Thursday, July 23, 2026

१२. शेषनाग कालसर्प योग

द्वादश भाव में राहु तथा षष्टम भाव में केतु तथा अन्य ग्रह इनके मध्य में हो तो शेषनाग कालसर्प योग बनता है।

इस योग वाले को आचानक खर्च, नुकसान, चोरी, डकैती का सामना करना पड़ता है।

 व्यर्थ खर्चे, भ्रमण, कार्यस्थल परिवर्तन या स्थान परिवर्तन बार बार करना पड़ता है। 

१२ वें घर में शुभ ग्रह हो तो जीवन भर संघर्ष करता है तथा मरणोपरान्त प्रसिद्धि प्राप्त होती है।

 शुभ योग से विदेश यात्रा भी प्राप्त होती है परन्तु खर्च अधिक लाभ कम प्राप्त होता है। अपव्यय के कारण आर्थिक स्थिति कमजोर हो जाती है।

 राजदण्ड व मुकद्दमों के कारण धन हानि भी होती है। 

१२ वें शुक्र,मङ्गल, शनि हो तो जानवर से चोट या विषैले जानवर द्वारा अथवा कुत्ते के काटने से पीड़ा होवे। 

किसी दवा का कुप्रभाव भी हो सकता है। नेत्रपीड़ा, उदरपीड़ा अथवा स्त्रायु मण्डल में कम्पन व विकार पैदा हो जाता है।

 गुप्त शत्रु होते हैं, पैशाचिक बाधा भी परेशानी दे सकती हैं।

सन्तान घर से यह घर आठवां होता है अतः इस घर में पाप योग हो तो सन्तान सुख में अभाव पैदा करता है।

११. विषाक्त (विषधर) कालसर्प योग

एकादश भाव में राहु तथा पञ्चम भाव में केतु तथा अन्य ग्रह इनके मध्य में हो तो विषाक्त कालसर्प योग होता है। 

इस योग से व्यक्ति की स्मरण शक्ति पर असर पड़ता है, विद्या में बाधा आती है।

 धन तो कमाये परन्तु उसका सदुपयोग नहीं हो पाता है। सन्तान विषय में चिन्ता पीड़ा रहे, सन्तान का भविष्य बनाने में बहुत संघर्ष करना पड़ता है।

 परिवार में सम्बन्ध मधुर नहीं रहे। लाभ के योग बहुत आये परन्तु अल्प लाभ ही प्राप्त हो। त्रुटिपूर्ण निर्णय से जीवन दुःखी हो जाता है।

 सौदा, सट्टा, शेयर्स में धन नहीं लगायें यदि पहले लाभहो भी जाये तो बाद में बर्बाद हो जाता है।

 व्यक्ति के गुप्त सम्बन्ध बनते हैं। स्वभाव चिड़चिडा भी हो जाता है। प्रेतादि बाधा से व्यक्ति ग्रसित भी हो सकता है।

 व्यक्ति धोखे से नुकसान उठाता है। 


९. शङ्खचूड़ कालसर्प योग

नवम भाव में राहु तथा तृतीय भाव में केतु तथा अन्य ग्रह इनके मध्य में हो तो शङ्खचूड़ नामक कालसर्प योग बनता है।

 इस योग वाले जातक के भाग्य में रुकावटें आती है। धर्म कर्म में रुचि बनें एवं विघ्न आते हैं।

 नौकरी में मातहत को उन्नति मिल जाती है, पर उस व्यक्ति की पदोन्नति रुक जाती है। 

मङ्गल कार्यों में विघ्न आते हैं। विघ्नों के कारण धर्म में श्रद्धा-अश्रद्धा पैदा होती है। 

परिवार के बड़े बुजुर्ग की आत्मा परेशान करे, यदि बृहस्पति भी कमजोर है तो यह योग प्रबल होगा।

 व्यक्ति तन्त्र मन्त्र के चक्कर में पड़ता है एवं अधिकांशतः ठगा जाता है। 

जीवन में उन्नति करता है तो वृद्धावस्था में सन्तान व स्त्री के कारण चिन्ता परेशानी रहे। धन हानि होवे, वैमनस्यता बढ़े। 

इस योग में पिता का सुख भी कम हो जाता है। या तो पिता का सुख कम रहे अथवा माता-पिता, परिवार में वैमनस्यता के कारण पिता से दूर रहे।

 जातक की मृत्यु अकस्मात हावे।


१०. घातक कालसर्प योग

दशम भाव में राहु तथा चतुर्थ भाव में केतु तथा अन्य ग्रह इनके मध्य में हो तो घातक कालसर्प योग बनता है।

 इस योग से माता पिता से सुख सहयोग कम होता है। नौकरी में बार बार आरोप प्रत्यारोप लगते हैं।

 नौकरी छूटे या व्यापार में स्थान परिवर्तन हो। कुछ उन्नति के बाद पुनः हानि हो जाती है। 

उसके सहयोगी उसको गलत सलाह देते हैं। पैतृक सम्पत्ति हेतु वाद-विवाद बनते हैं। 

व्यवसाय में सहयोगी धोखा देते हैं।

 इस योग में यदि सप्तम स्थान में सूर्य, चन्द्र हो बृहस्पति शुक्र की पूर्ण युति हो अथवा बृहस्पति शुक्र में षडाष्टक योग हो या बृहस्पति राहु में षडाष्टक योग हो तो स्त्री सुख में हानि या तलाक हो।


८. कर्कोटक कालसर्प योग

अष्टम भाव में राहु तथा धन घर में केतु तथा शेष ग्रह इनके मध्य मे हो तो कर्कोटक कालसर्प योग बनता है।

 यह योग आयु, स्वास्थ्य, व धन पर प्रभाव डालता है। कभी ऋणी करेगा, तो कभी धनी बनायेगा।

 कभी रोगी, कभी निरोगी करे। जीवन में अस्थिरता अधिक रहे। वैसे आठवां शनि एवं आठवां राहु आयु बढ़ाता है, परन्तु अन्य योग देखकर फलित करें। 

आठवें राहु के साथ मङ्गल या शनिव्यक्ति को रुग्णता देते हैं। भूतप्रेत बाधा से व्यक्ति पीड़ित रहे तथा भैरव उपासना उसको अधिक अनुकूल रहे। 

बात बात पर धन हानि आरोप-प्रत्यारोप रहे। मुकद्दमेबाजी में धन हानि होवे, धोखा होवे, दूसरों को दिया पैसा नहीं आये।

 वाणी पर नियन्त्रण कम रहे, शत्रु बढ़े। नौकरी, व्यापार में स्थान परिवर्तन होवे।

 यदि कुण्डली में अच्छे योग हो तो विदेश यात्रा करे, धन कमाये, परन्तु वहधन स्थिर नहीं रहेगा।

