Tuesday, July 14, 2026

द्विशाल गृह / 2BHK



यह गृह दो कक्षों के संयोग से निर्मित होता है। कक्षों की स्थिति के अनुसार इनका नामकरण इस प्रकार किया गया है-

सिद्धार्थ-  इस द्विशाल गृह में एक कक्ष पश्चिम एवं एक कक्ष दक्षिण दिशा में होता है- सिद्धार्थमपरयाम्ये ।

यह गृह गृहस्वामी को अर्थ प्रदान करता है, इसलिये यह प्रशस्त है- सिद्धार्थेऽर्थावाप्तिः ।

यमसूर्य-इस द्विशाल गृह में एक कक्ष पश्चिम एवं दूसरा उत्तर दिशा में होता है- यमसूर्य पश्चिमोत्तरे शाले ।इस गृह का फल गृहस्वामी की मृत्यु है, अतः यह गृह शुभ नहीं है-यमसूर्ये गृहपतेर्मृत्युः ।(बृहत्संहिता)

दण्ड- इसमें एक कक्ष उत्तर एवं दूसरा पूर्व में होता है-दण्डाख्यमुदक्पूर्वे ।(बृहत्संहिता) इस गृह का फल दण्ड एवं वध है, अतः यह गृह भी आवासयोग्य नहीं है- दण्डवधो दण्डाख्ये ।बृहत्संहिता

वात-इस गृह में पूर्व तथा दक्षिण दिशा में एक-एक कक्ष होते हैं-वाताख्यं प्राग्युता याम्या ।(बृहत्संहिता) इस गृह का परिणाम कलह एवं उद्वेग है, अतः यह गृह-स्वामी के लिये प्रशस्त नहीं है-कलहोद्वेगः सदैव वाताख्ये ।(बृहत्संहिता)

इन चारो द्विशाल गृहों में दो कक्ष एक-दूसरे के बगल में होते हैं। इन कक्षों की स्थिति एक-दूसरे के आमने-सामने भी सम्भव है। अगले दो भेद इसी स्थिति पर आधारित है-

गृहचुल्ली- इस गृह में एक कक्ष पूर्व दिशा में एवं दूसरा पश्चिम दिशा में होता है-पूर्वापरे तु शाले गृहचुल्ली ।(बृहत्संहिता)इस गृह में धन का नाश होता है, अतः इस गृह को भी प्रशस्त नहीं माना गया है-वित्तविनाशश्चल्ल्याम् ।(बृहत्संहिता)

काच-इसमें एक कक्ष दक्षिण एवं दूसरा उत्तर में होता है-दक्षिणोत्तरे काचम् ।(बृहत्संहिता) यह गृह भी प्रशस्त नहीं है, क्योंकि इस गृह में ज्ञाति-बान्धवों से विरोध प्राप्त होता है-ज्ञातिविरोधः स्मृतः काचे ।(बृहत्संहिता)

उपर्युक्त द्विशाल गृहों में सिद्धार्थ को छोड़ कर सभी गृह त्याज्य होते हैं। उपर्युक्त भेदों के अतिरिक्त एक ही दिशा में दो कक्षों का निर्माण भी सम्भव है। इस प्रकार इनके चार और भेद बनते हैं। इनके साथ अलिन्द, मण्डप तथा अलिन्द के साथ मण्डप तथा कई तलों के कारण अनेक भेद बनते हैं। इन भेदों का 'राजवल्लभमण्डन' ग्रन्थ में विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है। 'वास्तुसौख्य' में इनके ५२ भेदों की चर्चा की कई है
द्विपञ्चाशद् द्विशालानाम् ।

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