गृह का मुख्य द्वार
गृह का प्रमुख प्रवेश-द्वार गृह का मुख होता है, अतः इसका विशेष महत्त्व होता है। इसकी स्थापना का सामान्य नियम यह है कि जिस दिशा में द्वार रखना हो, उसके ९ भाग करना चाहिये। भूमि भीतर मार्ग की ओर मुँह कर खड़ा होना चाहिये। दाहिनी ओर से ५ भाग एवं बायीं ओर से ३ भाग छोड़कर शेष भाग में द्वार की स्थापना करनी चाहिये-
नवभागं गृहं कृत्वा पञ्चभागं तु दक्षिणे ।
त्रिभागं वामतः कृत्वा शेषं द्वारं प्रकल्पयेत् ।।
(वास्तुसौख्य)
मुख्य-द्वार के स्थापना में कुछ विचारणीय तथ्य इस प्रकार हैं-
१. आवासीय गृह के मध्य भाग में प्रमुख द्वार नहीं होना चाहिये-
गृहमध्ये कृतं द्वारं द्रव्यधान्यविनाशनम् ।
(वास्तुसौख्य)
२. प्रमुख द्वार कोणों में नहीं करना चाहिये।
३. मुख्य द्वार स्थापित करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिये कि उससे वास्तुमण्डल की शिरायें एवं वंश (वास्तुमण्डल की रेखायें) तथा वास्तुमण्डल के मर्म-स्थल न विद्ध हों, साथ ही द्वार इस प्रकार न निर्मित हो, जिससे गृह की नाली द्वार के मध्य से प्रवाहित हो-
शिरामर्माणि वंशाश्च नालमध्यं च सर्वशः ।
विहाय वास्तुमध्यं च द्वाराणि विनिवेशयेत् ।।
(वास्तुसौख्य)
४. गृह के द्वार का अपने-आप उद्घाटन एवं अपने-आप बन्द होना अप्रशस्त होता है। इससे कुल का नाश सम्भव है-
उन्मादः स्वयमुद्घाटितेऽथ पिहिते स्वयं कुलविनाशः ।
(बृहत्संहिता)
इस श्रेणी में यन्व-चालित द्वारों को नहीं ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि यह कार्य स्वतः होता हुआ भी यन्त्र द्वारा संचालित होता है।
५. द्वार को नियमानुसार ही बनवाना चाहिये। अधिक बड़ा द्वार राज-कुल से भय एवं छोटा द्वार चोरों से भय प्रदान करता है-
मानाधिके नृपभयं दस्युभयं व्यसनमेव नीचे च ।
(बृहत्संहिता)
६. द्वार की आकृति प्रशस्त होनी चाहिये। मृदङ्ग की आकृति वाला, बीच में बहुत चौड़ा, कुबड़ा द्वार, द्वार पर चौखट का बहुत बोझ होना, भीतर की ओर झुका होना, बाहर की ओर निकला होना, सही दिशा का न होना आदि द्वार के निर्माण-गत दोष हैं-
आव्यात्तं क्षुद्भयदं कुब्जं कुलनाशनं भवति । पीडाकरमतिपीडितमन्तर्विनतं भवेदभावाय ।
बाह्यविनते प्रवासो दिग्भ्रान्ते दस्युभिः पीडा ।
(बृहत्संहिता)
७. जिस प्रकार प्रमुख द्वार की सज्जा हो, उस प्रकार अन्य द्वारों की सज्जा नहीं होनी चाहिये। गृह के मुख्य द्वार की सजावट कलश, श्रीफल, पत्र, सुन्दर स्त्री तथा अन्य सुन्दर आकृतियों से करनी चाहिये-
मूलद्वारं नान्यैद्वरैिरभिसन्दधीत रूपर्द्धर्धा। घटफलपत्रप्रमथादिभिश्च तन्मङ्गलैश्चिनुयात् ।।
(बृहत्संहिता)
८. मुख्य द्वार के सम्मुख जिनदेव (जैनियों के देवता) पीठ, रुद्र एवं सूर्य की प्रतिमा का साम्मुख्य, वासुदेव का वाम भाग एवं ब्रह्मा का दाहिना भाग नहीं पड़ना चाहिये-
वर्जयेदर्हतः पृष्ठं दृष्टिं चण्डीशसूर्ययोः ।
वामत्वं वासुदेवस्य दक्षिणं ब्रह्मणः पुनः ।॥
(वास्तुसौख्य)
९. एक द्वार के ठीक ऊपर दूसरा द्वार एवं अन्य के गृह के प्रमुख द्वार के सामने अपने गृह का मुख्य द्वार नहीं रखना चाहिये-
द्वारस्योपरि द्वारं द्वारं द्वारस्य सम्मुखम् ।
न कार्यं व्ययदं यस्माद् तद् गृहं न सुखावहम् ।।
(वास्तुसौख्य)
१०. प्रमुख द्वार के सम्मुख द्वार-वेध नहीं होना चाहिये। द्वार-वेध के कारण इस प्रकार है-राज-मार्ग, कोण, वृक्ष, स्तम्भ, कूप, कीचड़ या गन्दी नाली, देवता तथा ब्रह्म-वेध (ब्रह्मा अथवा किसी देवतुल्य मनुष्य की प्रतिमा)। किन्तु उपर्युक्त कारण द्वार के ऊँचाई की दुगुनी भूमि छोड़ कर स्थित हों तो उनसे द्वार-वेध का दोष नहीं होता-
मार्गतरुकोणकूपस्तम्भभ्रमविद्धमशुभदं द्वारम् ।
उच्छ्रायाद् द्विगुणमितां त्यक्त्वा भूमिं न दोषाय ।।
कूपेनापस्मारो भवति विनाशश्च देवताविद्धे ।
स्तम्भेन खीदोषाः कुलनाशो ब्राह्मणाऽभिमुखे ।।
(बृहत्संहिता)
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