 परिवार में कलह रहे, कुटुम्ब चिन्ता रहे। यदि दूसरे घर में पाप ग्रह हों, सूर्य चन्द्र हो तो पति या पत्नि को कष्ट रहे।

 शनि मङ्गल साथ हो या उनमें षडाष्टक योग हो तो दुर्घटना योग भी बनता है। इस जातिका का स्वास्थ्य अधिकांशतः कमजोर रहता है।

७. तक्षक कालसर्प योग


सप्तम भाव से लग्न तक राहु-केतु के मध्य ग्रह होने से तक्षक नामक कालसर्प योग बनता है। 

यह योग जीवन साथी तथा व्यापारिक साझेदार पर प्रभाव डालता है। व्यापार में साझेदार से धोखा होता है।

 विवाह में विलंब होता है, स्त्री से विचार कम मिले, अतः गुप्त प्रेम प्रसंग बढ़ें। प्रेम के क्षेत्र में असफलता मिले।

 स्त्रियों के कारण आर्थिक व सामाजिक हानि उठानी पड़े। ऐसे जातक की मित्रता शीघ्र टूटती है, सबको संकोच की दृष्टि से देखता है।

 व्यक्ति भावुक भी अधिक होता है। उसकी पैतृक सत्पत्ति नष्ट हो जाती है या दान में दे देता है।
 गुप्तरोग व गुप्त शत्रुओं से वेदनाशील रहता है। आरोप-प्रत्यारोप का शिकार होता रहता है। वैवाहिक जीवन कमजोर रहे, स्त्री रोगी रहे।

इस जातक के सूर्य बुध शुक्र मङ्गल शुभ होने से उन्नति रही। राहु ने भाग्येश गुरु का फल दिया इसलिये राहु दशा में उन्नति हुई।

 राहु में शनि ही कमजोर रहा। अतः ग्रह देखकर कालसर्प में राहु का फल जानें।
 अन्य ग्रह शुभ होने से पति पक्ष में कोई परेशानी नहीं आयी, विवाह भी समय पर हुआ, सन्तान ने भी उन्नति की।


६. महापद्म कालसर्प योग


षष्टम भाव में राहु तथा १२ वें भाव में केतु हो तो यह योग महापद्म कालसर्प योग होता है।

 यह योग रोग वे शत्रु की वृद्धि करता है, अन्त में विजय दिलाता है। 

वृथा वादविवाद मुकद्दमेबाजी कराता है। चोरी, डकेती, से धन हानि होवे। 

आर्थिक परेशानी तथा वृथाभ्रमण एवं वृथा खर्चे रहे। बिमारियाँ परिवार में लम्बी चले।

 किसी न किसी की बिमारी पर परिवार में खर्चा होता रहे। व्यापार की अपेक्षा नौकरी ठीक रहे। 

नौकरी में भी विवाद चलता रहे, उन्नति समय पर नहीं होवे। प्रत्येक कार्य में रुकावट रहे, क्योंकि यह भाव भाग्य स्थान से दशवां है, 
अतः भाग्य को कमजोर करता है।

सन्तान घर से आठवां घर अर्थात् १२ वें घर में केतु सन्तान के लिये कमजोर होता है, अतः सन्तान सुख हेतु केतु का उपाय करें, दो रंग का कुत्ता पालें। 

पार्थिव शिव व गणपति की पूजा करें।

५. पद्मकालसर्प योग


पञ्चम भाव में राहु ११ वें भाव में केतु हो तो यह पद्म नामक कालसर्प योग होता है।

 यों तो कहते हैं पाँचवा राहु विदेश विद्या, अंग्रेजी तथा गणित में अच्छा होता है अर्थात् विद्या में सहायक है परन्तु कालसर्प योग बनने पर यह विद्या में अवरोध देता है।

 पाँचवे राहु-केतु का सूर्य चन्द्र मङ्गल के साथ योग हो तो विद्या में अवरोध, सन्तान चिन्ता, गर्भपात होवे। ऐसे जातक की वाणी असंयमित रहती है, क्रोधी होता है।

 जादू, टोना, अभिचार कर्म से पीड़ित होकर तरह तरह के दुःख प्राप्त करता है।

जातक तन्त्र-मन्त्र, पैशाचिक साधना की ओर अग्रसर हो सकता है जो आगे जाकर उसका भविष्य बिगाड़ देगी।

 इस प्रकार के व्यक्ति के मित्र धोखा देने वाले होंगे। पूजा-अनुष्ठान कर्म अक्सर अधूरा रहेगा। मन में उत्साह कम रहेगा।

 मङ्गल कार्यों में अधिकांशतः विलम्ब होगा या विघ्न आयेंगे। लड़कियों को सुसराल में परेशानी रहे, बहुयें सेवाभावी नहीं होगी।

व्यक्ति की सोसायटी गलत होगी। गलत खान-पान व नशे की लत होगी। जुआ सट्टे में धन गंवायेगा। 

प्रेम के क्षेत्र में धोखा होगा। पञ्चम भाव प्रभावित होने से, पञ्चमेश शून्य अंश का हो तो भी सन्तान की चिन्ता रहे।

 बृहस्पति शुक्र की अंशात्मक युति हो या इनमें षडाष्टक योग हो तो स्त्री के गर्भाशय में खराबी, मासिक धर्म बन्द होना या रुकावट आवे।

 यदि स्त्री का स्वास्थ्य ठीक हो तो पुरुष के शुक्राणु कमजोर होंगे।
सन्तान सुख में कमी रहती है, सन्तान जीवित कम रहती है, पुत्रियाँ अधिक हो या सन्तान की दिनचर्या ठीक नहीं होवे। 

सन्तान के व्यापार, विवाहादि की चिन्ता विशेष रहे। 

४. शङ्खपाल कालसर्प योग

चतुर्थ भाव में राहु तथा दशम भाव में केतु हो तथा सभी ग्रह राहु-केतु के मध्य हो अथवा दशवे राहु चौथा केतु हो तो भी शङ्खपाल नामक कालसर्प योग बनता है।

 चतुर्थ भाव सुख, सम्पत्ति, जायदाद, निद्रा, हृदय तथा शयन सुख का एवं माता का होता है। 

यह योग इनमें से किसी एक पक्ष को विशिष्ट हानि देगा। यदि जीवन में अच्छा धन कमा लिया हो तो जीवन के उत्तरार्ध में सब कुछ लुट जायेगा।

 इसके लिये ग्रहों की दशा का अवश्य अवलोकन करें। किसी की जायदाद हानि करे, किसी को गृह कलह, तलाक, पत्नि वियोग देवे तो किसी के माता पिता की शीघ्र मृत्यु होवे।

 दूसरों से धोखा मिलेगा, जातक चिन्ताशील रहे। पति-पत्नि में किसी का चरित्र संदिग्ध हो सकता है।

