अथ सप्तमोध्याय
(पुराने छठे अध्याय के शेष शोक)
हरि ॐ उग्रश्च भीमश्च ध्वान्तश्च धुनिश्च।
सासह्वांश्चाभियुग्वा च विक्षिपः स्वाहा ॥१ ॥
अग्नि ठं हृदयेनाशनि ठं हृदयाग्रेण
पशुपतिं कृत्स्त्र हृदयेनभवं यक्ना।
शर्वम्मतस्त्राभ्या मीशानंमन्युना महादेवमन्तः
पर्शव्येनोग्रं देवं वनिष्ठना वसिष्ठहनुः
शिङ्गीनि कोश्याभ्याम् ॥२॥
-उग्रं लोहितेन मित्र ठं सौव्रत्येन रुद्रं
दौव्रत्ये नेन्द्रं प्रक्रीडेन मरुतो बलेन साध्यान्प्रमुदा ।
भवस्य कण्ठ्य ठरुद्रस्यान्तः पार्थ्यं महादेवस्य
यकृच्छर्वस्य वनिष्ठः पशुपतेः पुरीतत् ॥३ ॥
(नोट :- लोमभ्य से यमाय स्वाहान्तकाय........
इन चार श्रीकों का पाठ यहां शुभ नहीं माना जाता है,
अतः इनकी जगह निम्न पांच ऋचायें पढ़ें -
(लोकाचारानुसार करें)
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो....॥४ ॥ पयः पृथिव्यां.... ॥५ ॥ विष्णोरराटमसि..... ॥६ ॥ अग्निर्देवता वातो देवता... ॥७ ॥ द्यौः शांतिरन्तरिक्ष ठ शांति..... ॥८ ॥)
लोमभ्यः स्वाहा लोमभ्य स्वाहा, त्वचे स्वाहा त्वचे स्वाहा, लोहिताय स्वाहा, लोहितायस्वाहा, मेदोभ्यः स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा। मा सेभ्यः स्वाहा मा सेभ्यः स्वाहा, स्त्रावभ्यः स्वाहा स्त्रावभ्य स्वाहा, अस्थभ्यः स्वाहा अस्थभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा। रेतसे स्वाहा पायवे स्वाहा ॥४॥
आयासाय स्वाहा प्रायासाय स्वाहा संयायाय स्वाहा वियासाय स्वाहोद्यासाय स्वाहा। शुचे स्वाहा शोचते स्वाहा शोचमानाय स्वाहा शोकाय स्वाहा ॥५॥
तपसे स्वाहा तप्यते स्वाहा तप्यमानाय स्वाहा तप्ताय स्वाहा घर्माय स्वाहा। निष्कृत्यै स्वाहा प्रायश्चित्यै स्वाहा भेषजाय स्वाहा ॥६ ॥
यमाय स्वाहान्तकाय स्वाहा मृत्यवे स्वाहा। ब्रह्मणे स्वाहा ब्रह्महत्यायै स्वाहा विश्वेभ्योदेवेभ्यः स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या स्वाहा ॥७॥
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