Tuesday, July 14, 2026

मुख्य द्वार की दिशा 

पूर्व द्वार

अनलभयं स्त्रीजन्म प्रभूतधनता नरेन्द्रवाल्लभ्यम् ।

 क्रोधपरता नृपत्वं क्रौर्य चौर्य च पूर्वेण ॥

वास्तुपद  -   द्वार-फल

शिखी     -  अग्निभय

पर्जन्य    -  कन्याओं का जन्म

जयन्त    -  अत्यधिक धन

इन्द्र --    राजा से सम्मान

सूर्य      - क्रोध

सत्य   -  नृपत्व की प्राप्ति

भृश  -   क्रूरता

आकाश - चोरी

दक्षिण द्वार

अल्पसुतत्वं प्रैष्यं नीचत्वं भक्ष्यपानसुतवृद्धिः ।

 रौद्रं कृतघ्नमधनं सुतवीर्यघ्नं च याम्येन ।।


वास्तुपद - द्वार-फल

वायु - कम पुत्र

पूषा - दासता

वितथ - नीचता

गृहक्षत - भोजन, पान एवं पुत्र-वृद्धि

यम - भयानकता, अशुभता

गन्धर्व - कृतघ्नता

भृङ्गराज - धनहीनता

मृग - पुत्र एवं बल का नाश

पश्चिम द्वार

सुतपीडा रिपुवृद्धिर्न धनसुताप्तिः सुतार्थबलसम्पत् । धनसम्पन्नृपतिभयं धनक्षयो रोग इत्यपरे ।।

वास्तुपद - द्वार-फल

पितृ - पुत्र-कष्ट

दौवारिक - शत्रु-वृद्धि

सुग्रीव - धन एवं पुत्र की अप्राप्ति

पुष्पदन्त - पुत्र एवं धन की प्राप्ति

वरुण - धन-सम्पत्ति

असुर - राजभय

शोष - धन-नाश

पापयक्ष्मा - रोग-भय

उत्तर द्वार

वधबन्धो रिपुवृद्धिः सुतधनलाभः समस्तगुणसम्पत् । पुत्रधनाप्तिर्वैरं सुतेन दोषाः स्त्रिया नैः स्वम् ॥

वास्तुपद - द्वार-फल

रोग - वध एवं बन्धन

नाग - शत्रु-वृद्धि
मुख्य - पुत्र एवं धन का लाभ
भल्लाट - सभी प्रकार के गुण-सम्पत्ति
सोम - पुत्र एवं धन का लाभ
भुजग - पुत्र से वैर
अदिति - खियों में दोष
दिति - निर्धनता
इस प्रकार बृहत्संहिता में चारो दिशाओं के द्वार-फल वर्णित हैं। कहीं-कहीं कुछ द्वार-फलों के विषय में विद्वानों में मतभेद भी प्राप्त होते हैं।


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