मंगलीक दोष निवारण के कुछ बहुमूल्य सूत्र
उपरोक्त सभी सूत्रों को जब हम प्रत्येक कुण्डली पर घटित करेंगे तो 80 प्रतिशत जन्म कुण्डलीयां मंगल दोष वाली ही दिखलाई पड़ेंगी। इससे घबराने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि परवतों कारिकाओं में मगल दोष पारहार के इतने प्रमाण मिलते हैं कि इनमें से आधी से उपर कुण्डलीयां तो स्वतः ही परिहार वचनों से मंगल होते हुए भी मंगल दोष-रहित हो जाती हैं अर्थात् यदि पुरुष की कुण्डली में 1,4,7,8,12 भावों में शनि, राहु या सूर्य हो तो मंगल का मिलान हो जाता है। इसमें कुछ भी परेशानी नहीं है। सारी समस्याएं स्वतः ही समाप्त हो जाती है। उनमें से कुछ सूत्र इस प्रकार हैं-
अने लग्ने, व्यये चापे, पाताले वृश्चिके स्थिते।
वृषे जाये, घटे रन्धे, भौमदोषो न विद्यते ।॥1॥
मेष का मंगल लग्न में, धनु का द्वादश भाव में. वृश्चिक का चौथे भाव में. वृषभ का सप्तम में, कुम्भ का आठवें भाव में हो तो भौम दोष नहीं रहता।।।।।
नीचस्थो रिपुराशिस्थः खेटो मूलस्वतुंगामित्रस्था
भावविनाशकः । माववृद्धि करोत्यलम् ।।
- जातक पारिजात अतः स्य (18) मूल त्रिकोण, उच्च (10) मित्रस्थ (5,9,12) राति अर्थात् सूर्य, गुरु और चन्द्रक्षेत्री हो तो भौम का दोष नहीं रहता ।।2।।
अर्केन्द्रक्षेत्रजातानां, कुजदोषो न विद्यते।
स्वोच्चमित्रभजातानां तत् दोषो न भवेत् किल । ॥3॥
सिंह लग्न और कर्क लग्न में भी लग्नस्थ मंगल का दोष नहीं है। 3।।
शनिः भौमोऽथवा कश्चित्, पापो वा तादृशो भवेत्।
तेष्वेव भवनेष्वेव, भौमदोषविनाशकृत्।।4।।
शनि, मंगल अथवा कोई भी पाप ग्रह राहु, सूर्य, केतु अगर 1,4,7,8,12वें भवन में कन्या जातक के हों और उन्हीं भावों में वर के भी हों तो भौम दोष नष्ट होता है। मंगल के स्थान पर दूसरी कुण्डली में शनि या पांच ग्रहों में से एक भी हो, तो उस दोष को काटता है।।4।।
यामित्रे च यदा सौरिः लग्ने वा हिबुकेऽथवा ।
अष्टमे द्वावशे वापि भौमदोषविनाशकृत् ।।5।।
शनि यदि 1, 4, 7, 9, 12वें भाप में एक की कुण्डली में हो और दूसरे की कुण्डली में इन्हीं स्थानों में से एक किसी स्थान में मंगल हो तो भौम दोष नष्ट हो जाता है।।5।।
केन्द्र कोणे शुभोदये च, त्रिषडायेऽपि असद् ग्रहाः।
तदा भौमस्य वोषो न. मदने मदपस्तथा ॥6॥
3.6. 11वें भावों में अशुभ ग्रह हों और केन्द्र 1,4,7,10 व कोण 9.5 में शुभ ग्रह हो तथा सप्तमेश सातवें हो तो मंगल का दोष नहीं रहता।।611
सबले गुरौ भृगौ वा लग्गेऽपिवा अथवा भीमे।
वक्रिणि नीचगृहे वाऽर्कस्येऽपि वा न कुजदोषः ।॥7॥
गुरु व शनि बलवान हो, फिर भले ही 1.4.7.10 व कोण 9.5 में शुभ ग्रह हो तथा सप्तमेश सातवें हो तो मंगल का दोष नहीं होता।।7।।
वाचस्पतौ नवमपंचकेन्द्रसंस्थे,
जातांगना भवति पूर्णविभूतियुक्ता।
साध्वी, सुपुत्रजननी सुखिनी गुणढ्याः,
सप्ताष्टके यदि भवेदशुभ ग्रहोऽपि ।॥8।।
