मुख्य द्वार की दिशा
पूर्व द्वार
अनलभयं स्त्रीजन्म प्रभूतधनता नरेन्द्रवाल्लभ्यम् ।
क्रोधपरता नृपत्वं क्रौर्य चौर्य च पूर्वेण ॥
वास्तुपद - द्वार-फल
शिखी - अग्निभय
पर्जन्य - कन्याओं का जन्म
जयन्त - अत्यधिक धन
इन्द्र -- राजा से सम्मान
सूर्य - क्रोध
सत्य - नृपत्व की प्राप्ति
भृश - क्रूरता
आकाश - चोरी
दक्षिण द्वार
अल्पसुतत्वं प्रैष्यं नीचत्वं भक्ष्यपानसुतवृद्धिः ।
रौद्रं कृतघ्नमधनं सुतवीर्यघ्नं च याम्येन ।।
वास्तुपद - द्वार-फल
वायु - कम पुत्र
पूषा - दासता
वितथ - नीचता
गृहक्षत - भोजन, पान एवं पुत्र-वृद्धि
यम - भयानकता, अशुभता
गन्धर्व - कृतघ्नता
भृङ्गराज - धनहीनता
मृग - पुत्र एवं बल का नाश
पश्चिम द्वार
सुतपीडा रिपुवृद्धिर्न धनसुताप्तिः सुतार्थबलसम्पत् । धनसम्पन्नृपतिभयं धनक्षयो रोग इत्यपरे ।।
वास्तुपद - द्वार-फल
पितृ - पुत्र-कष्ट
दौवारिक - शत्रु-वृद्धि
सुग्रीव - धन एवं पुत्र की अप्राप्ति
पुष्पदन्त - पुत्र एवं धन की प्राप्ति
वरुण - धन-सम्पत्ति
असुर - राजभय
शोष - धन-नाश
पापयक्ष्मा - रोग-भय
उत्तर द्वार
वधबन्धो रिपुवृद्धिः सुतधनलाभः समस्तगुणसम्पत् । पुत्रधनाप्तिर्वैरं सुतेन दोषाः स्त्रिया नैः स्वम् ॥
वास्तुपद - द्वार-फल
रोग - वध एवं बन्धन
नाग - शत्रु-वृद्धि
मुख्य - पुत्र एवं धन का लाभ
भल्लाट - सभी प्रकार के गुण-सम्पत्ति
सोम - पुत्र एवं धन का लाभ
भुजग - पुत्र से वैर
अदिति - खियों में दोष
दिति - निर्धनता
इस प्रकार बृहत्संहिता में चारो दिशाओं के द्वार-फल वर्णित हैं। कहीं-कहीं कुछ द्वार-फलों के विषय में विद्वानों में मतभेद भी प्राप्त होते हैं।
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