३. वासुकी कालसर्प योग


तृतीय भाव में राहु तथा नवम भाव में केतु हो तो वासुकी कालसर्प योग बनता है।
 ऐसा व्यक्ति अपने भाईयों व कुटुम्बियों से दुःखी रहता है। उसे घर का पड़ौस भी अच्छा नहीं मिलता। आत्मीयजन उससे जलन करते हैं। 

भाग्य मन्द गति से चलता है। कन्धों में दर्द रहेगा। सफलता के किनारे आकर रुक जाये। प्रतिस्पर्धा में मेरिट में कुछ नम्बरों से रह जाये।

 एजेन्सी, ठेका, तेजी मन्दी, शेयर्स में नुकसान रहे। डरावने स्वप्न, काले स्वप्न आये या स्वप्न में सर्प अधिक दिखाई दे। छोटे बच्चे रात को बिस्तर गीला कर देवे। कुटुम्ब में कोई अकाल मृत्यु होवे, उसकी आत्मा परेशान करे।

यदि शुभ ग्रह राहु के साथ होवे तो उसे घटना का पूर्वाभास हो जाये। कुण्डली में अच्छे योग होवे, तृतीयेश नवमेश बलवान होवे तो व्यक्ति भविष्यवक्ता भी हो सकता है।

इस जातक को हनुमान, भैरव या कार्तिक स्वामी की उपासना करनी चाहिये। मनोवाञ्छित फल नहीं मिलने से जातक कभी कभी नास्तिक भी हो जाता है। 
यदि तीसरे स्थान में केतु या नवें राहु हो तो व्यक्ति छल कपट करे, तन्त्र मन्त्र प्रयोग करे।

ऐसा व्यक्ति झूठे किस्से आसानी से गढ़ लेता है। जातक वकील, एक्साईज इंस्पेक्टर, नर्सिंगकार्य, तस्करी कार्य भी करता है। परिस्थितिों से झूझते हुये कुछ जातक अदम्य साहसी भी होते हैं।


सातवें घर पर राहु की दृष्टि होने से एवं पञ्चम स्थान कमजोर होने पर विवाह में विघ्न कारक है। 

२. कुलिक कालसर्प योग


दूसरे भाव में राहु हो तथा केतु अष्टम भाव में हो, शेष सात ग्रह उनके मध्य में हो तो कुलिक नामक कालसर्प योग बनता है। यह जातक धन की तंगी अधिकतर महसूस करेगा, धन के लिये कठिन संघर्ष करना पड़ेगा। ऐसा व्यक्ति रिश्तेदारों से धन का लेन देन नही करें, उनसे सम्बन्ध खराब होंगे।
स्वास्थ्य भी ऐसे व्यक्ति का जल्दी खराब होगा। टोना टोटका, प्रेतदोष उस पर शीघ्र लागू होंगे। व्यापार में अधिक मेहनत करें तो भी नौकरी जितना ही धन प्राप्त होगा।
यदि दूसरे भाव में राहु या केतु हो तथा उनके साथ सूर्य या चन्द्रमा हो तो स्त्री की आयु कम होगी क्योंकि द्वितीय भाव स्त्रीघर से आठवां पत्नि की आयु का घर, है उसमें ग्रहण योग स्त्री की हानि करता है। कुटुम्ब चिंता व धन चिन्ता देता है।
कोई भी कालसर्प योग होवे उस कुण्डली में सूर्य चन्द्रमा एक दूसरे से नवम-पञ्चम होंगे तो जब भी राहु गोचर में सूर्य या चन्द्र पर आयेगाउस समय वह सूर्य चन्द्र दोनों को देखेगा अतः वह समय कष्ट कारक होगा। 

१. अनन्त कालसर्प योग


लग्न स्थान में राहु सप्तम स्थान में केतु अथवा लग्न में केतु सातवें राहु हो एवं सभी ग्रह उनके मध्य में होतो अनन्त नामक कालसर्प योग बनता है।

 यह व्यक्ति स्वार्थी व कूटनीतिज्ञ होवे। राहु के साथ सूर्य, चन्द्र, मङ्गल हो तो क्रोधी होवे स्वास्थ्य मध्यम रहे, चोट दुर्घटना योग भी बने तथा अनकानेक कारणों से चिन्तित रहे। उसे मान हीं मिले गुप्त शत्रु बढ़े।

 राहु के साथ बुध हो तो बड़बोला हो, शुक्र राहु शनि योग कुछ ऐसी घटनायें घटित करते हैं, जिससे व्यक्ति उदासीन होकर एकान्त पसन्द करते हैं।
 यदि कुण्डली में अन्य शुभयोग हो तो व्यक्ति आध्यात्म की ओर बढ़ता है क्योंकि उसका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं होता। 

सम्बन्ध विच्छेद या दोनों में वैमन्यस्ता पैदा करता है। यदि शुभ ग्रह स्त्री पक्ष को सुधारते हैं पत्नि रोगी रहे।


यदि लग्नेश सप्तमेश का आपस में केन्द्र, त्रिकोण, राशि परिवर्तन अथवा दृष्टि योग बनता है तो जीवन अधिक समय कष्टमय नहीं रहेगा।

इस कुण्डली में प्रत्येक घर में ग्रह होने से "माला योग" बनता है जो राजयोग देता है, अतः कालसर्प दोष अति न्यून रहेगा।

सन्तान घर पर राहु की दृष्टि होने से सन्तान की चिन्ता भी प्राप्त होती है।
यदि लग्र में केतु सातवें राहु हो तो गोचर भ्रमण से राहु वक्री होकर ग्रहों को अपना ग्रास बनायेगा, दूसरे ग्रह मार्गी होकर आगे बढ़ेंगे तो राहु के मुख में जायेंगे यह योग अधिक कमजोर होता है। अर्थात् दुष्परिणाम अधिक होंगे, जीवन संघर्षमय रहेगा।


॥ कालसर्प योग के विविध प्रकार ॥


जब सभी ग्रह राहु-केतु की धूरी के एक ओर आ जाते हैं अथवा दूसरी भाषा में कहें कि राहु-केतु के मध्य आ जाते हैं तो कालसर्प योग बनता है।

१२ लग्नों के आधार पर १२ तरह के कालसर्प योग माने गये हैं। अलग-अलग राशि में इनके फल में कुछ परिवर्तन हो जाता है अतः १२ १२ = १४४ प्रकार के कालसर्प योग बनते हैं। इनमें से कभी ग्रह राहु से केतु के मध्य होते हैं, तो कभी केतु से राहु के मध्य इससे उनका फल अलग अलग हो जाता है। इससे १४४ × २ = २८८ प्रकार के कालसर्प योग मुख्य जानने चाहिये। यदि एक-एक ग्रह राहु-केतु की पहुँच से बाहर चला जाता है आंशिक कालसर्प योग बनता है अतः कुल २८८ × १२ ३४५६ प्रकार के कालसर्प योग होंगे।

