स्थान-विचार
गृह-निर्माण के लिये प्रथमतः ग्राम एवं नगरादि स्थान का चयन एवं गृहकर्ता के लिये उसकी अनुकूलता पर विचार करना चाहिये। जिस नगर, ग्राम (मोहल्ला, कालोनी आदि) में गृह का निर्माण कराना हो, उसके नाम की राशि एवं गृहकर्ता के नाम की राशि का विचार करना चाहिये। स्थान की राशि गृहकर्त्ता के नाम की राशि से दूसरी, पाँचवीं, नवीं, दसवीं एवं ग्याहरवीं हो तो वह शुभ होती है। शेष राशियों वाले स्थान त्याज्य होते हैं-
नामर्शाद् द्विसुताङ्कदिग्भवगतो ग्रामः शुभो नान्यथा ।
इसी तथ्य को प्रकारान्तर से 'ज्योतिस्सागर' में इस प्रकार कहा गया है-
प्रथमे सप्तमे ग्रामे वैरं हानिस्त्रिषष्ठगे । तुर्याष्टद्वादशे रोगः शेषस्थाने शुभं भवेत् ॥
अपनी राशि से जिस ग्राम में बसने की इच्छा हो, उस ग्राम की राशि १,७ हो तो शत्रुता; ३,६ हो तो हानि और ४,८,१२ हो तो रोग होता है। शेष राशियाँ (२,५,९,१०,११) शुभ होती हैं। जैसे 'नीलसागर' नामक व्यक्ति 'गोरखपुर' नामक स्थान में बसना चाहता है। 'नौलसागर' की नाम-राशि वृश्चिक होगी एवं 'गोरखपुर' की कुम्भ होगी। वृश्चिक राशि से कुम्भ राशि चौथी है। अतः नीलसागर को गोरखपुर में बसने से रोग का कष्ट हो सकता है।
कुछ विद्वानों के मतानुसार ग्राम एवं गृहकर्त्ता की नाम-राशि यदि एक हो तो शुभ होता है-
स्वनाम्नस्तु राशेश्च यश्चैव राशिस्तदाद्वीपुरत्नेशदिक्सम्मितश्च ।
स वै शोभनो ग्राम नान्यः शुभश्च प्रकुर्याद् गृहं यत्पुरे सत्फलं च ।।
(गृहस्त्नविभूषण)
'मुहूर्त-रत्नाकर' के अनुसार ग्रामादि एवं गृहकर्ता के शुभाशुभत्व का विचार इस प्रकार किया जाता है। ग्रामादि के नामाक्षर की संख्या में ४ से गुणा करना चाहिये। गुणनफल में गृहकर्ता के नाम के अक्षरों की संख्या जोड़ कर ७ से भाग देना चाहिये। शेष १ हो तो पुत्र-लाभ, २ होने पर धन प्राप्ति, ३ होने पर व्यय, ४ होने पर आयु, ५ होने पर शत्रु-क्षय, ६ होने पर राज्य-लाभ एवं ७ होने पर मरण-भय प्राप्त होता है-
ग्रामनामाक्षरं ग्राह्यं चतुर्भिर्गुणयेत्ततः ।
नरनामाक्षरं योज्यं सप्तभिर्भागमाहरेत् ।। पुत्रलाभो धनप्राप्तिः व्ययः आयुः क्रमेण च ।
शत्रुनाशं राज्यलाभं निश्शेषे मरणं ध्रुवम् ।।
यथा ब्रह्मपुर स्थान में विश्वनाथ प्रसाद को गृह-निर्माण कराना है। स्थान के नाम में ४ अक्षर है। ४ में ४ का गुणा करने पर १६ होता है। गृहकर्ता के नाम में ७ अक्षर हैं, अतः १६ ७ = २३ होता है। २३ में ७ का भाग देने पर २ शेष बचता है। इस प्रकार विश्वनाथ प्रसाद के लिये ब्रह्मपुर स्थान धनप्राप्ति का परिणाम देने वाला है एवं आवास के लिये प्रशस्त है। इसी प्रकार वास्तु-ग्रन्थों में अन्य विधियाँ भी प्राप्त होती हैं।
No comments:
Post a Comment