Tuesday, July 14, 2026

भूमि-परीक्षा

 भू-परीक्षण की कई विधियाँ है, किन्तु सर्वाधिक प्रचलित विधि जल एवं मृत्तिका परीक्षा है।

जलपरीक्षा-भूमि में एक हाथ लम्बा, चौड़ा एवं गहरा गड्डा खोदना चाहिये।

उस गड्ढे में जल भरकर उससे कुछ कदम, लगभग १०० कदम दूर जाकर पुनः उस गड्ढे के पास जाना चाहिये। यदि गड्ढा जल से भरा हो तो गृह-निर्माण के लिये भूमि उत्तम, चौथाई जल सूख जाय तो मध्यम एवं गड्डा आधे जल से युक्त हो तो भूमि गृह-निर्माण के लिये अनुपयुक्त होती है।

श्वभ्रमथवाम्बुपूर्ण पदशतमित्वा गर्तस्य यदि नोनम् । 

तद्धन्यं यश्च भवेत्पलानि यां स्वाटकं चतुष्यष्टिः ॥

(वास्तुसौख्य)

जल-परीक्षा की दूसरी विधि के अनुसार सूर्यास्त के समय पूर्वोक्त माप का गड्डा खोद कर जल से भरना चाहिये। दूसरे दिन प्रातःकाल गड्डा देखना चाहिये। यदि गड्ढे में जल बचा रहे तो भूमि प्रशस्त, जल न रहे किन्तु मिड्डी गीली रहे तो मध्यम एवं गड्ढे में यदि दरारें पड़ी हों तो भूमि गृह-निर्माण के लिये उपयुक्त नहीं होती है-

श्वभ्रे हस्तमितं खनेदिह जलं पूर्ण निशास्ये न्यसेत् ।
 प्रातर्दृष्टजलं स्थलं सदजलं मध्यं त्वसत्स्फाटितम् ॥
(वास्तुप्रबोध)

मृत्तिका परीक्षा-पूर्वोक्त माप के गड्ढे से निकली मिट्टी से पुनः गड्ढे को भरना चाहिये। यदि गड्डा भरने के पश्चात् मिट्टी बच जाय तो भूमि गृह-निर्माण के लिये उत्तम, यदि पूरी मिट्टी गड्ढे में समा जाय तो भूमि सामान्य एवं मिट्टी कम पड़े तो वह भूमि गृह-निर्माण के योग्य नहीं होती है-
गृहमध्ये हस्तमितं खात्वा परिपूरितं पुनः श्वभ्रम् । 
यथूनमनिष्टं तत्समे समं धन्यमधिकं यत् ॥
(वास्तुसौख्य)

इन दो विधियों के अतिरिक्त भी भू-परीक्षण की विधियों हैं, जो इस प्रकार है-
स्वरपरीक्षा- यदि आघात करने पर भूमि से गम्भीर स्वर उत्पन्न हो तो वह भूमि
ठोस होती है एवं गृह निर्माण के लिये उपयुक्त होती है। 
भूमि से उत्पन्न स्वर की तुलना मृदङ्ग, वल्लकी, वेणु, दुन्दुभी, हाथी, अश्व अथवा समुद्र के गर्जन के साथ की गई है-
मृदङ्गवल्लकीवेणुदुन्दुभीनां समा ध्वनौ । 
द्विपाश्चाब्धिसमस्वाना चेति स्युर्भूमयः शुभाः ॥
(समराङ्गणसूत्रधार, १००५१)

स्पर्शपरीक्षा- जो भूमि ग्रीष्म काल में शीतल, शीत काल में उष्ण एवं वर्षां ऋतु में शीतोष्ण होती है, वह भूमि गृह-निर्माण के लिये प्रशस्त होती है-
धर्मागमे हिमस्पर्शा या स्यादुष्णा हिमागमे । 
प्रावृष्युष्णहिमस्पर्शा सा प्रशस्ता वसुन्धरा ।।
(समराङ्गणसूत्रधार, १०/५०)

पुष्पपरीक्षा- भूमि पर खोदे गये गर्त में श्वेत, रक्त, पीत एवं कृष्ण वर्ण का पुष्प रात्रि में डाल देना चाहिये। प्रातःकाल जिस वर्ण का पुष्प सबसे अधिक प्रफुल्लित दिखाई पड़े, उस वर्ण के मनुष्य के लिये वह भूमि सर्वाधिक उपयुक्त होती है। इस विधि का वर्णन 'समराङ्गणसूत्रधार' एवं 'बृहत्संहिता' दोनों में प्राप्त होता है। वराहमिहिर के अनुसार-
श्वभ्रोषितं न कुसुमं यस्मिन् प्रम्लायतेऽनुवर्णसमम् ।
 तत्तस्य भवति शुभदं यस्य च यस्मिन्मनो रमते ।।
(बृहत्संहिता)

दीपपरीक्षा-इस विधि का वर्णन मत्स्यपुराण, विष्णुधर्मोत्तर पुराण तथासमराङ्गणसूत्रधार आदि ग्रन्थों में प्राप्त होता है। भूमि में एक हाथ का गर्त खोद कर चार दिशाओं में मिट्टी के दीपक में चार बत्तियाँ जलानी चाहिये। यदि सभी दिशाओं के दीप देर तक जलते रहें तो वह भूमि सभी वर्गों के लिये उपयुक्त होती है, अन्यथा जिस दिशा की बत्ती देर तक जले, उस वर्ण के लिये वह भूमि अधिक प्रशस्त होती है। मत्स्य-पुराण में पूर्व से प्रारम्भ कर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र की दिशा ग्रहण की गई है; जबकि समराङ्गणसूत्रधार में उत्तर दिशा से ब्राह्मणादि का क्रम लिया गया है-
पूर्वादिं गृह्णीयाद् वर्णानामानुपूर्वशः ।
(मत्स्यपुराण, २५३।१५)
खातस्योदक्प्रभृतिषु दिक्षु प्रज्वालयीत वा। 
दीपान् यस्यां चिरं तिष्ठेत् तद्वर्णेष्टप्रदा हि सा ।।
(समराङ्गणसूत्रधार, १००७४)

पुष्प एवं दीपपरीक्षा शकुन की दृष्टि से भूमिपरीक्षा है।

बीजपरीक्षा- भूमि-परीक्षा की यह विधि मत्स्यपुराण में प्राप्त होती है। भूमि पर हल चला कर सभी प्रकार के बीज बो देना चाहिये। यदि बीज ३ रात में उगे तो भूमि उत्तम, पाँच रात में उगे तो मध्यम एवं सात रात में उगे तो कनिष्ठ होती है। इनसे इतर भूमि त्याज्य होती है-
त्रिपञ्चसप्तरात्रे च यत्रारोहन्ति तान्यपि ।
 ज्येष्ठोत्तमा कनिष्ठा भूर्वर्जनीयतरा सदा ।।
(मत्स्यपुराण, २५२११८)

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