१२ भावों के आधार पर १२ कालसर्प योग इस प्रकार है -

* निम्न सूचि में इच्छित काल सर्प योग  पर क्लिक कर के विस्तृत जानकारी प्राप्त की जा सकती है। 

१. अनन्त कालसर्प यो  

२. कुलिक कालसर्प योग

 ३. वासुकी कालसर्प योग 

 ४. शङ्खपाल कालसर्प योग 

५. पद्मकालसर्प योग

 ६. महापद्म कालसर्प योग 

७. तक्षक कालसर्प योग

  ८. कर्कोटक कालसर्प योग 

 ९. शङ्खचूड़ कालसर्प योग

 १०. घातक कालसर्प योग  

११. विषाक्त (विषधर) कालसर्प योग 

 १२. शेषनाग कालसर्प योग

दृश्य गोलार्द्ध एवं अदृश्य गोलार्द्ध कालसर्प योग

दृष्य गोलार्द्ध कालसर्प योग

१. द्वादश भाव में राहु तथा छठे भाव में केतु, शेष ग्रह छठे भावसे १२ वें भाव के मध्य हो या सप्तम भाव से एकादश भाव के मध्य हो अर्थात् केतु से राहु के मध्य स्थिर हो तो यह  कालसर्प योग है। इसमें योग अधिकतर ग्रह भाग्य, कर्म व लाभ स्थान में होने से नौकरी व्यवसाय में उन्नति कारक है। यदा कदा ऋण रोग चोट परेशानी योग बन सकता है। जीवन के पूर्वार्द्ध में धन कमाये तो उत्तरार्ध में शुभ कार्यों में खर्च अधिक करें।

२. लग्न स्थान में राहु तथा सप्तम में केतु हो शेष ग्रह राहु केतु के मध्य में हो
तो यह भी दृश्य गोलार्द्ध कालसर्प योग बनता है। यदि मध्य के भावों में लगातार ग्रह हो तो व्यक्ति अच्छी उन्नति करता है। अर्थात् "माला योग" बने तो शुभ रहे। ऐसा व्यक्ति प्रारंभ में धन कमाये तो उत्तरार्ध में यश हानि, धन हानि, स्वास्थ्य कमजोर रहे। क्योंकि गोचर ग्रह पश्चात् सभी ग्रह राहु के मुँह में जायेंगे इसलिये यह योग अधिक कष्ट कारक रहे।

अदृश्य गोलार्द्ध योग

१. इस योग में ६ ठें स्थान पर केतु १२ स्थान राह होता है। शेष ग्रह ५, ४, ३, २, १ भावों में होने से गोचर भ्रमणमें ग्रह राहु के मुखमें नहीं जायेंगे। अतः विशेष कष्ट कारक नहीं होता है।
२. पञ्चम भाव में केतु एकादश भाव में राहु शेष ग्रह १२, १,२, ३, ४, भाव मेंहो तो गोचर भ्रमण वशात् ग्रह राहु के मुख में नहीं जाने से योग विशेष कष्ट कारक नहीं रहे।

