कहा है सपूरव, अपूरव और इंद्रा[cite: 1].
अपूर्वसंज्ञं प्रथमप्रवेशं, पत्रार्चसिनं च सपूरवमंज्ञम्। इन्द्रामयस्त्ववगभवदजंस्तस्तविष प्रवेशसतरिवधं प्रदष्टम् ॥[cite: 1]
अपूर्व: नूतन गृहप्रवेश को कहते हैं[cite: 1].
सपूरव: यद्द्वावै विजयोपरान्त राजाओं के राजभवन प्रवेश को कहते हैं[cite: 1].
अमयद: आपात्कालिक कारणों से पुराने भवन में वापस (प्रवेश) को कहते हैं[cite: 1].
आयन: नूतन गृहप्रवेश उत्तरायण सूर्य (मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृष, मिथुन राशियाँ) में, जीर्णद गृहप्रवेश उत्तरायण व दक्षिणायन की किसी भी स्थिति में होता है[cite: 1].
माह: नूतनगृह - वैशाख, ज्येष्ठ, फाल्गुन, माध (उत्तम); जीर्णगृह - श्रावण, मार्गशीर्ष, कार्तिक (मध्यम)[cite: 1]. क्षयमास, अधिकमास और खरमास सर्वदा वर्जित हैं[cite: 1].
पक्ष: शुक्ल पक्ष प्रशस्त है। कृष्ण पक्ष की दशमी तक ही ग्राह्य है[cite: 1].
पवित्रकरणम्
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥[cite: 1]
आचम्य
ॐ केशवाय नमः, ॐ माधवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः (आचमन करै) ॐॐॐ हृषिकेशाय नमः[cite: 1]
आसन शुद्धि
ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवा विष्णुना धृताः। त्वं च धारय मां देव पवित्रं कुरु चासनम्॥[cite: 1]
गणेश ध्यानम्
गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थजम्बू फलचारुभाक्षणम्। उमासुतं शोकविनाशकारणं नमाम्यविघ्नेश्वरपादपंकजम्॥[cite: 1]
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥[cite: 1]
भूमि स्पर्श
ॐ भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधवा विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री... (भूमि का स्पर्श कर सप्तधान्य रखें)[cite: 1].
कलश स्थापन एवं जल पूरण
वरुण कलश में जल, कश, गंध, सर्वोषधि, दूर्वा, आम्रपल्लव, फल, पंचरत्न, हिरण्य (सुवर्ण) डालकर कलश पर नारियल व दीपक स्थापित करें[cite: 1].
पुण्यῆहवाचनम् विधान
एक मटकी, ताँबे या चाँदी का कलश वरुण कलश के पास जल से भरकर स्थापित करें। ब्राह्मण वरण, संकल्प, और स्वस्ति-वाचन के साथ दीर्घायुष्य मंत्रों का उच्चारण करें[cite: 1].
आचार्य वरण संकल्प
अद्य विशेष विशिष्टयोः शुभ पुण्य तिथौ अमुक गोत्रः, अमुक शर्मी, अमुक कर्मणि सर्वाभ्युदय प्राप्तये आचार्यादि वरणम्[cite: 1].
अवघ्न पूजन विधि
एक मटकी के प्याले में चावल भरकर उसपर हल्दी से अष्टदल बनाकर उसपर एक सुपारी मौली से लपेटकर रखें और षड्वनायक (मुद, प्रमुद, सुमुख, दुर्मुख, अवघ्न, विघ्नहर्तृ) का आह्वान करें[cite: 1].
तोरण मात्रिका आवाहन
नन्दा, नन्दनीय, वशिष्ठ, वासुदेव, भार्गव, जय, और विजय - इन सात तोरण मात्रिकाओं (बन्दवार) का पूजन किया जाता है[cite: 1].
पंचगव्य विधि
गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, और घी - इन पाँचों चीज़ों को कुश के द्वारा मिलाकर मंडप तथा पूजा स्थल पर छिड़कने का विधान है[cite: 1].
