त्रिशाल गृह / 3BHK
तीन कक्षों से निर्मित भवन को त्रिशाल गृह कहते हैं। कक्षों की स्थिति के अनुसार त्रिशाल गृह के भेद इस प्रकार वर्णित है-
हिरण्यनाभ- इस गृह में उत्तर दिशा में कक्ष नहीं होता तथा यह गृह आवास की दृष्टि से प्रशस्त होता है-
उत्तरशालाहीनं हिरण्यनाभं त्रिशालकं धन्यम् ।
(बृहत्संहिता)
सुक्षेत्र- इस गृह में पूर्व दिशा में कक्ष की स्थिति नहीं होती है। यह गृह गृहस्वामी को वृद्धि प्रदान करता है-
प्राक्शालया वियुक्तं सुक्षेत्रं वृद्धिदं वास्तुम् ।
(बृहत्संहिता)
चुल्ली-इस गृह में दक्षिण दिशा में कक्ष नहीं होता है। यह गृह धन की हानि करता है, अतः यह प्रशस्त नहीं है-
याम्याहीनं चुल्ली त्रिशालकं वित्तनाशकरमेतत् ।
(बृहत्संहिता)
पक्षघ्न-पश्चिम दिशा में कक्ष-विहीन यह गृह पुत्र-नाश एवं वैर का कारण बनता है। अतः यह त्याज्य है-
पक्षघ्नमपरया वर्जितं सुतध्वंसवैरकरम् ।
(बृहत्संहिता)
इस प्रकार उपर्युक्त भेदों में हिरण्यनाभ एवं सुक्षेत्र आवास की दृष्टि से प्रशस्त तथा चुल्ली एवं पक्षघ्न अप्रशस्त है। इनमें भी अलिन्द, मण्डप एवं तल आदि की दृष्टि से अनेक भेद बनते हैं।

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