Wednesday, July 22, 2026

काल सर्प योग का इतिहास


काल सर्प योग के विषय में ज्ञानवर्धन के पूर्व इन दोषों के मूल कारक ग्रह राहु एवं केतु के विषय में जान लेना आवश्यक प्रतीत होता है जिससे आम जन के मानस पर काल सर्प योग की भ्रान्तियों एवं उसके कारण उत्पन्न भय का विधिवत निवारण हो सके ।
स्वायंभुव मनु के अंतिम प्रजापति दक्ष के 60 कन्यायें थीं। उनमें से तेरह कश्यप को, दस यम को, सत्ताइस चन्द्र को, चार अरिष्ठनेमि को, दो भृगु पुत्र को, दो कृशाश्व को और दो अंगिरा को दी गयी थीं। प्रजापति दक्ष की सबसे बड़ी पुत्री दिति थी। दिति का विवाह कश्यप से हुआ था। दिति एवं कश्यप के संयोग से चार पुत्र क्रमशः 1. हिरण्यकशिपु, 2 हिण्याक्ष, 3. व्रज्रांग और 4. अन्ध्रक एवं दो पुत्री क्रमशः सिंहिका व होलिका हुई। दिति से उत्पन्न होने के कारण ये दैत्य कहलाये और उन चारों पुत्रों से दैत्य वंश चला। हिरण्यकशिपु के चार पुत्र हुए उनमें सबसे बड़े प्रह्लाद थे ।
प्रजापति दक्ष की एक पुत्री दनु थी, दनु का विवाह भी कश्यप से हुआ था एवं दनु तथा कयश्प के संयोग से अनेक पुत्र हुए अतः दनु के नाम से दानव वंश चला इन्हीं दानव पुत्रों में विप्रचित्ति नाम के दानव का विवाह हिरण्यकशिपु नामक दैत्य की बहिन सिंहिका से हुआ, इस प्रकार सिंहिका एवं विप्रचित्ति के संयोग से तेरह बीर पुत्र हुए और वे सब सिंहिका के नाम से सैंहिकेय कहलाये उनमें से एक पुत्र राहु था जो उन सभी में भंयकर प्रसिद्ध हुआ। वह एक वीर योद्धा होने के साथ-साथ भगवान् शिव का अनन्य भक्त भी था। और भगवान् शिव के अनुग्रह से ही उसे इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति प्राप्त थी।
एक समय जब समुद्र मन्थन किया जा रहा था तो एक ओर दानव व दैत्य थे एवं दूसरी ओर देवगण। यहाँ  देवताओं की उत्पत्ति के विषय -  ये देवता भी प्रजापति दक्ष की दूसरी पुत्री अदिति जो कि कश्यप को ही दी गई थी से ही उत्पन्न हुए जो संख्या में बारह थे। और अदिति से उत्पन्न होने के कारण इन्हें आदित्य कहा गया। वर्तमान में जितने भी देव हैं वे सब इन्हीं के वंशज हैं। समुद्र मंथन में जिस वासुकी नामक नाग को रस्सी के रूप में बांधकर प्रयोग किया गया था वह भी प्रजापति दक्ष की पुत्री कद्रू एवं कश्यप की संतान थी। क्योंकि कद्रू एवं कश्यप के संयोग से ही छब्बीस नग वंश चले। जिनमें प्रमुख थे शेषनाग, वासुकी, कर्कोट, धृतराष्ट्र, धनंजय, महानील, अश्वतर, पुष्पदंत, शंखरोमा आदि। इस प्रकार समुद्र मंथन में प्रजापति दक्ष की कन्याओं एवं कश्यप से उत्पन्न परिवार ही सम्मलित था।
समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत निकला तो उसका पान करने के लिये सभी देव, दैत्य, दानव एवं नाग आदि में होड़ लग गयी देवताओं ने चालाकी वश सबको लाइन में बैठा दिया जिसमें क्रमशः पहले देव बैठे फिर दानव तथा दैत्य आदि। जब मोहिनी रूपी विष्णु जी द्वारा अमृत पान कराया जाने लगा तो उसकी शुरूआत दोवताओं की ओर से की गयी। दानवों में बैठे राहु ने देवताओं की मंशा भॉप ली तथा अपना रूप बदलकर देवताओं जैसा कर लिया। एवं सूर्य तथा चन्द्रमा के मध्य जाकर बैठ गये। इन्द्रादि देवता भी राहु के परिवर्तित रूप को नहीं पहचान पाये। किन्तु अपने अधिक निकट बैठे होने के कारण सूर्य एवं चन्द्रमा ने राहु को पहचान लिया एवं मोहिनी रूपी विष्णु जी को चन्द्रमा ने इशारा कर दिया किन्तु तब तक राहु अमृत पी चुके थे। राहु के पहचाने जाने पर विष्णु जी ने तुरन्त सुदर्शन चक्र से राहु का सिर काट दिया जिसके परिणाम स्वरूप राहु का सिर व धड़ अलग-अलग हो गया। किन्तु अमृत पान करने से राहु मरा नहीं। इस प्रकार राहु का सिर राहु व धड़ (कवन्ध) केतु ग्रह के नाम से प्रसिद्ध हुआ। राहु का सिर कटते ही वह अपने असली रूप में आ गया जिसे देखते ही दैत्य एवं दानव जोर-जोर से गर्जना करने लगे एवं देवताओं को युद्ध के लिये ललकारने लगे।
महाबली, महाकाय राहु चुगली करने वाले चन्द्रमा के पीछे उन्हें अपना ग्रास बनाने दोड़ा एवं अपने मायावी रूप से सभी देवताओं को पीड़ा देने लगा उधर दैत्य व दानवों को युद्ध हेतु उद्यत देख देवता लोग चन्द्रमा को अकेला छोड़ स्वर्ग लोक को भाग खड़े हुए। चन्द्रमा ने जब इस तरह देवताओं को मैदान छोड़ते देखा तो वह भी झट-पट राहु से नजर बचाकर स्वर्ग लोक पहुँच गया किन्तु पराक्रमी राहु भी कहाँ मानने वाले थे, वह भी चन्द्रमा के पीछे-पीछे उसे ग्रसने स्वर्ग लोक पहुँच गये। चन्द्रमा ने जब यह देखा कि ये देवता मेरी रक्षा नहीं करेंगे तो मन ही मन दृढ निश्चय कर भगवान् शिव की शरण में जा पहुँचा और आर्तनाद से प्रार्थना करते हुए 'ॐ नमः शिवाय मन्त्र का जाप करने लगा। भगवान् शिव ठहरे आशुतोष सो तुरन्त ही प्रगट हो गये और बोले तुम्हारी राहु से रक्षा हम करेंगे तुम वक्र रूप धारण कर हमारे मस्तक पर आ जाओ। चन्द्रमा ने तुरन्त बिना विलम्ब के शिव आज्ञा का पालन किया और शिव मस्तक पर वक्र रूप में शोभायमान हो गये। इतने में ही राहु चन्द्रमा का पीछा करते हुए भगवान् शूलपाणी के पास जा पहुँचा और चन्द्रमा को वक्र रूप में शिव के मस्तक पर शोभायमान देख सब-कुछ समझ गया तथापि राहु भगवान् शिव से यों बोला, आशुतोष आप ही परब्रह्म परमपिता परमात्मा हैं, मैं आपको बारम्बार प्रणाम करता हूँ आप सब भूत, प्रेत, दैत्य, दावन, किन्नर आदि के पालक हैं, आपको प्रणाम है। मैं आपका परम भक्त हूँ और मेरी यह दुर्गती इस चन्द्रमा की चुगली के कारण हुई है, अतः यह मेरा ग्रास है कृपा कर आप चन्द्रमा को मेरे हवाले कर दें। राहु के इस प्रकार अनुनय विनय करने पर भगवान् शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और राहु से इस प्रकार बोले, प्रिय भक्त राहु में तुझ पर प्रसन्न हूँ, मैं सम्पूर्ण भूतों का आश्रयदाता हूँ। देवता और असुर, नाग और गंर्धव सभी मुझे प्रिय है। अतः तुम चन्द्रमा को क्षमा करो और मेरे गले का हार बन जाओ।
राहु भगवान् गङ्गाधर शिव के अनन्य भक्त थे सो उनका आदेश कैसे टालते, वे तुरन्त सर्प का रूप धारण कर भगवान् शिव के गले में जा लिपटे । राहु रूपी सर्प के शिव के गले में लिपटते ही चन्द्रमा ने भय के कारण अमृत का स्त्राव कर दिया जिसे राहु ने अनेक सिरों से ग्रहण कर लिया। अतः यदि आप राहु के इष्ट भगवान् शिव की अराधना करते हैं और 'ॐ नमः शिवाय' मन्त्र का जाप करते हैं साथ ही सात मुखी रुद्राक्ष को गले में धारण करते हैं तो राहु व केतु के योग से बनने वाले काल सर्प योग के कारण आपकी पीड़ा का निवारण स्वतः ही हो जाता है एवं राहु आपको कष्ट देने के बजाय आपके अनुकूल हो जाते हैं। काल सर्प योग कुण्डली में तब बनता है जब राहु और केतु बाकी बचे सातों ग्रहों को कुण्डली में एक ओर कर स्वयं आगे हो जाते हैं तथा राहु एवं केतु के आगे कोई भी ग्रह नहीं रहता। उदाहरण के लिये एक कुण्डली दी जा रही है जिससे आप आसानी से अपनी कुण्डली में कालसर्प योग है अथवा नहीं पहचान सकते हैं।

