गृहप्रवेश मुहूर्त
गृहप्रवेश-मुहर्त के सम्बन्ध में विचार करने से पूर्व गृहप्रवेश की परिभाषा को समझ लेना उचित है। सामान्य तौर पर गुहप्रवेश दो प्रकार का होता है- नूतन और जीर्ण किन्तु आचार्यों ने इसे तीन प्रकार का कहा है सपूर्व, अपूर्व और इन्द्र।
गृहप्रवेश में विचारणीय बातें
अपूर्वसंज्ञः प्रथमः प्रवेशो, पात्राचसाने च सपूर्वमंज्ञः। इन्द्रामयस्त्वग्निभवादिजातस्त्वेषं प्रवेशस्त्रिविधः प्रदिष्टः ॥
अपूर्व - नूतन गृहप्रवेश को कहते हैं।
सपूर्व -युद्धावि विजयोपरान्त राजाओं के राजभवन प्रवेश को कहते हैं।
अम्यादि- आपात कालिक कारणों से पुराने भवन में वापसी (प्रवेश) को कहते है।
यात्राचिवृत्तौ शुभदं प्रवेशनं मद्-अवैः क्षिप्त-चरैः पुनर्गमः। द्वीशेऽनले दारुणभे तथोग्रभे खीगेहपुत्रात्मविनाशनं क्रमात् ॥
सौम्याचने ज्येष्ठतपोऽन्त्यमाधवे वात्राविवृत्ती नपतेर्नवे महे। स्थाद्वेशनं द्वाःस्थमूदनुवोडुभिर्जन्मक्षंलग्नोपचयोदये स्थिरे ॥ (मु. वि. १३-१)
जीर्ण गृहेऽम्यादिभवान्नवेऽ मागर्जियोः बावणिकेपि सन्स्यात् । वेशो ऽम्बुपेज्यानिलवासवेषु नाऽऽवश्वमस्तादिविचारणाऽत्र ॥ (मु. चि. १३-२)
आयन - नूतन गृहप्रवेश उत्तरायण सूर्व (मक्कर, कुम्भ, मीन, मेष, वृष, मिथुन राशियों) जीर्णादि गृहप्रवेश उत्तरायण वा दक्षिणायण किसी भी स्थिति में होता है।
माह-
नुतनगृहे -वैशाख, ज्येष्ठ, फाल्गुन, माध -उत्तम
जीर्णगृहे -श्रावण, मार्गशीर्ष, कार्तिक - मध्यम
क्षयमास, अधिकमास और खरमास भी सर्वदा वर्जित है।
पक्ष - शुक्ल पक्ष प्रशस्त है। कृष्ण पक्ष की दशमी तक ही ग्राह्य है। किचित मत से कृष्णपक्ष नूत्तन गृहप्रवेश में ग्राह्य नहीं है।
तिथि -पूर्णा तिथी प्राग्वदने गृहे शुभो नन्दादिके वाम्वजलोत्तरानने । (मु. चि. १३-५)
द्वारदिशानुसार भी प्रवेश तिथि का संकेत मिलता है।
पूर्व द्वार हो तो -पूर्णा ,पंचमी, दशमी, पूर्णिमा
दक्षिण द्वार हो तो -प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी
पश्चिम द्वार हो तो -भत्रा द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी
उत्तर द्वार हो तो तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी
नक्षत्र -
ध्रुव (स्थिर) संज्ञक
रोहिणी, उत्तराफाल्गुन, उत्तराषाढ़, उत्तरभाद्र
मृदु (मैत्र) संज्ञक - मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, रेवती
क्षिप्र (लघु) संज्ञक - अश्विनी, पुष्य, हस्त, अभिजित
चर (चल) संज्ञक - पुनर्वसु, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा
धनिष्ठा, शतभिषा, पुष्य, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, रेवती इन नक्षत्रों में पुराने मकानमें प्रवेश करें।
वार
सोमनार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, और शनिवार शुभ दिन माने गए हैं।
आदित्य भीम वांरतु सर्वे वाराः शुभानहाः ।
केचिच्छनि प्रशंसंति चौरभीतिस्तु जायते ॥
मंगलवार और रविवार को कभी भी भूमिपूजन, गृह निर्माण, शिलान्यास या गृहप्रवेश की शुरवात नहीं करना चाहिए। परंतु शनिवार में करने से चोरों का भव होता है।
वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुम्भउत्तम (स्थिर लग्न)
मध्यम (चर लग्न)
मिथुन, कन्या, धनु, मीन
गृहस्वामी के जन्म लग्न से ३, १०, ११ राशि लग्न अतिशुभ है।
लग्नशुद्धि
