उभये तत्पञ्चमादेरिति चिन्त्यं विचक्षणैः ।
देवा नृराक्षसाचैव चरादिषु ग्रहेषु च"।
अर्थात् जब नवमांश निकालना है तो चर राशि में उसी राशि से गणना करे, और स्थिर राशि में उससे नवम राशि से गणना करे, और द्विस्वभाव में उससे पांचवी राशि से गणना करे। अव नवमांश के स्वामी कहते हैं, चर राशियों के नवमांशों के स्वामी देवता हैं, और स्थिर राशियों के नवमांशों के मनुष्य हैं, द्विस्वभाव राशियों के नवमांशों के स्वामी राक्षस हैं ।॥
स्पष्टज्ञानार्थचक्रमिदम् ।
अब चक से नवमांश निकालने की सुगम रीति लिखते हैं ।॥
जिस राशिको नवमांश निकालना है उसके जितने अंश गत हुए हों उन्हीं अंशों के सामने और उसी राशि के नीचे वाले कोष्ठक में जो राशि है बस उसी का नवमांश
जानना चाहिये ।।
उदाहरण ।
जैग्ने मेषका नवमांश निकालना है तो देखिये कि उसके कितने अंश गत हुए हैं अथवा मेपके १५ अंश गन हुए हैं तो १६-४० के सामने देखिये श्रीर मेपके नीचे देखिये तो ५ आया तो सिंह राशि हुई बस यही नवमांश है इसका स्वामी नवमांशेश (स्थ) होगा ॥
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