काल सर्प योग की वास्तविकता 

पिछले एक दशक से ज्योतिषविदों में जो सर्वाधिक चर्चित विषय रहा वह था "कालसर्प योग" इस योग के विषय में प्राचीन एवं नवीन विचारधारा वाले ज्योतिषशास्त्रियों ने अनेक शास्त्रों एवं ज्योतिष संबंधी साहित्यों की व्याख्यायें की, भिन्न-भिन्न तर्क प्रस्तुत किये, विचार तथा फलादेश समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित किये। कुछ लोगों ने तो बड़ी-बड़ी पुस्तकों की रचना कर अपनी जेब गर्म कर ली। 
प्राचीन ज्योतिष ग्रन्थों जैसे भ्रगु संहिता, रावण संहिता एवं वैदिक साहित्य के ज्योतिष संबंधी अध्यायों में 'कालसर्प योग' नाम से किसी भी ग्रह योग की गणना नहीं की गई है।
आधुनिक ज्योतिष शास्त्र में जो 'कालसर्प योग' की ग्रह स्थिति दर्शायी गयी है। ठीक वही स्थिति प्राचीन ज्योतिष ग्रन्थों में भी है, किन्तु उन्हें राहु और केतु द्वारा निर्मित ग्रहयोग के अन्तर्गत क्रमशः राहु की दशा एवं केतु की दशा बताकर फलादेश की गणना की गयी है। इस प्रकार यदि 'कालसर्प दोष' से पीड़ित जातक की कुण्डली के फलादेश का अध्ययन करें तो वह वही फलादेश निकलता है जो प्राचीन ज्योतिष ग्रन्थों के राहु एवं केतु की दशा होने पर था।
जन्म पत्रिका में जब सभी सातों ग्रह राहु और केतु के एक ही ओर स्थित हो जाते हैं तब 'कालसर्प योग' बनता है। चूंकि प्राचीन वैदिक साहित्य के अनुसार राहु और केतु छाया ग्रह होकर एक ही है राहु सिर है तो केतु उसका धड़। राहु का अधिदेवता काल है और प्रति अधिदेवता 'सर्प है इसलिये शायद आधुनिक ज्योतिष शास्त्रियों ने राहु और केतु के योग से बनने वाले इस विशेष ग्रह योग को 'कालसर्प योग' की संज्ञा दी होगी।
'कालसर्प योग' जिस भी जातक की कुण्डली में बनता है, निःसंदेह वह व्यक्ति सामान्य जन से कुछ विशिष्टतायें लिये हुये होता है। वह व्यक्ति समाज पर अपनी अलग छाप छोड़ता है। चाहे वह अच्छी हो अथवा बुरी। यदि हम कुछ महान व्यक्तियों की जन्म-पत्रिकाओं का अवलोकन करें तो जहाँ एक ओर पण्डित जवाहर लाला नेहरू, मोरारजी देसाई, अब्दुल रहमान, आचार्य रजनीश, लता मंगेशकर, पूर्व प्रधान मंत्री चन्द्रशेखर और मुरारी बापू की जन्म पत्रिकाओं में 'कालसर्प योग' देखने को मिलता है। तो वहीं दूसरी ओर जयचन्द, मीर जाफर, हर्षद मेहता आदि अनेक ऐसे लोगों की भी जन्म पत्रिकाओं में 'कालसर्प योग था जिसके रहते ये गद्दारी एवं भ्रष्टाचार की ओर उन्मुख हुए।
'कालसर्प योग' से पीड़ित जातक के लिये यह आवश्यक है कि वह स‌द्मार्ग पर चलते हुए माता-पिता की यथा शक्ति सेवा करे एवं पितृगणों का यथा विधि तर्पण- श्राद्ध आदि करे इससे 'कालसर्प दोष' के अनकूल परिणाम देखने को मिलते हैं। साथ ही उक्त दोष से पीड़ित जातक को भगवान् शिव की अराधना के साथ-साथ 'सातमुखी रुद्राक्ष' को धारण करना चाहिये एवं "ॐ नमः शिवाय" महामन्त्र का रुद्राक्ष माला पर जप एवं लाल स्याही से कॉपी पर "ॐनमः शिवाय" मन्त्र का लिखित जप करना चाहिये। ऐसा करने वाले जातक की जन्म कुण्डली में कितना भी भयानक 'कालसर्प योग' हो जातक एक सामान्य व्यक्ति की तरह जीवन यापन करते हुए मानसिक रूप से शान्त एवं आनन्दित रहता है।

Friday, July 17, 2026

यात्रा विचार 

त्याज्यनक्षत्र - श्ले, आर्द्रा, कृ, भर., पूभा, मघा, चि, स्वा, और विशाखा इन ९ नक्षत्रों में यात्रा नहीं करनी चाहिए ।

त्याज्यतिथि - रिक्ता (४-९-१४) तिथि, पर्व (पूणि. अमा०), षष्ठी-अष्टमी द्वादशी और शुक्ल प्रतिपदा ये ९ तिथियाँ यात्रा में प्रशस्त नहीं होती हैं।

त्याज्यदिशा - बुध-शुक्र जिस दिशा में उदित हों उस दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिए । प्रशस्त तिथि वार-नक्षत्रादि के रहने पर भी बुध-शुक्र के सम्मुख यात्रा नहीं करनी चाहिए ।

वार एवं नक्षत्रशूल - सोमवार-शनिवार और ज्येष्ठा नक्षत्र में पूर्वदिशा में, गुरुवार और ध. श. पू भा. उ भा. रे. नक्षत्रों में दक्षिण दिशा में, रविवार शुक्रवार और रोहिणी नक्षत्र में पश्चिम दिशा में, तथा
मंगलवार-बुधवार और उ.फा नक्षत्र में उत्तर दिशा में शूल होता है अतएव - यात्रा में इनका त्याग करना चाहिए ।

अमावास्या-अष्टमी को ईशान कोण में,
प्रतिपद-नवमी को पूर्व दिशा में,
तृतीया-एकादशी को अग्निकोण में,
त्रयोदशी-पंचमी को दक्षिण दिशा में,
द्वादशी-चतुर्थी को नैऋत्य कोण में,
षष्ठी-चतुर्दशी को पश्चिम दिशा में,
पूर्णिमा-सप्तमी को वायव्य कोण में और
दशमी-द्वितीया को उत्तर दिशा में शूल होता है।

दिग्द्वार नक्षत्र और परिघदण्ड पूर्वादि क्रम से चारों दिशाओं में कृत्तिका
से ७-७ नक्षत्रों का स्थापन करके वायव्यकोण से अग्निकोण तक एक रेखा खीचें यहीं रेखा परिघदण्ड कहलाता है। यह दो भागों में १४-१४ नक्षत्रों को बाँटता है। पूर्व उतर के नक्षत्रों में पश्चिम-दक्षिण नहीं जाना चाहिए और पश्चिम दक्षिण के नक्षत्रों में पूर्व-उत्तर नहीं जाना चाहिए । पश्चिम के नक्षत्रों में दक्षिण तथा पूर्व के नक्षत्रों में उत्तर नहीं जाना चाहिए 