कन्या की कुण्डली में गुरु यदि 1.4,5,7,9, 10 भावों में मंगल हो, चाहे वक्री हो, चाहे नीच हो या सूर्य की राशि में स्थित हो, मंगलीक दोष नहीं लगता, अपितु उसके सुख-सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है।॥8॥
त्रिषट् एकावशे राहुः, त्रिषडेकादशे शनिः।
त्रिषडकादेश भौमः सर्वदोषविनाशकृत् 1911
3.6. 11वें भावों में राहु, मंगल या शनि में से कोई ग्रह दूसरी कुण्डली में हो तो भौम दोष नष्ट हो जाता है।।9।।
चन्द्र, गुरु या बुध से मंगल युति कर रहा हो तो भौम दोष नहीं रहता परन्तु इसमें चन्द्र व शुक्र का बल जरूर देखन चाहिए।।10।।
द्वितीय भौमदोषरतु कन्यामिथुनयोर्विना ।।11।।
द्वितीय भाव में बुध राशि (मिधुन व कन्या) का मंगल दोषकृत नहीं है। ऐसा वृषभ व सिंह लग्न में ही संभव है।।11।।
चतुर्थे कुजदोषः स्याद्, तुलावृषभयोर्विना ।।12।
चतुर्थ भाव में शुक्र राशि (वृषभ-तुला) का मंगल दोषकृत नहीं है। ऐसा कर्क और कुंभ लग्न में होगा।।12।।
अष्टमो भौगदोषस्तु धनुमीनद्वयोर्विना ।।13।।
अष्टम भाव में गुरु राशि (धनु-मोन) का मंगल दोषकृत नहीं है। ऐसा वृष लग्न और सिंह लग्न में होगा।13।
व्यये तु कुजदोषः स्यात्, कन्यामिथुनयोर्विना ।।14।।
बारहवें भाव में मंगल का दोष बुध, राशि (मिथुन, कन्या) में नहीं होगा। ऐसा कर्क लग्न और तुला लग्नों में होगा।।14।।
1.4.7.8.12 भावों में मंगल यदि चर राशि मेष, कर्क, मकर का हो तो कुछ दोष नहीं होता ।15।
दपत्योर्जन्मकाले, व्यय, धन हबुके, सप्तमे लग्नरन्ध्र,
लग्नाच्वंदाच्च शुक्रादपि भवति यदा भूमिपुत्रो द्वयोर्वै।
दम्पत्योः पुत्रप्राप्तिर्भवति भनपतिर्वग्पति दीर्घकालम्,
जीवेतामत्रयोगे न भवति मूर्तिरिति प्राहुरत्रादिमुख्याः ॥16॥
दम्पत्ति के 14.7.8.12वें स्थानों में मंगल जन्म से व शुक्र लग्न से हो दोनों के ऐसा होने पर वे दीर्घकाल तक जीवित रहकर पुत्र धनादि को प्राप्त करते हैं।11611
भौमेन सदृशो भौमः पापो वा तादृशो भवेत्।
विवाहः शुभवः प्रोक्ततिश्चरायुः पुत्रपौत्रदः ॥17॥
मंगल के जैसा ही मंगल व वैसा ही पाप ग्रह (सूर्य, शनि, राहु) के दूसरी कुण्डली में हो तो विवाह करना शुभ है।17।
कुजीजीवसमायुक्तो, युक्तले वा कुजचन्द्रमा।
चन्द्रे केन्द्रगते वापि, तप्त्य दोषो न मंगली ॥18॥
गुरु और मंगल की गुति हो या मंगल नन्द की युति हो या नन्द्र केन्द्रगत हो तो मंगलीक दोष नहीं होता।।18।।
न मंगली यस्य भृगुद्वितीये, न मंगली पश्यन्ति च जीवः ।॥19॥
शुक्र दूसरे घर में हो, या गुरु की दृष्टि मंगल पर हो गुरु मंगल के साथ हो, या मंगल राहु से युति हो या केन्द्रगत हां तो मंगली दोष नहीं होता।।।9।।
सप्तमस्यो यदा भौमो, गुरुणा च निरीक्षितः।
तवातु सवैसौख्यम् च. मंगलीदोषनाशकृत् । 20
सातवें भवन में यदि गुरु से देखा जाए तो मंगलीक दोष नष्ट करके सर्व सुख देता है। 12011
केतु का फल मंगलवत् होता है अतः अश्विनी, मघा मूल नक्षत्रों में मंगल हो तो भी मंगलीक दोष नहीं रहता है।
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