षोडश मातृका नाम
1. गणेश, 2. गौरी, 3. पद्मा, 4. शची, 5. मेधा, 6. सावित्री, 7. विजया, 8. जया, 9. देवसेना, 10. स्वधा, 11. स्वाहा, 12. मातृ, 13. लोकमाता, 14. धृति, 15. पुष्टि, 16. तुष्टि और कुलदेवता[cite: 1].
सप्तस्थल मातृका
ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी, और चामुंडा - इनका सात खानों में आह्वान व पूजन होता है[cite: 1].
घृत मातृका श्लोक
शरीरलक्ष्म्यर्धतृमध्या स्वाहा प्रजन्य सरस्वती। मांगलिकेषु प्रपूज्यन्ते सप्तैता घृतमातरः॥[cite: 1]
आयुष्य मंत्र
ॐ यदः पशुवश्चरेद्देवः सप्तकल्पनां जीवुषै... शत-शरद तक दीर्घायु और आरोग्य प्राप्ति के लिए[cite: 1].
नन्दीमुख श्राद्ध नियम
न सवधेशर्मवरमृतं पत्ननाम च चोच्छरेत्। अस्मिच्छब्द न कुर्वीत श्राद्धं नन्दीमुखे क्वचित्॥[cite: 1]
चतुःषष्ठी योगिनी
महाकाल्यै नमः, महालक्ष्म्यै नमः, महासरस्वत्यै नमः तथा चौसठ योगिनी मंडलों का मण्डल पूजन[cite: 1].
नया घर या भूमि खरीदने और बसने से पूर्व उसकी भौगोलिक स्थिति, दिशा और आसपास के वातावरण का वास्तु के अनुसार विश्लेषण[cite: 1].
चौरस, आयताकार, गोमुख, सिंहमुख आदि भूखंडों के शुभ-अशुभ प्रभावों का विस्तृत वास्तु शास्त्र सम्मत वर्णन[cite: 1].
प्लॉट या जमीन का ढलान किस दिशा में होना चाहिए (जैसे ईशान कोण में ढलान शुभ) और किस दिशा में अशुभ, इसका पूरा विवरण[cite: 1].
किन स्थानों की भूमि त्याग देनी चाहिए, श्मशान के पास, कटी-फटी या दूषित मिट्टी वाली भूमि के निर्माण निषेध नियम[cite: 1].
मिट्टी का रंग, सुगंध, स्वाद और गड्ढा खोदकर पुनः भरने की प्राचीन विधियां जिनके द्वारा भूमि की गुणवत्ता जांची जाती है[cite: 1].
वास्तु पुरुष और भूमि पर नाग के सिर, पेट व पूंछ की स्थिति का मास अनुसार विचार, जिससे निर्माण कार्य में दोष न लगे[cite: 1].
गृह निर्माण, शिलान्यास और प्रवेश के लिए उत्तम संवत्सर, मास, वार, तिथि और चक्रशुद्धि का समय निर्धारण[cite: 1].
घर के मालिक (गृह स्वामी) के जन्म नक्षत्र और राशि के अनुसार बैठने, पूजा करने और प्रवेश करने की सही दिशा व स्थिति[cite: 1].
मुख्य प्रवेश द्वार (सिंहद्वार) की स्थिति, उसका आकार, लकड़ी का चयन और सकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश के नियम[cite: 1].
पदों (पदमों) के आधार पर वास्तु चक्र में मुख्य द्वार की स्थापना (जैसे जय, मुख्य, भल्लाट पद आदि)[cite: 1].
पूर्व, पश्चिम, उत्तर या दक्षिणमुखी घरों के लिए द्वार चयन के विशेष शास्त्रीय निर्देश और उनके फल[cite: 1].
साधारण और एकल परिवार के निवास के लिए कमरों, रसोई, और शयनकक्ष की सही दिशाओं का वास्तु विन्यास[cite: 1].
दो कमरों/शालाओं वाले घरों के निर्माण और उनके द्वारों की स्थिति का वास्तु के अनुसार समायोजन[cite: 1].
तीन शालाओं (3 BHK) वाले बड़े घरों के लेआउट, आलिंद और कमरों के विन्यास की वास्तु शास्त्रीय मार्गदर्शिका[cite: 1].
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