सार्वकालिक शुभ नक्षत्र -- मृगशिरा-पुष्य-हस्त-श्रवण इन चार नक्षत्रों में कोई दोष नहीं लगता है। क्योंकि ये चार नक्षत्र सर्वदा शुभ होते हैं। दिन या रात्रि के किसी भी त्रिभाग में इन नक्षत्रों में यात्रा की जा सकती है। यात्रा के अन्य नक्षत्रों में भी निन्दित काल को छोड़कर ही यात्रा करनी चाहिए ।
दिक्शूल दोष नाशक - रविवार को घृत, सोमवार को दुग्ध, मंगल को गुड़, बुध को तिल, गुरु को दधि, शुक्र को यव और शनिवार को उड़द, इन पदार्थों को थोड़ा सा खाकर यात्रा करने से दिक्शूल का दोष नहीं लगता है।
दिशाओं के लिए प्रशस्त - घृत खाकर हाथी से पूर्व दिशा की यात्रा, तिलान्न
खाकर गाड़ी से दक्षिण दिशा में, मछली खाकर घोड़े से पश्चिम दिशा में और दुग्ध पीकर पालकी से उत्तर दिशा में यात्रा करने पर कार्य की सिद्धि होती है। यदि भक्ष्य वस्तु और वाहन का अभाव हो तो उनका स्मरण करके ही यात्रा करनी चाहिए ।

चूड़ाकरण मुहूर्त -

चौलंमाघादिपंचस्वमधुषुगदितं द्वित्रिपञ्चोन्मितेऽब्दे 

स्वाचाराद्वा सगर्भायदि भवति जनन्यत्र नो कार्यमेतत् ।

 साकं यत्रोपनीत्या क्रियत इहतदायं निरोधो न हिस्या

 ज्जह्यादंबार्तवोऽदो व्रतमुपयमनं चाविशुद्धः शुभार्थी ॥१०॥

चैत्र को छोड़कर माघ से पाँच महीनों में अर्थात् माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ मासों में जन्म से २ रे ३ रे या ५वें वर्ष में अथवा अपने कुल के आचारानुसार शिशु का चूड़ाकरण करना चाहिए ।
शिशु की माता के गभिणी रहने पर चूड़ाकरण नहीं करना चाहिए। इसका विचार पाँच वर्ष तक ही करना चाहिए। इसके बाद यह दोष नहीं लगता है।
यदि चूड़ाकरण और उपनयन संस्कार एक ही साथ हों तो चैत्रमास और माता के गर्भवती होने का दोष नहीं लगता । अर्थात् उपनयन संस्कार के साथ चूड़ाकरण चैत्रमास और माता के गभिणी होने पर भी करना चाहिए क्योंकि उसमें उपनयन ही मुख्य संस्कार होता है, इसमें चैत्रमास या मातृगर्भ दोषरहित माना गया है। परन्तु यदि माता का रजस्वला काल हो तो उसके शुद्धिकाल तक चड़ाकरण उपनयन
 नहीं करना चाहिए ।।१०।।

ब्राह्मणों का रविवार को क्षत्रियों का भौमवार को 
वैश्यों और शूद्रों का शनिवार
को चूड़ाकरण करना चाहिए। ये तीनों वार वर्ण विशेष के लिए ही ग्राह्य हैं अन्यथा सभी वर्ण वालों के लिए बुध, गुरु, शुक्रवार और शुक्लपक्ष का सोमवार प्रशस्त माना गया है। कृष्णपक्ष का सोमवार प्रशस्त नहीं होता हैं।
रेवती-अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, ज्येष्ठा, मृगशिरा, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा इन १२ नक्षत्रों में चौल (चूड़ाकरण) शुभकारक होता है। लग्न से सप्तम में सूर्य, भौम, शनि और शुक्र तथा अष्टम में शुक्र के विना सभी ग्रह मृत्युकारक होते हैं ।
अर्थात् शुक्र ७ में अशुभ परन्तु ८ में शुभ होता है। चन्द्रमा को छोड़कर कोई भी ग्रह १२ में शुभ होता है। अर्थात् चन्द्रमा १२ में शुभ नहीं होता है। चुड़ाकरण में लग्न बल पूर्ववत् विचारना चाहिए जैसे षष्ठी, पूर्णिमा और रिक्ता तिथि रात्रि और सन्ध्यासमय इत्यादि का विचार करना चाहिए ।।११।।

अन्नप्राशन मुहूर्त -

मासे षष्ठेष्टमे नुनिगदितमशनं पंचमे सप्तमे वा,

 भोरोरुज्झंति नंदाहरिवसुरजनीरिक्तकाः स्वर्क्षमेके ।।

 सदृक्कांशाह्रयचांद्रे ध्रुवमृदुचरभं क्षिप्रभेजालिमीनो ।

 नांगे केंद्रत्रिकोणांत्यमृतिषु विमलास्विन्दुरिष्टो बिलोंगे ॥८॥

जन्म से ६ या ८ मास में बालक का और ५ या ७ मास में कन्या का अन्न श्राशन शुभ होता है। अन्नप्राशन में नन्दा (१।६।११), १२।८ और रिक्ता (४।९। १४) तिथि, रात का समय तथा जन्म नक्षत्र त्याज्य हैं। क्षीण चन्द्र का द्रेष्काण और नवांश भी अशुभ होता है।
शुभग्रह (बुध, गुरू, शुक्र) का द्रेष्काण और नवांश शुभ होता है। चन्द्रवार को छोड़कर अन्य शुभवार (बुध, गुरु, शुक्र) में ध्रुव संज्ञक (तीनों उत्तरा, रोहिणी) मृदुसंज्ञक (मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा) चरसंज्ञक, (स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा) क्षिप्रसंज्ञक (हस्त, अश्दिनी, पुष्य, अभिजित) इन १७ सत्रह नक्षत्रों में १।८।१२ को छोड़कर अन्य लग्नों में, और लग्न से केन्द्र (१।४।७।१०) त्रिकोण (५।९) १२ और ८ स्थान शुद्ध रहने पर अन्नप्राशन शुभ होता है। यदि पूर्ण चन्द्रमा लग्न में हों, तो वह लग्न शुभकारक होता है।

ग्राह्य

मास-६ या ८ में बालक का ५ या ७में कन्या का
तिथि-२।३।५।७।१०।१३।१५।३०
वार-बुध, गुरू, शुक्र

नक्षत्र-उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तर भाद्रपद, 
रोहिणी, मृगशिरा, रेवती, चित्रा; अनुराधा, स्वाती, 
पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, हस्त, 
अश्विनी, पुष्य, अभिजित,
लग्न-वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या तुला,
 धनु, मकर, कुम्भ, लग्न-
जिस लग्न के १।४।५।७।८।९। १०।१२
 में पापग्रह नहीं हों।

त्याज्य
तिथि-१।४।६।८।९।११।१२।१४
 रात्रि का समय
वार-रवि, चन्द्र, भौम, शनि
लग्न-मेष-वृश्चिक-मीन