लम्मशुद्धि से तात्पर्य है कि जिस लग्न में प्रवेश करना है वहाँ से गणना करने पर १,२,३,५,७,९,१०,११ स्थानों में शुभग्रह, एवं ३,६,११ स्थानों में पापग्रह, तथा ४,८ शुभाशुभ रहित यानी पूर्ण रिक्त होना चाहिए।
चन्द्रशुद्धि
किसी भी शुभकार्य में स्वामी (कार्यकर्ता) की नाम राशि के अनुसार कार्य दिवसीय चन्द्रमा की स्थिति का विचार कर लेना चाहिए ।
नाम राशि से चौथे, आठवें चन्द्रमा सदा अशुभ फलदायी होते हैं।
बारहवें होने पर पूजित होकर शुभ हो जाते हैं
शेष स्थानों पर शुभफलदावी कहे गये हैं।
वामरवि विचार
वामोरविर्मृत्युसुतार्थलाभतोऽके पञ्चभे प्राग्वदनादिमन्दिरे। (मु. चि. १३-५)
गृहप्रवेश के लिए चयनित लग्न से तात्कालिक सूर्व स्थिति की गणना करके वामरवि की जानकारी की जाती है। जो प्रवेशकार्य में अतिशुभ माना गया है।
पूर्वमुख गृह के लिए लग्न से ८,९,१०,११,१२ वें स्थान में सूर्व हो तो शुभ होगा।
दक्षिणमुख गृह के लिए लग्न से ५,६,७,८,९ वें स्थान में सूर्य होने पर शुभ होगा।
पश्चिममुख गृह के लिए लग्न से २,३,४,५,६ वें स्थान पर सूर्य होने पर शुभ होगा।
उत्तरमुख गृह के लिए लग्न से ११,१२,१,२,३ वें स्थान पर सूर्व होने पर शुभ होगा।
जीर्ण गृहप्रवेश मुहूर्त
इस सम्बन्ध में विशेष बात यह है कि दक्षिणायन सूर्य में भी हो सकता है, तथा इसमें गुरु-शुक्रादि ग्रहों के उदयास्त का विचार अनिवार्य नहीं है।
कुम्भचक्रशुद्धि
वक्त्रे भू रविभात् प्रवेशसमये कुम्भेऽग्निदाहः कृता, प्राच्यामुडूसने कृता यमगता लाभः कृताः पश्चिमे ।
श्रीर्वेदाः कलिरुत्तरे युगमिता गर्ने विनाशो गुदे, रामः स्वैर्वमतः स्थिरत्वमनलाः कण्ठे भवेत् सर्वदा ॥ (मु.चि.वा.प्र.६)
इसकी अनिवार्यता सर्वोपरि है, यानी अन्यान्य सारी स्थितियाँ शुद्ध होने पर भी इसकी अशुद्धि रहने पर गृहप्रवेश कार्य नहीं करना चाहिए। इस चक्र की परीक्षा हेतु चयनित काल के सूर्य नक्षत्र से चयनित काल के चन्द्र नक्षत्र तक की गणना की जाती है एक कलश की आकृति में सभी नक्षत्रों को क्रमवार सजा करा प्रथम पांच के परिणाम अशुभ, पुनः आठ के परिणाम शुभ, पुनः आठ के परिणाम अशुभ और अन्तिम छः के परिणाम शुभ कहे गये हैं। इसकी स्पष्टी हेतु आगे दिये गये चक्र का अवलोकन करें।
शेषशिरोज्ञानम्
भाद्रत्रये शिरः प्राच्यां याम्यां मार्गत्रये शिरः।
फाल्गुनत्रितये पश्चात् शिरो ज्येष्ठत्रये ह्युदक् ।।
भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक इन तीन महीनोंमें पूर्व दिशामें, मार्गशीर्ष, पौष, माघ ये तीन महीनों में दक्षिण दिशा में
फागुन, चैत्र, वैशाख इन तीन महीनों में पश्चिम दिशा में और जेठ, आषाढ, और श्रावण इन तीन महीनों में शेष नाग का सिर उत्तर दिशा में रहता है।
नवे घर में प्रवेश करने के पहले वास्तु शान्ति करनी चाहिए इसे ही गृहप्रवेश कहते है।
कुछ शास्त्रों में घर के बाहर मण्डप बनाकर सारी प्रक्रिया पूरी करने के उपरान्त गृहप्रवेश की विधि लिखी है।
वृहद् वास्तुमाला के अनुसार घर के अन्दर वास्तु शांति की विधि लिखी है।
आजकल बिल्डीगों की अधिकता होने के कारण घर के भीतर ही सारी पूजाएँ होती है।
इस पद्धति में घर के अन्दर की विधि लिखी है।
मण्डप और घर के अन्दर में मात्र इतना ही अन्तर है कि मंडप में भूमि पूजन, मंडपाच्छादन, स्तम्भ पूजन आदि करने के बाद वास्तु शान्ति की जाती है।
घर के अन्दर करने पर मंडप निर्माण की प्रक्रिया नहीं होती वास्तु शान्ति में कोई अन्तर नहीं है।
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