नन्दिकेश्वरस्तोत्रम्
भवेशं भवेशानमीड्यं सुरेशं
विभुं विश्वनाथं भवानीसमाद्यम् ।
शरच्चन्द्रगात्रं सुघापूर्णनेत्रं
भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥ १॥
हिमाद्रौ निवासं स्फुरच्चन्द्रचूडं
विभूतिं दधानं महानीलकण्ठम् ।
प्रभुं दिग्भुजं शूलटङ्कायुधाढ्यं
भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥ २॥
भवेशं गजेशं प्रपन्नार्तिनाशं
विभास्वत्समुद्यत्प्रभाकान्तिपूरम् ।
भवानीयुतार्धाङ्गशोभाभिरामं
भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥ ३॥
मृगाङ्कायुतप्रक्षदीप्तिप्रकाशं
ज्वलद्वह्निकेशं शशाङ्कार्धभालम् ।
सदा भक्तचित्ते स्फुरन्मोदरूपं
भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥ ४॥
वराभीतिहस्तं कुठारेशपाणिं
जटाजूटगगङ्गोल्लसद्वारिधारम् ।
विषाशं महोक्षाधिरूढ मदारिं
भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥ ५॥
जगत्या विभूषं मृगेन्द्राजिनधृत्
षडाम्नायमन्त्रप्रसिद्धार्थमूलम् ।
प्रसादादि मन्त्रस्फुरज्ज्ञानहेतुं
भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥ ६॥
भवानीपदाम्भोजहृत्पद्मसंस्थं
सुरेन्द्रादि देवैः सदा सेव्यमानम् ।
नगेन्द्रात्मजाप्राणनाथं शरण्यं
भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥ ७॥
भवे नन्दीशानं सकलमनुसिद्ध्यैककरणं
वसु-श्लोकैरेभिः प्रतिदिनमपि स्तौति नित्यम् ।
तदैवेश-प्रीत्या निखिलसुखभागीह जगति
परं मोक्षं चान्ते परमपदमाप्नोति सहसा ॥ ८॥
इति नन्दिकेश्वरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
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