कर्णवेध संस्कार

मंत्रः
क्षिप्रैः स्थिरभचरभैर्व्यानिलांभः
 पकक्ष-श्चैकाफापौष्विन
 शनिकुजर्झा शवारानपास्य ।।
रिक्तापर्वेश्वरवसुतिथीन् रात्रिसंध्ये 
समाब्दं, पुस्त्रोकणौ सविधि
 पटुना दक्षवामादि वेध्यौ ॥७॥

कर्णवेध जन्म से विषम वर्षों में करना चाहिए।

 यदि कन्या का कर्णवेध हो तो पहले बाँया कान छेदकर 

उसके बाद दाँया कान छेदना चाहिए ।

कर्णवेध संस्कार में

त्याज्य- स्वाती, शतभिषा,रोहिणी

सूर्य-शनि-भौमवार

सूर्य-शनि-भौम का लग्न नवांश

४।९।१४।११।८।१५।३० तिथि

रात्रिकाल

तथा प्रातःकाल

सन्ध्याकाल


ग्राह्य - स्थिर संज्ञक मैत्र संज्ञक

चर संज्ञक क्षिप्र संज्ञक नक्षत्र

चैत्र, कार्तिक, पौष, फाल्गुन मास

चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्रवार और 

इन के लग्ननवांश

१।२।३।६।७।१०।१२।१३

तिथियों में

पूर्वाह्न से अपराह्ण काल तक ।।

स्वभावदेव कालोऽयं शुभशुभ समन्वितः । 

अनादि निधतः सर्वो न निर्दोषो न निर्गुणः ।। 

तस्मान्निर्दोषकालार्थे मुहूर्तमधिगच्छताम् ।

 कालः शुभो गुणैर्युक्तो बलवद्विः शुभप्रदः ।।

 संग्रहशिरोमणि अपने स्वभाव से ही यह काल शुभ और अशुभ लक्षणों से युक्त है। सब कुछ अनादि से प्रवर्तमान है और कुछ भी निर्दोष व निर्गुण नहीं है। इसीलिये निर्दोष काल के लिये मुहूर्त को आश्रित करना है जो शुभ गुणों से युक्त है और शुभ प्रद है।

 संग्रहशिरोमणि में-

ग्रहणग्रहसंक्रान्तियज्ञाध्ययनकर्मणाम् ।

प्रयोजनं व्रतोद्वाहकियाणां कालनिर्णयः ।।

ग्रहणसाधन, ग्रहसाधन, संक्रान्ति निर्णय और यज्ञादि कर्मों का निर्वहण ये सभी कार्य व्रत विवाह आदि कार्यों के लिये उपयुक्त कालनिर्णय करने के लिये है। अर्थात् शुभ कर्मों के समय निर्णय करने के पक्ष के अभाव में उपर्युक्त सभी कार्य निष्फल है।

 संग्रहशिरोमणि में -

शुभक्षणक्रियारम्भजनिताः पर्वसम्भवा ।

सम्पदस्सर्वलोकानां ज्योतिस्तत्र प्रयोजनम्।

शुभक्षण अर्थात् शुभ मुहूर्त में आरम्भ किये गये सभी कार्य सभी के लिये सर्व विध सम्पत्ति के कारक होते है और इस प्रकार सर्वविध सम्पत्ति प्राप्त करना ही ज्योतिष शास्त्र का प्रयोजन है। 

***

दिनमान / रात्रि मान  के समय में 

१५ का भाग देने पर जो समय प्राप्त होता है उसे १ मुहूर्त कहा  जाता है। 

गिरीशभुजगामित्राः पिन्यवस्वम्बुविश्वेभिजिदर्थ च विधातापीन्द्र इन्द्रानली च।

 निऋतिरुदकनाथोप्यर्यमाथो भगः स्युः कमश इह मुहूर्ता वासरे बाणचन्द्रा ।।

अर्थात् एक दिन में 15 मुहूर्त होते है और कमशः गिरीश, सर्प, मित्र, पितृगण, वसु, जल, विश्वेदेव, ब्रह्म, विधाता, इन्द्र, इन्द्राग्नि, निऋति, वरुण, अर्यमा, भग ये 15 मुहूर्तों के स्वामी है।

 इसी तरह रात्रिमान में भी 15 मुहूर्त होते है। 

उनके भी स्वामी निर्धारित है। जैसे-

शिवोजपादादष्टी स्युर्मेशा अदितिजीवकौ।

 विष्ण्वर्कत्वष्ट्रमरुतो मुहूर्ता निशि कीर्तिताः ।।

क्रमशः रात्रि के मुहूर्तों के शिव, अजपाद, अहिर्बुध्न्य, पूषा, अश्विनी कुमार, यम, अग्नि, ब्रह्म, चन्द्र, अदिति, जीव, विष्णु, अर्क, त्वाष्ट्र और मरुत् स्वामी है।

दुर्मुहूर्त -

दिन में और रात्रि में कहे गये पन्द्रह - पन्द्रह मुहूर्तों में वार के अनुसार कुछ दुष्टमुहूर्त व दुर्मुहूर्त कहे गये हैं।
जैसे -
रवावर्यमा ब्रह्मरक्षश्च सोमे कुजे 
वहिनपित्र्ये बुधे चाभिजित् स्यात् ।
 गुरौ तोयकक्षो भृगौ ब्राह्मपित्र्ये 
शनावीशसार्यों मुहूर्ता निषिद्धाः ।।

दिनमान में और रात्रिमान में मुहूर्तों का विभाजन करके नाम जो दिये गये है। उनका प्रयोजन मुहूर्त चिन्तामणि में कहा गया है कि रविवार को अर्यमा नामक मुहूर्त सोमवार को ब्रह्मरक्ष, मंगलवार को वह्नि और पित्र्य, बुधवार को अभिजित्, गुरुवार को तोय और रक्ष, शुकवार को ब्रह्मरक्ष तथा पित्र्य, शनिवार को ईश और सर्प नामक मुहूर्त दुर्मुहूर्त कहे गये हैं। अतः ये सभी शुभ कर्मों में त्याज्य है। प्रायः सभी मुहूर्त ग्रन्थ जैसे मुहूर्त चिन्तामणि, पूर्वकालमृत, रत्नमाला और संहितास्कन्ध के नारदसंहिता आदि सभी ग्रन्थों में ये दिनसम्बन्धी और रात्रि सम्बन्धी मुहूर्त कहे गये हैं।
इन्हें चार्ट द्वारा इस प्रकार सरलता से जान सकते है-
वार - अशुभ मुहूर्त
रविवार -अर्थमा
सोमवार -ब्रह्मरक्ष
मंगलवार -वहिन और पित्र्य,
बुधवार - अभिजित
गुरुवार -तोय और रक्ष
शुक्रवार -ब्रह्मरक्ष तथा पित्र्य
शनिवार - ईश और सर्प